Home Views Article कैसे खत्म हो कोर्ट की ‘तारीख पर तारीख’

कैसे खत्म हो कोर्ट की ‘तारीख पर तारीख’

जरा सोचिए कि 1984 में दिल्ली में सिखों के कत्लेआम के लिए जिम्मेदार बहुत से पीड़ितों को अभी तक न्याय नहीं मिला है। यही स्थिति भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों की है। पीड़ितों को कोर्टे से लगभग साढ़े तीन दशक बीत जाने के बाद भी तारीखों पर तारीखें ही मिल रही हैं

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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के सेवा काल के अंतिम दिन जजों के वेतन में तीन गुना वृद्धि करने का सुझाव आया। यह सुझाव शायद अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने इसलिए रखा था क्योंकि उन्हें दीपक मिश्र और उनके उत्तराधिकारी और देश के नए प्रधान न्यायधीश रंजन गोगोई की चल-अचल संपत्ति की जानकारी रही होगी। मीडिया रिपोर्टों से साफ है कि इन दोनों प्रधान न्यायधीशों के पास बेहद कम संपत्ति है।

पर यहां पर बड़ा सवाल यह है कि जो प्रख्यात वकील सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पैरवी करते हैं, वे रोज का 50 लाख रुपये तक कमा लेते हैं। यह राशि सुनकर एकदम से यकीन नहीं होता, पर यह सच है। रोज 50 लाख रुपये का अर्थ है महीने का 15 करोड़ रुपये। ये बड़े वकील हर खास केस में एक-दूसरे के खिलाफ जिरह कर रहे होते हैं। चूंकि इनकी छवि इतनी बेहतरीन बन जाती है कि लोग इनकी शरण में ही जाते हैं। इन्हें केस सौंपने के बाद इनके मुवक्किलों को उम्मीद बंध जाती है कि वे केस जीत जाएंगे। पर सवाल यह है कि इन श्रेष्ठतम वकीलों की खास योग्यता क्या है? मोटे तौर पर इनकी देश के संविधान की धाराओं पर गजब की पकड़ रहती है। ये संसार के अनेक देशों के संविधान के मुख्य बिन्दुओं की भी समझ रखते हैं। वे जब जिरह करते हैं तो अपनी बात को साक्ष्य के साथ मजबूती से रखते हैं। ये सिर्फ व्यक्तियों, संस्थानों या कंपनियों के केस ही नहीं लेते। ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश के लिए पैरवी करते हैं। उदाहरण के रूप में सोली सोराबजी ने देश के अटार्नी जनरल के रूप में भारत के पाकिस्तान के विमान को गिराए जाने का केस इंटरनेशनल कोर्ट में लड़ा था। दरअसल इंडियन एयरफोर्स ने पाकिस्तान की नेवी के एक विमान को 10 अगस्त,1999 को गिरा दिया था। पाकिस्तान मामले को इंटरनेशनल कोर्ट में लेकर गया। वहां पर सोराबजी के अकाट्स तर्को के आगे पाकिस्तान ने समपर्ण कर दिया था। कोर्ट का फैसला भारत के हक में आया था।इन देश के चोटी के वकीलों में हरीश साल्वे, फली नरीमन, मजीद मेमन, इंदिरा जयसिंह जैसे वकील शुमार होते हैं।

वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने विगत वर्ष एक रुपये की फ़ीस लेकर पाकिस्तान की जेल में क़ैद कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में भारत का पक्ष रखा था। कोर्ट ने कुलभूषण जाधव के मामले में अंतिम सुनवाई तक उन्हें दिए गए मृत्युदंड पर रोक लगा दी थी। उन्होंने इस केस को एक रुपये की फीस लेकर लड़ा था। पर क्या कोई सामान्य शख्स इन्हें अपना वकील बनाने का साहस कर सकता है? लगभग नहीं। इन प्रमुख वकीलों की फीस देना किसी सामान्य तो छोड़िए ठीक-ठीक कमाने वाले के लिए भी संभव नहीं है। इसलिए यह अहम सवाल उठता है कि क्या ब़ड़े वकील किसी हारे हुए केस में भी आपको विजय दिलवा सकते हैं? इस सवाल का उत्तर हां में ही दिया जाएगा। जैसे कि हमने ऊपर कहा कि ये तेज-तर्रार वकील गजब की जिरह कर लेते हैं। ये तथ्यों को इस तरह से प्रस्तुत करने में माहिर हो जाते हैं कि इन्हें अमूमन किसी भी कोर्ट में सफलता या विजय ही मिलती है। हां, ये बहुत बार अपने मुवक्किल की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते। हालांकि ये भी सच है कि कुछ शिखर के वकील कुछेक केस कम फीस या बिना फीस के भी लड़ते हैं।वीएम तारकुंडे एक दौर में मानवाधिकारों से जुड़े बहुत से केस बिन फीस लिए लड़ते थे। हिन्दी प्रेमी डा.लक्ष्मी मल सिंघवी भी कई केस मुफ्त में लड़ते थे। ये दोनों उद्भट विद्वान ही नहीं, चिंतक, विचारक और लेखक भी थे।

वर्तमान में इंदिरा जयसिंह महिलाओं से लेकर मानवाधिकारों से जुड़े मामलों को लेकर बेहद गंभीर रहती हैं। उन्हें जिधर भी अन्याय होता दिखाई देता है, वे अपनी बात रखती हैं। उन्होंने पंजाब की आईएएस अफसर रूपन देव बजाज के पक्ष में केस लड़ते हुए पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेश केपीएस गिल को दंड दिलवाया था। वह यौन उत्पीड़न का पहला हाई प्रोफाइल केस था। इंदिरा जी ने कुछ वर्ष पहले केरल में सीरियन ईसाई महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक दिलवाने के लिए केस लड़ा और जीता भी था।

दरअसल देश के चोटी के वकील अगर एक चौथाई भी गरीब-गरुबा के केस बिना फ़ीस के लेने लगें तो ये अपने आप में एक बेहद सकारात्मक पहल होगी। इनकी विशेषता यह भी होती है कि ये केस को लटकाने में यकीन नहीं करते। आखिर इनका अपना एक अलग ही रुआब है। जाहिर है हवाबाजी के कारण ही ये चोटी के वकाल नहीं कहलाते या नहीं बनते। इनका लंबी साधना और मेहनत के बल पर अपने पेशे में सम्मान बनता है। अब ननी पालकीवाला की बात करते हैं। वे ज्ञान के सागर थे। वे टाटा समूह से भी जुड़े थे। पर वे मुफ्त में भी बहुत से केस लड़ते थे।जहां पर मानवाधिकारों या जनवादी अधिकारों के हनन से जुड़े मसले सामने आते थे वे बिना हिचक सामने आ जाते थे।

निश्चित रूप से ये सभी चोटी के विधिवेत्ता देश भर के छोटे-बड़े न्यायालयों में वकालत करने वाले वकीलों के मार्गदर्शक और आदर्श होने चाहिए। ये सच है कि निचली अदालतों में अब भी बहुत कुछ सुधारे जाने की गुंजाइश है। वहां पर तारीखों पर तारीखों के कारण अधिकांश मुवक्किल तबाह हो रहे हैं। वह न्याय के इंतजार में कई बार संसार से विदा भी हो जाते हैं। किसे नहीं पता कि निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मामलों की तादाद में बढ़ती ही जा रही है। आखिर इस मसले का हल कहां है? इस मसले का हल तो तब ही होगा जब जजों के हर स्तर पर खाली पड़े पदों को भरा जाए।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों के न्यायाधीशों के अवकाश कम करने से लंबित पड़े मामले घट सकते हैं। जरा सोचिए कि में दिल्ली में सिखों के कत्लेआम के लिए जिम्मेदार बहुत से पीड़ितों को अभी तक न्याय नहीं मिला है। यही स्थिति भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों की है। पीड़ितों को कोर्टे से लगभग साढ़े तीन दशक बीत जाने के बाद भी तारीखों पर तारीखें ही मिल रही हैं।

जाहिर है कि किसी को भी किसी वकील के रोज 50 लाख रुपये या उससे भी अधिक कमाने से कोई गुरेज नहीं हो सकता। पर चूंकि ये नामवर वकील अपने क्षेत्र के शिखर पर है, इसलिए इनसे कम से कम आम जनता की दो अपेक्षाएं तो हैं। पहली, कि ये कुछ केस बिना फीस के भी लेकर लड़ें। इनसे इनका मन बढेगा और नुकसान भी कुछ न होगा। दूसरा, यह सरकार और अपनी बिरादरी के वकीलों से मिलकर न्यायालयों में लंबित पड़े मामलों को जल्द निपटाने के दिशा में भी सक्रिय पहल करें। इनकी इस पहल से देश में इंसाफ मिलना त्वरित गति से शुरू हो जाएगा। ये चाहें तो ‘तारीख पर तारीख’ के कोढ़ से देश की न्याय व्यवस्था को मुक्ति दिलवा सकते हैं।

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