Sunday 26 June 2022
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पॉर्न — यह कैसी आज़ादी?

सरकार ने पॉर्न साइट्स पर रोक क्या लगाई, सोशल मीडिया पर दबाव का पहाड़ खड़ा हो गया। कुछ सोशलाइट्स एक टांग पर खड़े हो कर यह चिल्लाने लगे हैं कि सरकार ने इंटरनेट की दुनिया का तालिबानीकरण कर दिया है। कुछ प्रगतिशील लेखकों ने यहाँ तक कह दिया कि देश में दमन की शुरुआत ऐसे ही होती है। कुछ बड़े नाम वालों को लगता है कि लोकतंत्र की पूरी मर्यादा पॉर्न देखने के बाद ही सुरक्षित रह सकती है तो कुछ का कहना है कि यह मोदी सरकार देश में अघोषित आपातकाल लगाने वाली है। सरकार ने आम आदमी की प्रतिक्रिया जाने बिना ही कुछ कथित सोशलाइटों के दबाव में आकर दो दिन में ही प्रतिबंध को उठा लेने की घोषणा कर दी और इस तरह से समाज में फैल चुकी एक बड़ी बीमारी का ऑपरेशन टेबल पर ही रोक दिया गया।

इंदौर के अधिवक्ता और समाजसेवी कमलेश वासवाणी की पहल पर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे इस मामले का पटाक्षेप कर दिया गया। कमलेश दिल्ली के ‘निर्भया’ कांड से व्यथित होकर 857 पॉर्न साइट्स को बंद करने की याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुँचे थे जिन तक भारत में धड़ल्ले से मोबाइल फ़ोन के ज़रिए भी पहुँचा जा सकता है। कमलेश का कहना है कि पॉर्नॉग्रफ़ी के कारण भी देश में बलात्कार की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

क्या सचमुच पॉर्न देखने की छूट ही सामाजिक सरोकार के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी है? क्यों यह पॉर्न ही स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का माध्यम है? किसी के पास इसका तर्क नहीं, जवाब नहीं। सामाजिक पहलुओं की कसौटी पर कसने की भी किसी को फ़ुर्सत नहीं। सुप्रीम कोर्ट का भी कहना है कि जब तक चारदिवारी के अंदर कोई पॉर्न देखता है तब तक इस पर रोक लगाने की कोई ज़रूरत नहीं है। कुछ समाज के प्रगतिशील लोग भी इसी बात का सहारा ले रहे हैं। लेकिन हक़ीक़त क्या है जब से मोबाईल फ़ोन पर हाइ-स्पीड इंटरनेट की सुविधा आई है तब से यह पॉर्नॉग्रफ़ी चारदिवारी की चीज़ नहीं रह गई है। मोबाइल से ही फ़िल्में बनाकर वहीं से तुंरत लोगों के बीच प्रसारण करने की घटनाओं की बाढ़ आ गई है। और तो और, अब विधानसभा कक्ष में भी पॉर्न फ़िल्में देखी जा रही हैं! जब कोई बड़ी घटना होती है तब यही सोशल महारथी टीवी चैनलों पर आकर सरकार और सरकारी व्यवस्था को तमाम लानत-मलानत भेजते हैं लेकिन जब बात इसकी रोक थाम पर आती है तो उनकी स्वतंत्रता का हनन हो जाता है। उनकी आज़ादी छिन जाती है!

जहाँ से यह पॉर्न की दुनिया ईजाद हुई है वहाँ के हालात और वहाँ की सरकार की बेबसी का भी किसी को समझने जानने से मतलब नहीं। पॉर्न की आज़ादी को अपनी आज़ादी से जोड़ कर देखने वालों को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून का यह वक्तव्य शायद कुछ मायूस करे पर यह जान लेना ठीक रहेगा कि खुलेपन के लिए विख्यात पश्चिम के प्रमुख देश ब्रिटेन का प्रधानमंत्री पॉर्न के असर की व्यथा किस प्रकार व्यक्त करता है

एक राजनेता और एक पिता होने के नाते मैं गंभीरता से यह विचार कर रहा हूँ कि पूरे ब्रिटेन में पॉर्न पर रोक लगाने का समय आ गया है। क्योंकि हम आख़िर अपने बच्चों की, उनकी मासूमियत की रक्षा कैसे करेंगे?

यह बेचैनी सिर्फ कैमरून की नहीं है, हर उस माता पिता या ज़िम्मेदार शासक की है जिसे अपनी पीढ़ी को तमाम अन्य व्यसनों की तरह पॉर्नॉग्रफ़ी से भी बचानी है। भारत इसका तेज़ी से शिकार हो रहा है। आए दिन यह खबर आती है कि किसी सोशल साइट से हुई दोस्ती, फिर प्यार और फिर शारीरिक संबध के बाद अंत में हत्या। हर हत्या के बाद आम नागरिक और आम अभिभावक में अपने बच्चों को लेकर डर और फिर बच्चों का मानसिक प्रताड़ना।

यह सिलसिला तब से और तीव्र हो गया है जब से स्मार्ट फ़ोन और फिर उसमें इंटरनेट की सुविधा आ गई है। घर से लेकर बाज़ार तक। ट्रेन से लेकर हवाई जहाज़ तक हमारी युवा पीढ़ी बस वीडियो ही देख रही है। ज़ाहिर है, पहले उत्सुकता और फिर लत के कारण पॉर्नॉग्रफ़ी देखने की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। यह केवल हम नहीं कह रहे हैं; इस पॉर्नॉग्रफ़ी का धंधा चलाने वाले कह रहे हैं कि हमारे देश में चार करोड़ लोग यह पॉर्न फिल्में देख रहे हैं। एक अंग्रेज़ी अखबार ने किसी सर्वे के हवाले से यह कहा है कि भारत में महिलाएँ या बच्चियाँ सबसे ज़्यादा पॉर्न साइट्स देखती हैं। ब्राज़ील और इंडोनेशिया के बाद भारत तीसरा देश है जहाँ की महिलाएँ सबसे अधिक — लगभग 30% — पॉर्न साइट्स देखती हैं। ज़ाहिर है यह आकड़ा हमारे लिए गर्व की बात नहीं होगी।

भारत में अब इस पॉर्न महामारी के प्रति सरकार कुछ गंभीर हुई है, पर दुनिया के कई देश पहले से ही इसके दुष्परिणाम की चर्चा कर रहे हैं और उस पर रोक लगाने की कोशिश कर रहे है। उनमें से ही एक देश मिश्र भी है। 2009 में तब के राष्ट्रपति होसनी मुबारक ने पॉर्नॉग्रफ़ी पर रोक लगा दी थी। अभी भी वहाँ पॉर्न साइट्स पर प्रतिबंध लगाने की कोशिशें जारी हैं, पर वहाँ भी कुछ लोगों की लगातार पॉर्न-समर्थन मुहिम के कारण रोक असरदार नहीं हो पाई। अब भी वहाँ ट्वीटर और विकीपीडिया के बाद सबसे अधिक पॉर्न साईट्स ही देखे जा रहे हैं। पॉर्नसाइट्स को रोकने का गंभीर प्रयास यूरोपीय देशों में भी हो रहा है। यूरोपीय यूनियन के अधिकतर सांसद पॉर्न के ख़िलाफ़ हैं। इस पर रोक लगाने के लिए एक बार विधेयक भी लाया गया। लेकिन खुलेपन के समर्थकों ने इस विधेयक को पारित नहीं होने दिया, लेकिन पॉर्न उद्योग के प्रचार पर रोक लगा दी गई है।

केवल कुछ देशों में ही नहीं पॉर्नॉग्रफ़ी के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में सामाजिक आंदोलन चल रहे हैं। अमरीका में भले ही पॉर्नॉग्रफ़ी साइट्स पर रोक नहीं, लेकिन जब राष्ट्रपति बराक ओबामा अपनी बेटियों के फ़ेसबुक पेज बद करने की घोषणा सार्वजनिक करते हैं तो यह समझा जा सकता है कि अमरीकी नागरिक किस तरह इस सोशल मीडिया पर नंगेपन या पॉर्नॉग्रफ़ी से व्यथित हैं । यह जानकर आश्चर्य होगा कि अमरीका में आज से नहीं बल्कि 1969 से ही पॉर्नॉग्रफ़ी के ख़िलाफ़ सामाजिक आंदोलन चल रहा है। एक पादरी मोर्टन ए हिल ने “मोरॅलिटी इन मीडिया” के नाम से एक मंच बनाया जो उनके मरने तक पॉर्नॉग्रफ़ी का विरोध करता रहा। 1990 के दशक में तत्कालीन राष्ट्रपति रोनल्ड रेगन ने पॉर्नॉग्रफ़ी का अमरीकी समाज पर असर के अध्ययन के लिए एक कमीशन का गठन किया था जिसे मैसी कमीशन का नाम दिया गया। अटर्नी जनरल एडविन मैसी के नेतृत्व में गठित 11 सदस्यीय समूह ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा था कि पॉर्नॉग्रफ़ी अमरीकी युवकों के मानसिक सोच और स्वास्थ्य के लिए बहुत ही ख़तरनाक है। अमरीका में अभ भी लगातार इस बात पर विचार चल रहा है कि क्या पॉर्नॉग्रफ़ी को बंद किया जा सकता है।

पॉर्नॉग्रफ़ी पर रोक लगाने के मामले में ब्रिटेन ने सबसे ठोस काम किया है। वर्ष 2004 में जब जेन लॉन्गहर्स्ट की हत्या ग्रैहम कूट्स ने की थी तो यह तथ्य सामने आया था कि कूट्स ने जेन की हत्या करने से पहले हिंसक यौन फिल्म देखी थी और उसमें दिखाई गई एक सीन को दोहराते हुए उसने जेन की गला दबाकर हत्या कर दी थी। तभी से ब्रिटेन में पॉर्नॉग्रफ़ी पर रोक या उस पर अंकुश लगाने की ठोस क़ानूनी पहल शुरू हो गई। जेन की माँ लिज़ लॉन्गहर्स्ट और सरकार ने मिलकर ब्रिटेन में पॉर्नॉग्रफ़ी पर प्रतिबंध लगाने का अभियान चलाया था। 2009 में ब्रिटिश सरकार ने क्रिमिनल जस्टिस एंड इमीगे्रशन एक्ट 2008 के सेक्शन 63 के तहत यह प्रावधान किया है कि यदि किसी पर पॉर्नॉग्रफ़ी की फिल्में बाँटने, दिखाने या होने का आरोप सिद्ध हो जाता है तो उसे तीन साल की जेल हो सकती है। क्या भारत में इस तरह के क़ानून नहीं बन सकते? क्या भारत के समाज में इस तरह का जनजागरण नहीं है? है, पर सरकार की चेतना उन तक नहीं जाती या फिर उनकी आवाज़ की गूंज सरकार को नहीं सुनाई देती। लानत है ऐसे सोशल अॅनलिस्ट्स पर जिनके लिए नग्नता ही सभ्यता है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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Bikram Upadhyay
Bikram Upadhyay
संपादक, स्वराज पत्रिका

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