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Tuesday 7 July 2020

नागरिक सुरक्षा की उपेक्षा आखिर कब तक

मौसम वैज्ञानिकों की रिपोर्ट पर गौर करें तो दीपावली और होली के अवसर पर या अन्य त्यौहारों पर जब हतुयात में आतिशबाजी का प्रयोग होता है तो वातावरण में प्रदूषण का स्तर बेहद बढ़ जाता है

तापमान रोज बढ़ रहा है। सूर्यदेव की उग्रता देखते ही बन रही है। कई जगह झुलसा देने वाली लू या उलझन पैदा करने वाली उमस लोगों की परेशानी का सबब बनी हुई है। एक ओर जहां पूरा देश विश्व पर्यावरण दिवस मनाने को बेताब है है, वहीं उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लोग मातम मना रहे हैं। यहां के काकोरी थाना क्षेत्र के मुन्नाखेड़ा में बारूद के संग्रहण की वजह से हुए भीषण विस्फोट में एक दो मंजिला मकान का जमींदोज हो जाना सामान्य घटना नहीं है। इस हादसे में बगल के दो और मकान भी क्षतिग्रस्त हो गए हैं। दो लोगों की जान चली गई है और अनेक घायल हैं। इस मकान में लंबे समय से बारूद का संग्रह हो रहा था जिसका उपयोग मकान को किराये पर लेने वाला व्यक्ति पटाखे बनाने में किया करता था। सवाल उठता है कि क्या नागरिक आबादी के बीच बारूद का संग्रह किया जा सकता है? क्या वहां पटाखे बनाए जा सकते हैं, कोई भी पढ़ा-लिखा आदमी कहेगा कि नहीं क्योंकि उसे आम आदमी की सुरक्षा की चिंता है लेकिन पुलिस महकमे को इसकी कोई चिंता नहीं है। प्रदेश को अपराध मुक्त और भयमुक्त करने का दावा करने वाले प्रशासन को इसकी कहीं कोई फिक्र नहीं कि कहां क्या हो रहा है?

पटाखे के गोदामों में आग लगने की घटनाएं गर्मियों में बहुत आम हैं लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि सुरक्षा मानकों की पूरी तरह अनदेखी कर दी जाए। पहली बात तो नागरिक आबादी के बीच पटाखे के गोदाम होने ही नहीं चाहिए और किसी मकान में बारूद एकत्र करना तो अपने आप में बेहद गंभीर अपराध है। मकान मालिको को भी केवल किराए से मतलब होता है, वे न तो किरायेदारों के बारे में माकूल जानकारी रखते हैं और न ही इस बात की तस्दीक करना मुनासिब समझते हैं कि मकान किराये पर लेने वाला व्यक्ति मेकान का किस रूप में उपयोग करेगा या कर रहा है? लगता है जिला और पुलिस प्रशासन को इस तरह की घटनाओं का ही इंतजार होता है। दुर्घटनाओं के बाद ही वह अपनी कुंभकर्णी नींद से जागता है। कुछ दिन तक तो घर-पकड़ चलती है। घटना के तार एक दूसरे से जोड़े जाते हैं लेकिन कुछ ही दिन बाद पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। आदमी की जिंदगी से खेलने का करोबर पिफर बदस्तूर फलने-फूलने लगता है। इसके एवज में अधिकारियों को भी खुशी का जरिया मिल जाता है। देश में पटाखा फैक्ट्री और गोदाम में विस्फोट से हर साल सैकड़ों लोग काल-कवलित होते हैं। सरकार के स्तर पर मृतकों और आहतों के परिवार को यथेष्ठ मुआवजा राशि भी दी जाती है लेकिन मुआवजा दे देना ही समस्या का समाधान नहीं है। समस्या का वास्तविक समाधान तलाशा जाना चाहिए। बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण को लेकर पूरी दुनिया चिंतित है, वहीं पटाखों को लेकर भारत और अन्य देशों का आग्रह समझ से परे हैं।

मौसम वैज्ञानिकों की रिपोर्ट पर गौर करें तो दीपावली और होली के अवसर पर या अन्य त्यौहारों पर जब हतुयात में आतिशबाजी का प्रयोग होता है तो वातावरण में प्रदूषण का स्तर बेहद बढ़ जाता है। लोगों को सांस लेने में परेशानी होने लगती है। यही नहीं, एलर्ती और दमे का खतरा भी पूर्वापेक्षा बढ़ जाता है। जनोत्साह को नजरंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन ऐसा जनोत्साह क्या जो लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ जाए। पटाखे तो विदेशों में भी फूटते हैं। आतिशबाजी तो वहां भी होती है लेकिन वहां पटाखों के निर्माण और रख-रखाव में काफी सावधानी बरती जाती है। भारत में तो पटाखों के कारखानों में, उनके गोदामों में अक्सर आग लगती ही रहती है। दरअसल हमें विदेशों की नकल जहां करनी चाहिए, वहां हम नहीं करते लेकिन जहां नहीं करना चाहिए, वहां जरूर करते हैं। अपना सुख ही सच्चा सुख है लेकिन हमें दूसरे के दुखों की भी चिंता करनी होगी। पड़ोसी का खेत सूखा हो तो आपके खेत में घुल्ला हो ही जाता है। पड़ोसी के सुख में ही सबका हित निहित है। भारत में तो आम्र्स फैक्ट्रियों में भी आग लग जाती है। हर साल लगती है और इसमें लाखों-करोड़ों का गोला-बारूद जलकर राख हो जाता है। आग अधिकारियों और कर्मचारियों को सुरक्षा का एक कोना भी मुहैया कराती है। यह भी विचार का विषय है। सरकारी कार्यालयों, आम्र्स फैक्ट्रियों में आग खुद लगती है या लगाई जाती है, आजादी के बाद से आज तक की किसी भी रिपोर्ट में इसका खुलासा नहीं हो सका। पाकिस्तान में कभी आम्र्स फैक्ट्री में आग नहीं लगती। वहां गोला-बारूद सहज ही जलकर नष्ट नहीं जाते। चीन, रूस, अमेरिका और यहां तक कि छोटे देशों में भी इस तरह की खबरें बहुत कम आती है। लापरवाही के मामले में भारत विश्व का अव्वल देश है। दुनिया के किसी भी देश में उतने रेल हादसे नहीं होते, जितने भारत में होते हैं। उतने सड़क हादसे नहीं होते जितने भारत में होते हैं।

गति के मामले में वे हमसे बीस हैं तो हादसे के मामले में हम उनसे बीस हैं। बिल्कुल नवली नवै न गहमर टरै वाली स्थिति है। इस देश में अधिकारी-कर्मचारी सर्वप्रथम अपना हित देखते हैं। इसके बाद ही वे जनता के हित का विचार करते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ ही नहीं, उसके हर शहर में गैस एजेंसियों ने अपने गोदाम नागरिक आबादी के बीच खोल रखे हैं। ऐसे सिलेंडरों से घरों में गैस सप्लाई दी जा रही है जो सर्वथा कालबाधित हो गए हैं। जिनकी पेंदी तक घिस गई है। कोई देखने-सुनने वाला नहीं है। वाहनों से उतारते-चढ़ाते वक्त भी उसके फटने की चिंता नहीं की जाती। धम्म से सड़क पर पटक दिया जाता है। पूरे देश भर में गैस एजेंसियों के कमोवेश यही हाल हैं। पटाखा फैक्ट्रियों का गुपचुप कारोबार हर शहर में हो रहा है। पुलिस प्रशासन जान-बूझकर आंखें मूंदे रहता है। नागरिक हितों की अनदेखी देश हित में नहीं है। सुरक्षा को लेकर सभी को चैतन्य रहना होगा? शिकायत करना सीखना होगा। एक पड़ोसी की नाराजगी से बचने के लिए कई पड़ोसियों और उनके परिवारों की सुरक्षा की अनदेखी नहीं की जा सकती। सरकार को भी इस बावत ध्यान देना होगा। उसे इस बावत ठोस रणनीति बनानी होगी।

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