Monday 18 October 2021
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‘सभी संगठनों से मुक्त’ जामिया शूटर ‘बजरंग दल’ का कैसे हो गया?

जामिया क्षेत्र में गोली चलाने से पहले 'रामभक्त गोपाल' ने अपनी प्रोफ़ाइल बदली और धड़ल्ले से दक्षिणपंथी संगठनों व एक पार्टी के नाम दर्ज कर दिए

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जामिया मिलिया इस्लामिया के कैम्पस के बाहर प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने वाले व्यक्ति कथित रामभक्त गोपाल की सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल के अध्ययन से प्रथमदृष्टया मालूम होता है कि यह मोहनदास गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे की तरह किसी भी संगठन से जुड़ा नहीं है। और यह व्यक्ति गोडसे की ही तरह घर बैठे हिन्दुओं के साथ हो रहे ‘अन्याय’ का बदला लेने के मनसूबे बनाता है।

हालांकि इसने ख़ुद को हिंदुत्ववादी साबित करने के लिए उसी प्रकृति के कई पोस्ट्स साझा किए, उनमें से पुराने एक पोस्ट में उसने साफ़-साफ़ बताया था कि वह किसी भी संगठन से जुड़ा नहीं है। पर अचानक जामिया क्षेत्र में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाते हुए शादाब फ़ारुख़ नामक छात्र को ज़ख़्मी करने से पहले उसने अपनी प्रोफ़ाइल बदली और धड़ल्ले से जितने भी दक्षिणपंथी संगठन और एक राजनैतिक पार्टी उसे याद आए, सबके नाम दर्ज कर दिए। इनमें बजरंग दल के अलावा भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उल्लेख है।

‘रामभक्त गोपाल’ नॉएडा के जेवर इलाक़े का निवासी है जहाँ इन दिनों नए हवाई अड्डे के निर्माण की चर्चा है। यह व्यक्ति सोशल मीडिया में उसी के द्वारा दिए गए जानकारी के अनुसार मूलतः मेरठ का है। हावभाव में ठेठ देहाती सा व्यवहार करने वाला यह शख़्स उर्दू के जानकारों की तरह “जज़्बे” में आधे ‘ज’ के नीचे नुक़्ता डालता है जब कि किसी अर्द्धवर्ण के नीचे नुक़्ता डालना काफ़ी मशक़्क़त का काम है जो केवल ऐसे लेखक करते हैं जिन्हें अरबी और फ़ारसी मूल के शब्दों की जानकारी होने के कारण नुक़्ते की ग़ैर-मौजूदगी में छटपटाहट होती है।

हैरानी की बात है कि वही व्यक्ति हिन्दी के शब्द लिखते वक़्त वर्तनी का ध्यान नहीं रखता, “बाक़ी” को “वाकी”, “में” को “म” और “हूँ” को “हु” लिखता है।

फ़ेसबुक में दिए वर्णन के अनुसार यह पुणे के JSPM अर्थात जयवंतराव सावंत कॉलेज का छात्र या स्नातक है। चूँकि यह इंजीनियरिंग कॉलेज है, उसे क़ायदे से अभियंता होना चाहिए, पर उसके तमाम पोस्ट्स से उसके उच्च शिक्षित होने के दावे पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।

28 जनवरी को फ़ेसबुक पर उसने लिखा था “#तांडव… नाम तो सुना होगा, अब देखोगे”। जामिया वाली घटना के ठीक कुछ देर पहले ही उसने अपडेट डाला — “सभी मुझे see first कर लें”।

लगभग इसी समय किसी भी संगठन से न जुड़े होने का दावा करने वाले व्यक्ति ने अपनी फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल बदलकर ख़ुद को “बजरंग दल या आरएसएस” और भाजपा का भी होने का दावा किया।

जब पुलिस ने दावा किया कि शख़्स नाबालिग है तो यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ कि किसी नाबालिग के हाथों बंदूक़ किसने थमा दी? यदि पिस्तौल वह घर से परिवार के बड़ों की जानकारी के बग़ैर ले आया था तो उसका परिवार बंदूक़ के लाइसेंस का अधिकारी तो नहीं लगता!

इससे कहीं ज़्यादा अजीब बात यह है कि पुलिस की हिरासत में होने के बावजूद यह फ़ेसबुक पर पोस्ट डाले जा रहा है। इस लेख की ड्राफ्टिंग के समय से 11 घंटे पहले उसने एक पोस्ट डाला था और तीन घंटे पहले एक और

इसके अलावा ‘रामभक्त गोपाल’ की शिनाख़्त करने वाली मीडिया पर यह सवाल उठ रहा है कि अचानक हुई गोलीबारी की तस्वीर इतनी स्पष्ट कैसे खींची गई? क्या फ़ोटो खींचने वाले को पता था कि जामिया क्षेत्र में किस जगह किस वक़्त ‘गोपाल’ अपने मनसूबे को अंजाम देगा?

'सभी संगठनों से मुक्त' जामिया शूटर 'बजरंग दल' का कैसे हो गया?

ये तमाम सवाल ज़रूरी हैं क्योंकि इससे पहले कई बार इस तरह के राजनैतिक नाटक का मंचन हुआ है। देश भर में और ख़ास कर दिल्ली में। दिल्ली के मुख्यमंत्री व आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल पर स्याही फेंका जाना, उन्हें कई बार थप्पड़ पड़ना, जंतर मंतर में राजस्थान से आए किसान की ‘आप’ के कार्यक्रम के दौरान आत्महत्या — इन सभी घटनाओं के कुछ दिनों बाद हर बार यह सामने आया कि प्रथमदृष्टया जिन पर शक हुआ था, वे दोषी नहीं थे। ख़ास कर थप्पड़ जड़ने और स्याही फेंकने वाले आख़िर ‘आप’ के ही पूर्व कार्यकर्ता या हितैषी साबित हुए।

परन्तु यहाँ भाजपा को घेरने का अच्छा मौक़ा था। दो दिन पहले एक रैली में केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर “देश के गद्दारों को, गोली मारो *लों को” का नारा लगाकर चुनाव आयोग द्वारा प्रतिबंधित कर दिए गए थे। कल कांग्रेस के आइटी सेल वालों ने यह ट्विटर पर लिखा भी कि जिस देश के मंत्री ऐसी बात करते हैं वहाँ ऐसी घटनाओं का घट जाना अनपेक्षित नहीं है।

लोगों को घटनाक्रम से शक हो रहा है कि यहाँ ठाकुर के नारे का फ़ायदा उठाने का मौक़ा था, सिर्फ़ नाटक के मंचन के लिए सही अभिनेता की आवश्यकता थी जो ‘रामभक्त गोपाल’ के रूप में विपक्ष को मिल गया।

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Surajit Dasgupta
Co-founder and Editor-in-Chief of Sirf News Surajit Dasgupta has been a science correspondent in The Statesman, senior editor in The Pioneer, special correspondent in Money Life, the first national affairs editor of Swarajya, executive editor of Hindusthan Samachar and desk head of MyNation

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