हिन्दी के सबसे प्रखर और ओजपूर्ण प्रवक्ता अटल बिहारी वाजपेयी जी अपनी अनंत यात्रा पर तब निकले जब अगले दिन ही मारीशस में विश्व हिन्दी सम्मेलन (18-20 अगस्त) शुरू हो रहा है। हिन्दी को विश्वमंच पर लाने की पहली सार्थक और ठोस पहल अटल जी ने ही की थी। पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 में नागपुर में आयोजित हुआ था। जिसमें पारित प्रस्ताव में कहा गया था, ‘‘संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिलाया जाए।’’ 

इसके दो वर्ष बाद ही अटल बिहारी वाजपेयी ने अक्टूबर, 1977 को  जनता पार्टी की सरकार के विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में हिन्दी में जोरदार भाषण दिया था। उनसे पहले किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री ने हिन्दी का प्रयोग संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर नहीं किया था। अटल जी के उस भाषण के बाद पूरे देशभर में ही नहीं विश्वभर के हिंदी प्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ गई थी।  उन्होंने हिन्दी में अपनी बात रखकर एक तरह से संयुक्त राष्ट्र महासंघ से यह पुरजोर मांग की थी कि हिन्दी को उसका उचित स्थान हर स्तर पर मिलना ही  चाहिए।

निश्चित रूप से संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में भाषण देकर

अटल बिहारी वाजपेयी देश के रातों-रात विश्वभर के हिंदी भाषियों और गैर हिंदी भाषी हिंदी प्रेमियों के भी नायक बन गए थे। वे संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए अपने भाषण को अपने जीवन के सबसे सुखद पलों के रूप में याद करते थे। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के भाषण में कहा था-सरकार की बागडोर संभाले अभी हमें केवल छ: महीने ही हुए हैं। फिर भी इतने कम समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं। भारत में मूलभूत मानवाधिकार पुन: प्रतिष्ठित हो गए हैं। जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था वह अब खत्म हो गया है। ऐसे संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं कि यह सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा।

वसुधैव कुटुम्बकम की भारतीय परिकल्पना बहुत पुरानी है। भारत में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है। अनेकानेक प्रयत्नों और कष्टों के बाद संयुक्त राष्ट्र के रूप में इस स्वप्न के साकार होने की संभावना है।” 

अटल जी ने 1977 में जो  किया थाउसे अब आगे बढ़ाया

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्विटजरलैंड के शहर डावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के सम्मेलन में हिन्दी में अपना भाषण दिया। उनके डावोस में दिए भाषण के बाद कुछ चिर निराशावादी और अपने को प्रगतिशील कहने वाले बुद्धिजीवी यह भी कहने लगे थे कि चूंकि भाषण हिन्दी में दिया गया हैइसलिए इसे विश्व प्रेस में जगह नहीं मिलेगी। लेकिनहुआ इसके ठीक विपरीत। सारी दुनिया के महत्वपूर्ण मीडिया ने मोदी जी के भाषण को पर्याप्त कवरेज दी। दरअसल अब भारत का प्रधानमंत्री अगर किसी बड़े मंच से किसी भी भाषा में बोलता हैतो उसे सुना जाता है। यह कतई जरूरी नहीं है कि वो अंग्रेजी में ही बोले। प्रधानमंत्री के हिन्दी में दिए भाषण को मीडिया नजरअंदाज नहीं कर पाया। यह भारत की बढ़ती हुई आर्थिक शक्ति को भी दर्शाता है। 

 अटल के भाषण के बाद हिन्दी की छलांग

अटल बिहारी वाजपेयी के उस महान भाषण के पश्चात  भी हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र में उसका उचित स्थान नहीं मिल पाया है। यह तो एक सर्वविदित तथ्य है। पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इन चार दशकों के दौरान हिन्दी ने एक लंबी छलांग लगाई है। अब हिन्दी दुनिया की एक बड़ी ही महत्वपूर्ण भाषा का दर्जा ग्रहण कर चुकी है। अब हिन्दी समूचे संसार में बोली जा रही है। फीजीसूरीनाममारीशसनेपालत्रिनिडाड,गयाना में हिन्दी का लगभग वही स्थान है,जो इसका अपने देश में है। हिन्दी को बोलने वाले चीनी भाषा के बाद विश्व में सबसे ज्यादा हैं। यानि की अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश आदि से कहीं ज्यादाl यह मानना होगा कि सारी दुनिया में हिन्दी को स्थापित करने में दो अति महत्पूर्ण कारक रहे हैं। पहलासारे संसार में बसे भारतवंशीदूसराहिन्दी फिल्में।भारतवंशी सिर्फ हिन्दी भाषी प्रांतों से ही सात समंदर पार नहीं गए थे। वे उत्तर प्रदेशबिहार, उड़ीसा, बंगाल, असम, तमिलनाडू,पंजाबगुजरातमहाराष्ट्र वगैरह राज्यों से संबध रखते हैं। यानी वे हिन्दी के अलावा भी अन्य भाषा-भाषी हैं। इनका अब भारत से भावनात्मक संबंध बचा है। इस बीचबीते लगभग 200 वर्षों से विभिन्न देशों में भारतीय कामकाज के लिए जाने लगे हैं। इन्हें हम बोलचाल की भाषा में भारतवंसी या एनआरआई यानी नॉन रेजिडेंट इंडियन भी कहते हैं। ये भी सारे के सारे हिन्दी भाषी नहीं हैं। लेकिन इसमें से अधिकांश के पास भारतीय पार्सपोर्ट है। भारतवंशी और एनआरआई बिरादरी में एक समानता साफ है। ये भारत से निकलकर किसी भी अन्य देश में बसने के साथ ही हिन्दी से जुड़ जाते हैं। ये अपने बच्चों को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित करते हैं।

 हिन्दी और हिन्दी फिल्में

विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर इस बिन्दु पर भी आख़िरकार यह गहन चर्चा हो ही जानी चाहिए कि अफ्रीका से लेकर यूरोपअमेरिका,चीन वगैरह में हिन्दी को स्थापित करने में

हिन्दी फिल्मों की किस तरह की भूमिका रही हैयह सिलसिला वस्तुतः राजकपूर ने ही शुरू किया था। एक दौर में सोवियत संघ की जनता राज कपूर कीआवारा”, श्री420”, “मेरा नाम जोकर” समेत तमाम फिल्मों को इसलिए पसंद करती थीक्योंकिउनमें उनके लिए आशा की एक किरण दिखती थी, भविष्य को लेकर एक संभावना का संदेश मिलता था। राजकपूर की फिल्में कभी निराशावादी नहीं होती थीं। उसके बाद के वर्षों-दशकों में दुनिया ने तमाम परिवर्तन देख लिए। हिन्दी फिल्में विदेशों में अब तो जमकर देखी जा रही हैं। इन्हें भारत से बाहर बसे तीन करोड़ भारतीयों का बाजार मजे से मिल जाता है। डालर में टिकट भी बिकता हैl अब तो हिन्दी फिल्में तो चीन में भी खूब देखी जा रही हैं। आमिर खान चीन के सुपर स्टार बने हुए हैं। चीन में उनकी फिल्में आराम से 100 करोड़ से ऊपर का बिजनेस कर जाती है। जब चीन में आमिर खान की फिल्में प्रदर्शित होती हैंतो वो वहां पर छा जाती हैं। जाहिर हैयह एक प्रमाण है कि चीन में हमारी फिल्मों के माध्यम से हिन्दी पहुंच रही है। आप कभी अफ्रीकी देश मिस्र चले जाइये। वहां के सबसे बड़े नायक अमिताभ बच्चन हैं। वहां पर सड़क पर चलने वाले हर व्यक्ति को अमिताभ बच्चन की कई फिल्मों के चुनिंदा संवाद याद हैं। तो यह है हिन्दी फिल्मों की ताकत। पूर्वी अफ्रीकी देशों जैसे केन्यातंजानियायुगांडा में धर्मेन्द्र खासे लोकप्रिय रहे हैं। वहां पर हिन्दी फिल्मों को चाहने वाले कम नहीं हैं। मैं तो यह मानता हूं कि हिन्दी फिल्मों के गीतकार जैसे जावेद अख्तरशैलेन्द्रआनंद बख्शी,साहिर लुधियानवी, नीरज, समीरप्रसून जोशी वगैरह किसी भी नामवर हिन्दी के लेखक या कवि से कम नहीं हैं। इनके लिखे गीत देश से बाहर भी करोड़ों लोग गुनगुनाते हैं। यह बात ही संवाद लेखकों के संबंध में भी कही जानी चाहिए।

 हिन्दी समाज को हिन्दी के विदेशी सेवियों के प्रति भी अपना आभार व्यक्त करना चाहिए। यहां ब्रिटेन के प्रो. रोनाल्ड स्टुर्टमेक्ग्रेगर का उल्लेख करना परम आवश्यक है। प्रो. रोनाल्ड  हिन्दी के सच्चे सेवक थे। वे1964 से लेकर 1997 तक कैम्बिज यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाते रहे।  वे चोटी के भाषा विज्ञानीव्याकरण के विद्वान,अनुवादक और हिन्दी साहित्य के इतिहासकार थे। देखिए, किसी भी भाषा का सही विकास तब ही होता हैजब उसे वे लोग भी पढ़ाने लगे जिनकी वो मातृभाषा नहीं है। अब प्रो. मेक्रग्रेगर को ही लें। वे मूल रूप से ब्रिटिश नागरिक हैं। उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर गंभीर शोध किया। उन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास पर दो खंड तैयार किए। यहां चीन के प्रोफ़ेसर च्यांग चिंगख्वेइ की चर्चा होगी ही।  प्रो. च्यांगचिंगख्वेह ने चीन में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। वे लगभग 28 वर्षों से पेइचिंग यूनिर्वसिटी में हिन्दी पढ़ा रहे हैं। यही बात जापान के विश्वविद्यालय के हिंदी प्राध्यापकों के बारे में कह सकते हैं l यह परम आवश्यक है कि सारी दुनिया में प्रो. मेक्रग्रेगर और प्रोफ़ेसर च्यांग चिंगख्वेइ जैसे हिंदी सेवकों की संख्या बढ़े और बढ़ाई जाए। इन्होंने एक तरह से वही काम किया जो अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त महासभा में हिन्दी में भाषण देकर किया था। इसमें भारतीय सरकार का विशेष दायित्व बन जाता हैl