16.1 C
New Delhi
Monday 20 January 2020

कैराना में विकास पर भारी जातीय भावना

बीएसपी सुप्रीमो मायावती हालांकि इस चुनाव में अधिक सक्रिय नहीं रहीं, लेकिन उन्होंने बार बार अपने समर्थकों के बीच यह संदेश भिजवाया कि बीजेपी हर हाल में हारनी ही चाहिए

कैराना उपचुनाव के परिणाम आते ही उत्साहित विपक्ष ने कहा की कैराना में जिन्ना नहीं, गन्ना चला। आरएलडी नेता जयंत चौधरी ने दम ठोक कर कहा कि गन्ना किसानों की नाराजगी की वजह से ही बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा। लेकिन सच्चाई ये है कि कैराना में ना तो गन्ना चला और ना ही जिन्ना। वहां चली सिर्फ और सिर्फ जातीय भावना और छोटे चौधरी के प्रति सहानुभूति की लहर। गन्ना किसानों को पैसे मिलने या नहीं मिलने की बात का यहां कोई विशेष असर नहीं पड़ा। अगर किसी को इस बात में कोई शक हो तो वहां के हालात की समीक्षा कर सकता है। आरएलडी नेता जयंत चौधरी के दावे को माना जाये तो कैराना लोकसभा क्षेत्र के जिन इलाकों में गन्ना किसानों को अच्छी मात्रा में भुगतान हुआ था, वहां बीजेपी को अच्छी संख्या में वोट मिलना चाहिए था। लेकिन इसे विचित्र संयोग कहा जाना चाहिए कि बीजेपी उम्मीदवार मृगांका को उन इलाकों में अधिक वोट मिले, जहां गन्ना किसानों का कम भुगतान हुआ था। वहीं जिन इलाकों में किसानों को गन्ने का अधिक भुगतान किया गया था, संयोग से मृगांका सिंह उन्हीं इलाकों में अपनी विरोधी बेगम तबस्सुम हसन से पिछड़ गईं। सच्चाई यही है कि कैराना क्षेत्र में किसानों को गन्ने के भुगतान से ज्यादा प्रभावी मसला जातीय समीकरणों का सेट हो जाना रहा। अगर ऐसा नहीं होता तो गंगोह-नकुड़ विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी को नुकसान का सामना नहीं करना पड़ता। चुनाव परिणाम में यहां बीजेपी औंधे मुंह धड़ाम हो गई, जिसका असर मृगांका सिंह की हार के रूप में सामने आया। देखा जाये तो पूरे लोकसभा क्षेत्र में गंगोह और नकुड़ विधानसभा क्षेत्र ऐसे स्थान हैं, जहां गन्ना किसानों को सबसे अधिक भुगतान किया गया था, लेकिन इस भुगतान का बीजेपी प्रत्याशी को कोई चुनावी फायदा नहीं मिल सका।
इस लोकसभा क्षेत्र के सहारनपुर और शामली जनपद में तीन तीन चीनी मिलें हैं। शामली जिले के तीनों विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी प्रत्याशी को विपक्षी गठबंधन की प्रत्याशी से अधिक वोट मिले, वहीं गंगोह में बीजेपी 12अधिक वोट से पिछड़ गई, जबकि नकुड़ में विपक्षी उम्मीदवार में 18000 से अधिक वोटों की बढ़त कायम कर अपनी जीत सुनिश्चित कर ली। कैराना नगर में जहां गन्ना किसानों को तुलनात्मक रूप से कम भुगतान हुआ, वहां बीजेपी को 14000 वोटों की बढ़त मिली। इसी तरह शामली में भी कम भुगतान होने के बावजूद बीजेपी बढ़त बनाने में कामयाब रही। अगर देखा जाए तो शेरमारे शुगर मिल में गन्ना किसानों को 70 फीसदी, नानौता शुगर मिल से 63 फीसदी, सरसावा शुगर मिल से 60 फीसदी और थानाभवन शुगर मिल से गन्ना किसानों को 53 फीसदी पैसे का भुगतान हो गया था। लेकिन, इन शुगर मिल के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले गांवों या कस्बों में विपक्षी गठबंधन की प्रत्याशी बेगम तबस्सुम हसन बीजेपी प्रत्याशी मृगांका सिंह पर हावी रहीं। वहीं शामली शुगर मिल से गन्ना किसानों को सिर्फ 45 फीसदी और उन शुगर मिल से सिर्फ किसानों को महज 50 फीसदी पैसे का भुगतान होने के बावजूद बीजेपी प्रत्याशी आरएलडी के टिकट पर चुनाव लड़ रहीं तबस्सुम हसम पर बढ़त बनाने में कामयाब रही। सच्चाई तो यह है कि इस चुनाव में विपक्ष वह चाल चलने में सफल हो गया, जो पिछले विधानसभा या लोकसभा चुनाव में नहीं कर सका था। पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वोटरों ने जातीय भावना से ऊपर उठकर केंद्र में मोदी और राज्य में योगी की सरकार बनाने के लिए वोट किया था। लेकिन, इस उपचुनाव में विपक्षी पार्टियां हिन्दू वोटरों को अगड़ा, पिछड़ा, जाट और दलित के रूप में बांटने में सफल रहीं। आरएलडी की ओर से जयंत चौधरी गांव-गांव जाकर जाटों से अपने पिता चौधरी अजित सिंह को राजनीतिक जीवन देने की भीख मांगते रहे, तो पिछड़ों ने अखिलेश यादव की अपील पर और दलितों ने मायावती से गंठजोड़ के नाम पर बेगम तबस्सुम हसन को वोट किया। वहीं मुस्लिम वोटरों ने स्वाभाविक रूप से एंटी बीजेपी फोर्स के रूप में काम करते हुए आरएलडी प्रत्याशी के पक्ष में काम किया। बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव और पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में जिस तरह से विकास के नाम पर हिन्दू वोटरों को एकजुट कर लिया था, वैसा इस उपचुनाव में कर पाने में विफल रही वहीं विपक्ष में जातीय राजनीति करने वाली पार्टियों ने हिन्दू समाज को जातियों में तोड़कर आरएलडी उम्मीदवार की जीत का रास्ता आसान कर दिया। इस पूरे चुनाव में जो सबसे बड़ी बात दिखी वो थी जाटों के वापस आरएलडी के साथ जाने की। राजनीतिक शून्यता के कगार पर पहुंच चुके चौधरी अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी ने इस चुनाव को अपने अस्तित्व की रक्षा का सवाल बना लिया था। छोटे चौधरी गांव-गांव में यह कहकर संपर्क करते रहे कि अगर इस बार भी उनकी प्रत्याशी चुनाव हार गईं तो चौधरी चरण सिंह की बनाई पार्टी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी और जाट मतदाता खुद ही जाटों की पार्टी की विनाश की वजह बनेंगे।
इस बात का स्थानीय जाट मतदाताओं पर काफी असर पड़ा और बीजेपी की ओर जा चुके जाट वोटर एक बार फिर वापस आरएलडी के पक्ष में लौट आये। स्वाभाविक रूप से जाटों ने खुलकर आरएलडी के पक्ष में वोटिंग की वहीं धार्मिक आधार पर यहां के लगभग 93 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने भी आरएलडी के पक्ष में मतदान किया, जिससे बीजेपी की हार सुनिश्चित हो गई। बीएसपी सुप्रीमो मायावती हालांकि इस चुनाव में अधिक सक्रिय नहीं रहीं, लेकिन उन्होंने बार बार अपने समर्थकों के बीच यह संदेश भिजवाया कि बीजेपी हर हाल में हारनी ही चाहिए। मायावती की इस अपील का असर स्थानीय दलित मतदाताओं पर भी पड़ा। परिणाम ये हुआ कि बड़ी संख्या में दलित वोट भी विपक्षी उम्मीदवार बेगम तबस्सुम हसन के पक्ष में पड़े और बीजेपी प्रत्याशी मृगांका सिंह को हार का सामना करना पड़ा। बहरहाल, इतना तो तय है कि इस उपचुनाव में धार्मिक और किसानों के मुद्दों का कोई विशेष असर नहीं रहा। यहां जातीय भावनाएं ही इतनी प्रबल हुई कि मृगांका सिंह उसके आगे टिक नहीं सकीं।

Stay on top - Get daily news in your email inbox

Sirf Views

Pandits: 30 Years Since Being Ripped Apart

Pandits say, and rightly so, that their return to Kashmir cannot be pushed without ensuring a homeland for the Islam-ravaged community for conservation of their culture

Fear-Mongering In The Times Of CAA

No one lived in this country with so much fear before,” asserted a friend while dealing with India's newly amended citizenship...

CAA: Never Let A Good Crisis Go To Waste

So said Winston Churchill, a lesson for sure for Prime Miniter Narendra Modi who will use the opposition's calumny over CAA to his advantage

Archbishop Of Bangalore Spreading Canards About CAA

The letter of Archbishop Peter Machado to Prime Minister Narendra Modi, published in The Indian Express, is ridden with factual inaccuracies

Sabarimala: Why Even 7 Judges Weren’t Deemed Enough

For an answer, the reader will have to go through a history of cases similar to the Sabarimala dispute heard in the Supreme Court

Related Stories

Leave a Reply

For fearless journalism

%d bloggers like this: