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Sunday 19 January 2020

गंजहों की गोष्ठी — व्यंग्य प्रेमियों को आमंत्रण

बीस व्यंग्य लेखों के इस संग्रह गंजहों की गोष्ठी में आज की राजनैतिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर तंज़ और टिप्पणी की गयी है

आज का समय भी बड़ा ही विस्मयकारी है। पुस्तक प्रकाशित करना जितना सरल है, उतना ही कठिन भी। ट्विटर पर एक यादृच्छ लड़की मूर्खतापूर्ण कथन प्रसारित करती है और पैंगविन जैसा बड़ा प्रकाशन उसकी पुस्तक छाप कर उसे प्रबुद्ध बुद्धिजीवी प्रचारित कर देता है, पर एक प्रसिद्ध फ़िल्मकार को अपनी पुस्तक प्रकाशित करने के लिए संपादक बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। संपादकीय के राजनीतिकरण के इस दौर में ‘इंडिक अकादेमी’ नए उभरते लेखकों के लिए संजीवनी से कम नहीं है। इंडिक अकादेमी के सहयोग से प्रकाशित ऐसी ही एक पुस्तक है गंजहों की गोष्ठी, जिसके लेखक हैं साकेत सूर्येश

वर्तमान समय में जब हास्य का अर्थ अँग्रेजी में गाली गलौच, फूहड़पन और सिद्धू या अर्चना पूरन सिंह को दूरदर्शन पर नित्य निरर्थक उभयार्थकों पर दहाड़ मार-मार कर हँसते देखना रह गया है, हिन्दी जगत में पुनः व्यंग्य लेखन उफान पर है। समकालीन पत्रकार आज भी अपने पूर्वजों जैसा ही सत्ता और पारितंत्र की बारात में बाजा गाजा बजा कर नाचने में मस्त हैं। कुछ ऐसे ही परिवेश में आम नागरिक के दर्द को हास्य में व्यक्त करते हुए आधुनिक हिन्दी व्यंग्य का जन्म हुआ था, और हरीशंकर परसाई, शरद जोशी, काका हाथरसी, श्रीलाल शुक्ल जैसे महानुभावों ने हिन्दी व्यंग्य को एक ऐसी ऊंचाई दी जिसे छू पाना भी कठिन है।

Ganjahon ki Goshthi (Hindi); Published by Notion Press; 94 pages from front to back cover; Paperback: Rs 120; Kindle version available on Amazon: $ 1.05

आज साहित्य जगत के इन दैत्यों के विशाल पदचिन्हों को नापते नवीन लेखकों में ही एक साकेत सूर्येश भी हैं। साकेत के अनेकों लेख दैनिक जागरण, डेलि ओ, ओपइंडीया, स्वराज्य मैगेजीन जैसे माध्यमों में छप चुके हैं। पेशे से एक आइटी कंपनी में कार्यरत अभियंता, साकेत की हिन्दी पर पकड़ ऐसी है कि अपनी भावनाओं को शब्दों से यथार्थ चित्रित कर देते हैं। गंजहों की गोष्ठी साकेत की प्रथम हिन्दी पुस्तक है और उनके द्वारा लिखे गए व्यंग्य लेखों का एक संकलन है।

बीस व्यंग्य लेखों के इस संग्रह में आज की राजनैतिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर तंज़ और टिप्पणी की गयी है। मात्र सरकार और राजनैतिक दल ही नहीं, साकेत निर्वाचकों और उनकी भागेदारी, उत्तरदायित्व, उनके आचरण एवं उपपत्ति पर भी वैचारिक प्रश्न उठाते हैं। चुनावी राजनीति में विभाजनकारी नीतियों पर तीखे कटाक्ष के साथ ही साथ, जैसे कि हिन्दी व्यंग्य लेखन में परम्परा रही है कथित “बुद्धिजीवी” तपके को भी उनके बनावटीपन और श्रेष्ठता की मनोग्रन्थि के लिए भी इन लेखों द्वारा तसल्ली से लताड़ा गया है।

जैसा कि पुस्तक के नाम से ज्ञात होता है, यह पुस्तक केवल लेखनी की टीस मिटाने के लिए ही नहीं लिखी गयी है। यह हिन्दी व्यंग्य साहित्य के प्रेमियों को एक आमंत्रण है। श्रीलाल शुक्ल के विख्यात उपन्यास राग दरबारी की याद दिलाते हुए, शिवपालगंज के सभी गंजहों’ को गोष्ठी के लिए बुलावा है कि वे भी न सिर्फ इसे पढ़ कर मनोरंजित हों बल्कि समाज की रचनात्मक आलोचना में भी भाग लें। इसके अलावा पुस्तक का शीर्षक और संकलन का प्रथम व्यंग्य शुक्ल एवं उनकी कृति राग दरबारी को एक श्रद्धांजलि भी है।

पच्चासी पन्नों की यह किताब अत्यंत आनन्ददायक, मनोरंजक और विचारोत्तेजक है। साकेत के लेखन में भाषा की एक स्पष्टता देखने मिलती है जो आज के समय में लोप-प्राय है। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बड़ी ही क्लिष्ट हिन्दी का प्रयोग करते हों। इसके उलट इनके लेखन पद्धति में सरल हिन्दी की प्राथमिकता है और आधुनिक अँग्रेजी शब्दों को सटीक समय व स्थान पर प्रयोग कर वे व्यंग्य को और भी रोचक तथा हास्यास्पद बना देते हैं। भाषा सरल और मजेदार होने के साथ ही इस संकलन में विषयों की विविधता है। हाल ही में सम्पूर्ण हुए कर्नाटक चुनाव पर टिप्पणी हो या भारत में प्रचलित विकृत धर्मनिरपेक्षता की आलोचना, या फिर अराजकता और दोगलेपन की राजनीति, अथवा एक लोकतन्त्र में मतदाता की उदासीन प्रवृत्ति पर तंज़, साकेत पूरी वैचारिक स्पष्टता के साथ अनेक मुद्दों को कुशलता से हास्य के रूप में पाठकों तक लाते हैं जो उनकी समाज और राजनीति की जटिलताओं की परिपक्व समझ को दर्शाता है।

गंजहों की गोष्ठी एक ऐसी पुस्तक है जो हर पाठक को तुरंत ही मंत्रमुग्ध कर लेगी और अवश्यंभावी तौर पर साकेत को उनके मनपसंद लेखकों की सूची में स्थापित कर देगी क्योंकि निश्चित ही साकेत के व्यंग्य समय से बंधे नहीं हैं। इनकी सार्थकता और प्रासंगिकता आगे भी बनी रहेगी। ये व्यंग्य अमावट के समान हैं, जिसमे कष्टप्रद कटु-सत्य की खटास भी है, जीवन की निरन्तरता की मिठास भी है और निष्छल चुटकुलों का चटकारा भी है। और जिस प्रकार अमावट खाकर और भी अमावट का लालच आता है, इस किताब को पढ़ कर पाठक में साकेत की अगली पुस्तक की अधीर लालसा जाग उठेगी। साकेत सूर्येश की इस पुस्तक को आप ‘अमेजौन’ के इस लिंक पर प्राप्त कर सकते हैं।

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