वृहस्पतिवार भोपाल लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के गांधी और गोडसे पर की गई टिप्पणी पर बहुत वबाल हुआ जो अपेक्षित था। लेकिन अगर गोडसे से हमें इतनी तकलीफ़ है तो हम इसका इलाज क्यों नहीं ढूंढते?

गोडसे को हमेशा के लिए ख़त्म करने का सबसे बेहतर और आसान तरीक़ा यह है कि गांधी को भगवान के भी सुपरपूज्य पिताजी मानना और सारी दुनिया पर भी उन्हें यही मानने की आतंकवाद की हद तक कट्टरवादी ज़िद थोपना बन्द कर दिया जाए; और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रकाश में बिल्कुल निष्पक्ष और ईमानदार नज़रिए से गाँधी जी के तमाम विचारों, शब्दों और कर्मों का आँकलन कर के देखा जाए कि उन्होंने अपने जीवनकाल में भारत के तत्कालीन वर्तमान और भविष्य पर किस तरह के दूरगामी प्रभाव डाले।

लेकिन ऐसा करने में सबसे बड़ी दिक़्क़त यही है कि अगर एक बार भी ऐसा किया गया, तो गांधी राजनीति के बाज़ार में इतनी आसानी से और इतने महँगे दामों में बेचने लायक प्रॉडक्ट नहीं रह जाएँगे, जितनी उनकी ब्रैंडिंग की गई है इतने दशकों तक। बल्कि विडंबनापूर्ण सत्य यह है कि जिस सत्य का आग्रह सदा गांधी की कम से कम ज़बान पर रहा, उसी सत्य की कसौटी पर अगर उनके होने को अपनी समग्रता में कस दिया गया, तो उनकी स्टॉक वैल्यू हमेशा के लिए दरअसल शून्य से भी नीचे चली जाएगी।

जानते हैं ऐसा क्यों है? अगर ठंडे दिमाग़ से सुन-समझ सकें, तो व्यापार की निर्मम भाषा में सुनें। ऐसा इसलिए है कि बतौर एक प्रॉडक्ट गाँधी जी अब अपनी एक्सपायरी डेट से कहीं आगे निकल चुके हैं, इसलिए अब उन्हें ज़बर्दस्ती बेचने की कोशिश करते रहना मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं होगा। लेकिन उससे भी कहीं आगे के दर्जे की मूर्खता होगी गोडसे पर यह आरोप लगाना कि उसकी कंपनी ने मार्केटिंग में बड़ी रक़म झोंक कर गांधी को नॉन-सेलेबल प्रॉडक्ट घोषित करवा दिया है।

भारत में छपने वाला एक-एक करेंसी नोट गांधी की तस्वीर लेकर उनकी मार्केटिंग का टूल रहा है। उनके नाम पर ख़र्च किए जाते हज़ारों-लाखों करोड़ रुपए, उनके नाम से जोड़ी गई हज़ारों सरकारी संपत्तियाँ, उनके ऊपर तथाकथित शोध को समर्पित अरबों का बजट लेने वाली सैंकड़ों संस्थाएँ, उन पर लिखी गई हज़ारों किताबें, उन पर बनाई गई दसियों फ़ीचर और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में ― यह सब उस बेहद ताक़तवर मार्केटिंग का हिस्सा रही हैं जो गांधी को किसी भी प्रश्न से ऊपर स्थित, भगवान के सुपरपूज्य पिताजी बतौर गढ़ने और थोपने के लिए भारत की जनता के ही पैसे से की गई क्योंकि यह उन्हें राजनीति की मंडी में धड़ल्ले से बिकने वाले एक लाजवाब प्रॉडक्ट की शक्ल देती थी।

गोडसे है क्योंकि गांधी हैं। गांधी ख़त्म तो गोडसे भी ख़त्म।

जबकि गोडसे की मार्केटिंग के लिए तो उसके कोर्ट में दिए गए बयान को भी संविधान को ठेंगे की नोंक पर रखते हुए जनता तक पहुँचने से प्रतिबंधित कर दिया गया, उसकी मृत्यु के पूरे 20 साल बाद तक। क्यों किया गया ऐसा, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को धार देने के लिए? 20 सालों तक चले मुक़दमे के बाद 1968 में बम्बई हाईकोर्ट ने एक फ़ैसले में गोडसे द्वारा अदालत में दिए गए उस बयान पर लगा प्रतिबंध हटाया, तब लोगों को मालूम चला कि उसने उस दिन कहा क्या था। क्या यह था गांधी के ‘सत्य’ का आग्रह? और तो और, गोडसे के उस बयान पर किसी ने मराठी में मी नाथूराम गोडसे बोलतोय नाम से एक नाटक लिखा तो उसके मंचन को तोड़फोड़, दंगा-फ़साद कर के रोका गया; उसे दो-दो राज्यों में सरकारों द्वारा प्रतिबंधित किया गया। फिर से बम्बई हाईकोर्ट ने 2001 में उसके मंचन की इजाज़त दी तो उसके कलाकारों को ले जाती बस में दिनदहाड़े आग लगा दी गई। क्या यह अराजक गुंडागर्दी थी गांधी के ‘सत्याग्रह’ की नज़ीर? कड़वी सच्चाई यह है कि गोडसे की मार्केटिंग तो यहाँ अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन गाँधी जी की इतनी भारी-भरकम अतिवादी मार्केटिंग जो की जा चुकी है आज तक, उसके लूपहोल्स ही दरअसल आज गोडसे को रिवर्स मार्केटिंग की सुविधा मुफ़्त में उपलब्ध करवा रहे हैं।

इसलिए गोडसे की संभावनाओं को शुरुआत में ही समाप्त कर देने के लिए ज़रूरी है कि गांधी को भगवान के पूज्य पिताजी मनवाने की ज़िद बन्द कर दी जाए, और इन दोनों को ही चर्चा के दायरे से धीरे-धीरे बाहर कर दिया जाए। गांधी अब और ज़्यादा नहीं बेचे जा सकते, लेकिन गोडसे-गोडसे चीख़ते हुए उन्हें उपभोक्ता तक ज़बर्दस्ती ठेलने की हर कोशिश गोडसे को ही चर्चा में लाएगी और उसे बेचने वालों को ही फ़ायदा देगी, इसे अपने दिमाग़ की सबसे गहरी नसों में बैठा लिया जाना चाहिए। गोडसे है क्योंकि गांधी हैं। गांधी ख़त्म तो गोडसे भी ख़त्म।