पूर्व मुख्यमंत्रियों का सरकारी बंगला प्रेम कितना नैतिक

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्रियों के पास वीवीआईपी सरकारी बंगले हैं

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सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी उत्तर प्रदेश के 6 पूर्व मुख्यमंत्रियों ने अभी तक अपना बंगला खाली नहीं किया है। नैतिकता के आधार पर यह सब बहुत पहले हो जाना चाहिए था। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय को बार-बार इस एक मुद्दे पर निर्देश देना पड़े, यह स्थिति बहुत ठीक तो नहीं है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्रियों के पास वीवीआईपी सरकारी बंगले हैं। अदालतों के बार-बार निर्देश के बाद भी पूर्व मुख्यमंत्री बंगला छोड़ नहीं रहे हैं। बंगला न छोड़ना पड़े, इसके लिए वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कानाफूसी भी कर रहे हैं। सपा संरक्षक और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की मुख्यमंत्री आवास में योगी आदित्यनाथ से मुलाकात को इसी रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपना और अपने बेटे अखिलेश यादव का बंगला बचाए रखने के लिए व्यक्तिगत बातचीत तो की ही, लिखित सुझाव भी दिया कि मुख्यमंत्री किस तरह विधानसभा और विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष के नाम उक्त बंगलों को आवंटित कर बंगला बचा सकते हैं जिससे मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव को बड़े बंगले में रहने में परेशानी न हो। यह और बात है कि मुलायम सिंह यादव का यह लिखित परामर्श पत्र मुख्यमंत्री कार्यालय से न केवल लीक हो गया बल्कि सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया में भी वायरल हो गया। मुख्यमंत्री योग आदित्यनाथ ने इतने गोपनीय पत्र के सार्वजनिक होने पर दो कर्मचारियों को निलंबित भी कर दिया है। मुख्यमंत्री ने मुलायम सिंह यादव को क्या आश्वासन दिया, यह तो नहीं पता लेकिन इससे इतना पता तो चल ही गया है कि अपना बंगला बचाने के लिए नेता किस हद तक जा सकते हैं? सर्वोच्च न्यायालय ने बहुत स्पष्ट आदेश दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्री आम आदमी की तरह है, उसे आजीवन रहने के लिए बंगला नहीं दिया जा सकता। देश संविधान से चलता है और संविधान नेता से। नेता के लिए देश और संविधान कठपुतली जैसा ही है, जब जैसा चाहता है, वैसा उसे नचाता है। नेताओं को मुगालता है कि वे कानून बनाते हैं। जिस कानून को नेता बनाते हैं, वही कानून नेताओं के गले की हड्डी बन जाए, इसे वे कब चाहेंगे। सुविधा का संतुलन भी तो आखिर कोई चीज है।
अदालत छोटी हो या बड़ी, अगर वह कोई फैसला सुनाती है तो उसे मानना लोगों के लिए बाध्यकारी होता है। सरकार की नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वह संविधान की रोशनी में कानून व्यवस्था को बनाए रखे। विकास कार्यों को बखूबी अंजाम तक पहुंचाए लेकिन जब बात राजनीतिक दलों के हितों से जुड़ती है तो सारे कायदे-कानून गौण हो जाते हैं। संविधान लोकतंत्र की आत्मा है और आत्मा दिखाई नहीं पड़ती। शरीर दिखता है, इसलिए लोग शरीर को ही सर्वस्व मान लेते हैं। आत्मा की रक्षा के लिए शरीर की सुरक्षा जरूरी है लेकिन शरीर की सुरक्षा में ही इतना तन्मय न हो लिया जाए कि आत्मा की सुध ही न रहे। आजकल एक भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जो संविधान पर खतरे की बात न करता हो। मायावती तो रोज ही इस बात की दुहाई देती हैं कि भाजपा सरकार बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के बनाए संविधान को नष्ट कर रही है लेकिन उसी बाबा साहेब के संविधान का वे खुद कितना अनुगमन करती है, इस बाबत उन्होंने एक गहन चुप्पी सी ओढ़ रखी है। सरकारी बंगले में वे लंबे समय से काबिज हैं। संविधान इसकी इजाजत तो नहीं देता। वे किस तरह बाबा साहेब के बनाए संविधान को सम्मान दे रही हैं।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी बतौर पूर्व मुख्यमंत्री लखनऊ के एक बंगले पर काबिज हैं। कल्याण सिंह, राम प्रकाश गुप्ता और कांग्रेस नेता एनडी तिवारी भी पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए बने बंगलों में रह रहे हैं। किसी ने भी नैतिकता के आधार पर अपना बंगला नहीं छोड़ा है। राजनाथ सिंह गृहमंत्री के रूप में दिल्ली में बड़े बंगले में और कल्याण सिंह को राज्यपाल के रूप में राजस्थान में राजभवन में रह रहे हैं। एक ही व्यक्ति दो-दो जगहों पर आवासीय सुविधा प्राप्त करे, यह कहां तक न्यायसंगत है? कमलापति त्रिपाठी, श्रीपति मिश्र, वीरबहादुर सिंह के परिजन अरसे तक उनके निधन के बाद उनके नाम पर ट्रस्ट बनाकर काबिज रहे।
यह अलग बात है कि कोर्ट के बढ़ते दबाव के मद्देनजर सरकार ने बाद में उन बंगलों को खाली करा लिया। राज्य संपत्ति विभाग की ओर से सभी 6 मुख्यमंत्रियों के पते पर 15 दिन में बंगला खाली करने का नोटिस भेजा गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि योगी सरकार सरकारी बंगलों को अविलंब पूर्व मुख्यमंत्रियों के चंगुल से छुड़ा लेगी। सरकारी बंगलों पर काबिज रहना भी एक तरह का राजनीतिक कदाचार है, इसे दूर किया जाना चाहिए। अपने फायदे के लिए सुविधा का संतुलन तलाशना किसी भी राजनेता के लिए मुफीद नहीं है। बेहतर तो यह होता कि राजनेता लोकजीवन में पारदर्शिता का महत्व समझ पाते। कोई भी राजनेता आर्थिक रूप से इतना दयनीय नहीं है कि वह अपने रहने के लिए सरकार पर आश्रित रहे।
मुलायम सिंह यादव की कानाफूसी लगता है कि इस बार काम नहीं आई है। उनसे मुलाकात के दूसरे ही दिन बंगला खाली करने का नोटिस जारी करना तो इसी ओर इशारा करता है। छोटे-छोटे स्वार्थों से बचकर ही नेता इस देश और प्रदेश को आगे ले जा सकते हैं। जो रोटी, कपड़ा और मकान जैसी छोटी जरूरतें भी पूरी नहीं कर सकते, उन्हें लोगों के नेतृत्व का वैसे भी कोई अधिकार नहीं है। जिस देश में करोड़ों लोग बेघर हैं। झुुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे हैं, सड़क किनारे रह रहे हैं, उस प्रदेश और देश के नेताओं को बंगले में रहने का नैतिक अधिकार कहां से मिल जाता है? महात्मा गांधी ने संकल्प लिया था कि जब तक इस देश का एक भी इंसान नंगा है, तब तक मैं एक धोती से ही काम चलाऊंगा और उन्होंने जीवन पर्यंत अपने इस संकल्प पर अमल किया। राजनेता इस तरह का संकल्प भले न करें लेकिन अपनी आत्मा और विचार शक्ति को तो जिंदा रखें। करोड़ों बेघरों के देश में नेताओं का सरकारी बंगले में रहना आखिर कहां तक न्यायसंगत है?
हिन्दुस्थान समाचार/सियाराम पांडेय ‘शांत’
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