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Sunday 31 May 2020

यौन कर्मियों के लिए कौन आया इस कठिन समय में?

जब भी वह हमारे सामने आएंगी तो हम उनकी सहायता नहीं कर पाएंगे। क्यों? इतना बड़ा टैबू लेकर हम कैसे जी सकते हैं? मगर हम जीते हैं, दोहरेपन में!

Sonali Misra
Sonali Misrahttps://www.sirfnews.com
स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार, उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं प्रकाशित हुआ है और शिवाजी पर उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य है; उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब हम रोज़ ही एक नए लेबल से दो चार हो रहे हैं। पर यह दुनिया है, दुनिया बदलती है और हम सब बदलते हैं, धारणाएं बदलती हैं। और धारणाएं किसी धमकी या चेतावनी से नहीं बदलतीं वह बदलती हैं सेवा से! सेवा जिसका मूलमंत्र लेकर कई राष्ट्रवादी संस्थाएं अपने कदम रखती हैं। और ऐसे ही कई कदम उन्हें कई बार ऐसे स्थानों पर ले जाते हैं जहाँ कोई सभ्य समाज वाला दिन के उजाले में नहीं जाना चाहता है। जहाँ पर सभ्य समाज के पुरुष जाते तो हैं, मगर रात के अँधेरे में! वह जाते तो हैं मगर चोरी चोरी, छिप छिप कर! वह जाना भी चाहते हैं और नहीं भी! वह रुकना चाहते हैं मगर रुक नहीं सकते। यह अजीब कशमकश वाला एक रिश्ता है। वह रिश्ता है यौन कर्मियों के साथ सभ्य और सुसंस्कृत समाज का रिश्ता! यह रिश्ता है ऐसे वर्ग के साथ रिश्ता जो समाज में रहकर भी समाज से कटा हुआ है, एक ऐसा वर्ग जो समाज में है भी और नहीं भी, जो समाज में रहकर काम करता भी है और अस्तित्व होकर भी नहीं है। हम किसी भी गरीब के लिए हर संभव सहायता के लिए तत्पर रहते हैं, मगर यौन कर्मियों के लिए? जी हाँ, जब भी वह हमारे सामने आएंगी तो हम उनकी सहायता नहीं कर पाएंगे। क्यों? इतना बड़ा टैबू लेकर हम कैसे जी सकते हैं? मगर हम जीते हैं, दोहरेपन में!

यह दुनिया अजीब है, और इतने ही अजीब हैं इसके नियम और पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह! दुराग्रह कि आरएसएस एवं तमाम हिंदूवादी संगठन स्त्री विरोधी हैं और वह इस हद तक स्त्री विरोधी हैं कि वह लड़कियों को परदे में रखते हैं, या फिर लड़कियों को स्वतंत्रता नहीं देते। स्त्री को वस्तु मानते हैं। हिन्दू संगठनों के लिए दोहरी लड़ाई है कि एक तरफ तो वह समाज को एक करने के लिए एवं समाज की कुरीतियों के खिलाफ लड़ते हैं, आत्मविकास के लिए लड़ते हैं तो वहीं एक प्रोपोगैंडा के खिलाफ भी लड़ते हैं। यह एक विडंबना ही है, इसमें बहुत कुछ किया नहीं जा सकता है।

परन्तु फिर भी धुन के पक्के कुछ संगठन है वह कार्य करते हैं, वह शायद यही गुनगुनाते हुए चलते हैं कि “चंद रोज़ और मेरी जान चंद रोज़!” फिर शायद वह सेवा के माध्यम से धारणाओं में बदलाव कर पाएं। जिस देश में आज भाषा और वस्त्रों के माध्यम से साम्प्रदायिक ठहराने की होड़ लग गयी है, ऐसे में क्या कभी स्वस्थ और निष्पक्ष सोचा जा सकता है?

अब जब तीसरी बार हम घर बंदी की चपेट में हैं और यह जान भी रहे हैं कि यह लम्बा चलने वाला है तो फिर यह भी देखें कि ऐसा वर्ग जिसके पास घर नहीं है, परिवार नहीं है, जिंदा रहने के लिए जो सबसे आवश्यक है, अर्थात स्नेह और अपनापन, वही नहीं है तो उनका क्या हाल होगा? उनपर क्या बीत रही होगी? उनके घर का चूल्हा कैसे जलेगा जब यौन कर्मियों के पास करने के लिए काम नहीं होगा? कई पेशे ऐसे होते हैं जिनके दर्द को समझना असंभव होता है। और कई बार यह भी आवश्यक होता है कि हम जानें कि उनके साथ कौन आया? कौन सी संस्था उनकी मुसीबत के समय सामने आई? किस संस्था ने उनकी समस्या को समझा, उनकी पीड़ा को जाना!

दिल्ली में एक ऐसा क्षेत्र है जहां पर यह वर्ग भारी संख्या में रहता है। संक्रमण से होने वाला रोग इन तक अभी नहीं पहुंचा है, मगर संक्रमण से अधिक तेजी से उनके पास भूख पहुँच गयी। उनकी मदद के लिए कोई पैकेज भी नहीं पहुँच सकता! मगर एक पैकेज पहुंचा, और वह पहुंचा जिसके विषय में यह बार बार दुष्प्रचार किया जाता है कि वह स्त्री विरोधी है।

अप्रैल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सेवा भारती के सदस्यों के पास एक कॉल आया जिसमें इन महिलाओं की बुरी आर्थिक स्थिति का उल्लेख था। सेवा भारती का जन्म ही सेवा करने के लिए हुआ है। सेवा भारती न जाने कहाँ कहाँ सहायता पैसेज पहुंचा रही है। उन्हें जब यह पता चला कि दिल्ली में जीबी रोड में रहने वाली इन यौन कर्मियों के पास खाने पीने की समस्या है। तो उन्होंने किसी भी टैग की परवाह न करते हुए सहायता भेजने का निर्णय लिया।  संस्था द्वारा 3 अप्रेल को 986 यौन कर्मियों की सूची बनाई गयी और उसके साथ उन्हें 250 जॉइंट्स में बाँट दिया गया (अर्थात वह यौन कर्मियों के समूह, जो एक साथ रहते हैं)। आरएसएस के महासचिव अनिल गुप्ता ने एएनआई को बताया था कि उन्होंने 250 किट्स बांटी थीं। सेवा भारती के ही एक कार्यकर्ता का कहना था कि वह न केवल दैनिक मजदूरों को राशन मुहैया करा रहे हैं बल्कि यौन कर्मियों को भी क्योंकि इनके खाने पीने का कोई भी प्रबंध नहीं है।

सेवाभारती ने इन 250 जॉइंट्स के लिए जो किट्स बनाई थीं उनमें दस दिन तक के खाने का इंतजाम था। और उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि वह अगले सप्ताह फिर से संपर्क करेंगे। सेवा भारती ने जो कार्य किया है, वह उन सभी संगठनों को करना चाहिए जो स्त्रियों का प्रयोग कर इस देश की संस्कृति को बिगाड़ते रहते हैं, जो एक एजेंडा के चलते स्त्रियों की भावनाएं भड़काते हैं, और जो एक एजेंडा के चलते स्त्रियों के दर्द उकेरते हैं। सेवा भारती ने अपने इस कार्य से यह साबित किया है कि राष्ट्रवादी संस्थाए ही हर वर्ग की पीड़ा को समझ पाती हैं।

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Comments

  1. दुराग्रह कि आरएसएस एवं तमाम हिंदूवादी संगठन स्त्री विरोधी हैं और वह इस हद तक स्त्री विरोधी हैं कि वह लड़कियों को परदे में रखते हैं, या फिर लड़कियों को स्वतंत्रता नहीं देते। स्त्री को वस्तु मानते हैं please explain. Phir aapne ye bhi likha hai

    अप्रैल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सेवा भारती के सदस्यों के पास एक कॉल आया जिसमें इन महिलाओं की बुरी आर्थिक स्थिति का उल्लेख था। सेवा भारती का जन्म ही सेवा करने के लिए हुआ है। सेवा भारती न जाने कहाँ कहाँ सहायता पैसेज पहुंचा रही है। उन्हें जब यह पता चला कि दिल्ली में जीबी रोड में रहने वाली इन यौन कर्मियों के पास खाने पीने की समस्या है। तो उन्होंने किसी भी टैग की परवाह न करते हुए सहायता भेजने का निर्णय लिया। double meaning ni hai ye. Kindly explain double standard kyu rkha hai yha aapne

    • यह double meaning नहीं है। कृपया शांत मन से विचार करें। समाज के एक वर्ग में यह दुराग्रह है ― पहले पाठक को यह बताया गया। फिर उस दुराग्रह के निवारण के लिए सच्चाई बताई गई।

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