फिर याद आए किसान

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मौसम की मार, फ़सलों की बर्बादी और आमदनी की कमी ने किसानों को कर्ज़ों के बोझ तले दबा दिया है, जिसकी वजह से किसान ज़िंदगी पर मौत को प्राथमिकता देने लगे। उनकी हालत को सुधारने के लिए ही फ़सल बीमा की शुरूआत हुई थी। फ़सल बीमा योजना को लागू हुए 40 साल हो गए हैं, लेकिन इस का फ़ायदा महज़ 23% किसान ही उठा पा रहे हैं, वो भी आधा अधूरा।

एक तो बीमा का प्रीमियम बहुत ज़्यादा था, जिसकी अदायगी ग़रीब या दरमयानी किसानों के लिए मुश्किल थी; मसलन किसी फ़सल के लिए प्रीमियम अगर 22% है तो रु० 30,000 की फ़सल का इंशोरंस कराने के लिए रु० 2,300 देना पड़ता था, जिसमें से रु० 900 किसान और रु० 2,400 सरकार अदा करती थी। पूर्व पालिसी में इंशोरंस का प्रीमियम फ़सल का निर्धारित क़ीमत का 15% से कम नहीं था, फसलों के लिहाज़ से अदा करना होता था। पूरी फ़सल बर्बाद होने पर भी सिर्फ़ रु० 15000 ही मिल पाते थे।

दूसरी बड़ी ख़राबी ये थी कि ये बीमा योजना सिर्फ़ खड़ी फ़सल के लिए थी, यानी अगर क़ुदरती क़हर के चलते खड़ी फ़सल बर्बाद होती है तभी उस के लिए दावा किया जा सकता था। इस के इलावा फ़सल के नुक़्सान का सही जायज़ा लेने में कई तरह की दिक़्क़तें आ रही थीं जिनके चलते किसानों को वक़्त पर मुआवज़ा नहीं मिल पाता था।

फिर जो किसान बैंक से लिया गया क़र्ज़ वापस नहीं करते उन्हें इंशोरंस की रक़म नहीं दी जाती। किसान आम तौर पर तभी क़र्ज़ लौटाने की हालत में नहीं होते जब फ़सल ख़राब हो जाती है। क्योंकि तब उनके पास पैसे नहीं होते। उसी वक़्त उन्हें पैसों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। तभी उन्हें पैसा नहीं दिया जाता! इस वजह से किसान फ़सल बीमा लेने से हिचकते हैं। सबसे बड़ा मसला ये है कि पालिसी कितनी भी अच्छी हो, वो ज़मीन पर इतने असरदार अंदाज़ में लागू नहीं हो पाती।

नई वज़ीर-ए-आज़म फ़सल बीमा योजना में पुरानी पालिसी की काफ़ी सारी कमियों और तकनीकी ख़ामीयों को दूर किया गया है। सबसे बड़ी उलझन प्रीमीयम की थी जिसे वज़ीर-ए-आज़म नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत दिलचस्पी लेकर हल किया। मसलन गेहूँ ,धान, दल्हन व तिलहन की फ़सलों के लिए अलग-अलग प्रीमियम देना होता था। उन्होंने रब्बी व ख़रीफ़ सीज़न की फसलों में बांट कर इस मुश्किल को आसान कर दिया। प्रीमियम की जो दरीं 15 से 57% तक होती थीं उन्हें घटा कर नई स्कीम के तहत 1.5 से 2.5% कर दिया गया है। कपास और बाग़बानी के लिए 5% प्रीमियम देना होगा। बाक़ी सरकार भरेगी। ओले पड़ने, पानी भर जाने, मिट्टी कटने या चट्टानें खिसकने को स्थायी विपत्ति माना जाएगा। साथ ही इस नई बीमा योजना का दायरा बढ़ाकर बुआई से लेकर कटाई के बाद के नुक़्सानों की भरपाई तक कर दिया गया है।

पहले फ़सल कटने के बाद खेत में पड़े रहने के दौरान अगर कोई क़ुदरती आफ़त (बारिश, ओले या बाढ़) आती तो बीमे से इस की भरपाई नहीं हो पाती थी। लेकिन अब फ़सल कटने के 14 दिन तक फ़सल खेत में है और इस दौरान कोई आफ़त आती है तो किसानों को दावे की रक़म हासिल हो सकेगी। इस में ये इंतिज़ाम भी किया गया है कि फ़सल बर्बाद होने पर बीमा की गई फ़सल के नुक़्सान का 25% भुगतान फ़ौरन किसानों के खाते में पहुंच जाएगा; बाक़ी रक़म ज़्यादा से ज़्यादा 90 दिनों के अंदर मिल जाएगी।

ये स्कीम इस साल ख़रीफ़ की फ़सल से लागू होगी। माना जा रहा है कि इस से 50% फ़सलों को बीमा के दायरे में लाया जा सकेगा।

इस स्कीम का ठीक तरह से प्रचार किया जाये तो बेशक किसान उसका फ़ायदा उठाएँगे। प्रीमियम कम होने से मुम्किन है दरमयानी किसान भी अपनी फ़सलों का बीमा कराने का मन बनाएँ। लेकिन हो सकता है कि छोटे, ग़रीब और बंटाईदार किसानों को ये भी भारी लगे। सरकार को इस श्रेणी के किसानों को बीमा के दायरे में लाने के लिए कुछ और तरीक़ा ढूंढना होगा।

दूसरे ये कि इस पालिसी की कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि फ़सलों के नुक़्सान के जायज़े में कितनी पारदर्शिता बरती जाएगी । हालाँकि इस स्कीम को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की योजना बनाई गई है। आम तौर पर देखा गया है कि फ़सलों की बर्बादी का आंकलन ठीक से न किए जाने या फिर सरकारी मुलाज़िमों के तकनीकी रोड़े अटकाने की वजह से किसानों को उचित मुआवज़ा नहीं मिल पाता। जो मिलता भी है वो इतना कम होता है कि इससे किसानों को कोई फ़ायदा नहीं होता। सरकारी लोगों का ये रवैय्या आम है कि सूखे, बाढ़, मिट्टी या ज़मीन के कटाव या ओले गिरने वग़ैरा का आंकलन करने में वो भेद-भाव या फिर अनदेखी करते हैं। शायद यही वजह है कि खेती के लिहाज़ से अहम समझे जानेवाले पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तरप्रदेश में खेती का बीमा लेने वाले किसान बहुत कम हैं। फसलों के बीमा के मुआमला में भी अगर उनका यही रवैय्या रहा तो किसानों को मायूसी के इलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा।

सरकार ने क़ुदरती आफ़त के अध्ययन के लिए कम्पयूटर, ईमेल और फ़ोन के इस्तिमाल का बंद-ओ-बस्त किया है। तहसीलदारों को स्मार्ट फ़ोन के ज़रीए अपनी रिपोर्ट भेजने की सुविधा मुहय्या कराने का इंतिज़ाम होगा। लेकिन इस सब के बावजूद पारदर्शिता ज़रूरी है ताकि किसान ख़ुद भी जांच सकें कि उनकी बीमा की हुई फ़सल के बारे में रिपोर्ट सही दी गई है या नहीं। इस स्कीम की कामयाबी से किसानों को राहत मिलेगी और उन में खेती के लिए हौसला पैदा होगा लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि इस पालिसी को प्रभावी तरीक़े से ज़मीन पर लागू किया जाए, वर्ना उस का हाल उन रियास्तों की तरह होगा जहां फ़सल बीमा योजना में बड़ी तादाद में किसान शामिल हैं जैसे महाराष्ट्र ,कर्नाटक या तमिलनाडू, जहां धोका धड़ी और फ़र्ज़ीवाड़ा बहुत ज़्यादा है। किसान, बैंक और सरकारी आफ़िसरान मिलकर फ़र्ज़ी दावा बनाकर बीमा का पैसा ले लेते हैं। इस तरह इस वक़्त मुल्क में दो तरह के इलाक़े हैं एक वो जिनमें बीमा लग भग नदारद है; दूसरे वो जिनमें बीमा का फैलाव ख़ूब है लेकिन वहां धोकाधड़ी भी बहुत हो रही है।

हर राज्य की सरकार किसानों के हक़ की बात करती नज़र आती है लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इस से अलग होती है। उत्तर प्रदेश को देखें जिसने पिछले साल को “किसान वर्ष” होने का ऐलान किया था। किसानों की हालत सुधारने के लिए 1,000 एग्री जंक्शन क़ायम करने का प्लान बनाया था। इस के लिए रु० 6,00,00,000 का बजट भी निर्धारित कर दिया गया। आपको ये जान कर ताज्जुब होगा कि पूरे साल में इस प्लान पर एक रुपया भी ख़र्च नहीं हो पाया। जबकि इन एग्री जंक्शन्स पर मिट्टी की जांच, खेतों की पैदावार का जायज़ा लेने, अच्छे बीज, खाद, कीड़े मारने की दवाएं इकठ्ठा करना और किसानों को लाभदायक खेती के तरीक़े सिखाने जैसी सुविधाएँ मुहय्या कराना था। इस रियासत के ज़्यादा लोगों की निर्भरशीलता खेती पर है और इसी सूबे में बुंदेलखंड जैसा इलाक़ा भी है जहां सबसे ज़्यादा किसान ख़ुदकुशी करते हैं। इसके बावजूद खेती के प्रति रियास्ती، प्रशासनिक और विभागीय बेपरवाही इंतिहाई अफ़सोसनाक है।

चुनाव में हर पार्टी किसानों की हमदर्द होने का दावा करती है। लेकिन सत्ता में आते ही किसान नजरअंदाज़ किए जाने लगते हैं। भाजपा ने लोक सभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में कहा था कि अगर वो सत्ता में आई तो एम एस स्वामीनाथन कमीशन की सिफ़ारिशात के मुताबिक़ ये यक़ीनी बनाएगी कि किसानों को उनकी पैदावार की लागत से डेढ़ गुना क़ीमत मिले। बीजेपी की सत्ता को 2 बरस होने को हैं, लेकिन इस तरफ़ पहल नहीं हो सकी । किसानों की ख़ुदकुशी वैसे ही जारी है। वाक़यात पंजाब जैसी रियासत में भी हो रहे हैं। पंजाब के किसान भी संकट के शिकार हैं। खेती घाटे का कारोबार हो गई है।

बहरहाल फ़सल को सचमुच हिफ़ाज़त मिले, उस के लिए खेती के मैदान में सुधारों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। सिंचाई की अच्छी सुविधा और वैज्ञानिकों की सलाह और मदद से खेती में अनिश्चयता को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है। मौसम पर तो इन्सान का कोई बस नहीं, लेकिन इसकी वजह से होने वाले नुक़्सान की भरपाई का बढ़िया इंतज़ाम हो उस के लिए फ़सल बीमा की उपयोगिता बनी रहेगी। इस योजना की विस्तृत जानकारी आना अभी बाक़ी है; हम यही उम्मीद करेंगे कि खेती की तरक़्क़ी हो और किसानों की आमदनी बढ़े ताकि वो फ़सल बीमा का फ़ायदा उठा सकें। मुल्क की तरक़्क़ी में किसानों का हिस्सा रहा है; बस उसे और बेहतर बनाने की ज़रूरत है।


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پھر یاد آئے کسان


موسم کی مار،فصلوں کی بربادی اور آمدنی کی کمی نے کسانوں کو قرضوں کے بوجھ تلے دبادیا ہے، جس کی وجہ سے کسان زندگی پر موت کو فوقیت دینے لگے۔ ان کی حالت کو سدھارنے کیلئے ہی فصل بیمہ کی شروعات ہوئی تھی۔ فصل بیمہ یوجنا کو لاگو ہوئے چالیس سال ہوگئے لیکن اس کا فائدہ محض23فیصد کسان ہی اٹھاپارہے ہیں۔ وہ بھی آدھا ادھورا۔ ایک تو بیمہ کا پریمیم بہت زیادہ تھا جس کی ادائیگی غریب یا درمیانی کسانوں کیلئے مشکل تھی مثلاً کسی فصل کیلئے پریمیم اگر 22فیصد ہے تو تیس ہزار روپے کی فصل کا انشورنس کرانے کیلئے2300روپے دینا پڑتا تھا، جس میں سے 900روپے کسان اور 2400روپے سرکار اداکرتی تھی۔سابق پالیسی میں انشورنس کا پریمیم فصل کا تخمینہ قیمت کا15فیصد سے کم نہیں تھا فصلوں کے لحاظ سے اداکرنا ہوتا تھا۔پوری فصل برباد ہونے پر بھی صرف15000روپے ہی مل پاتے تھے۔ دوسری بڑی خرابی یہ تھی کہ یہ بیمہ یوجنا صرف کھڑی فصل کے لئے تھی یعنی اگر قدرتی قہر کے چلتے کھڑی فصل برباد ہوتی ہے تبھی اس کے لئے دعویٰ کیاجاسکتا تھا۔ اس کے علاوہ فصل کے نقصان کا صحیح جائزہ لینے میں کئی طرح کی دقتیں آرہی تھیں جن کے چلتے کسانوں کو وقت پر معاوضہ نہیں مل پاتا تھا۔ پھر جو کسان بینک سے لیاگیا قرض واپس نہیں کرتے انہیں انشورنس کی رقم نہیں دی جاتی۔ کسان عموماً تبھی قرض لوٹانے کی حالت میں نہیں ہوتے جب فصل خراب ہوجاتی ہے۔ کیوں کہ تب ان کے پاس پیسے نہیں ہوتے۔ اسی وقت انہیں پیسوں کی سب سے زیادہ ضرورت ہوتی ہے۔ تبھی انہیں پیسہ نہیں دیاجاتا۔ اس وجہ سے کسان فصل بیمہ لینے سے ہچکتے ہیں۔ سب سے بڑا مسئلہ یہ ہے کہ پالیسی کتنی بھی اچھی ہو وہ زمین پر اتنے اثردار انداز میں لاگو نہیں ہوپاتی۔

نئی وزیراعظم فصل بیمہ یوجنا میں پرانی پالیسی کی کافی ساری کمیوں اورتکنیکی خامیوں کو دورکیاگیا ہے۔ سب سے بڑی الجھن پریمیم کی تھی جسے وزیراعظم نریندرمودی نے ذاتی دلچسپی لے کر حل کیا۔ مثلاً گیہوں ،دھان، دلہن وتلہن کی فصلوں کیلئے الگ الگ پریمیم دینا ہوتا تھا۔انہوں نے ربی وخریف سیزن کی فصلوں میں بانٹ کراس مشکل کو آسان کردیا۔ پریمیم کی جو دریں 15سے 57فیصد تک ہوتی تھیں انہیں گھٹا کرنئی اسکیم کے تحت ڈیڑھ سے ڈھائی فیصد کردیاگیا ہے۔ کپاس اور باغبانی کیلئے پانچ فیصد پریمیم دینا ہوگا۔ باقی سرکار بھرے گی۔ اولے پڑنے، پانی بھرجانے، مٹی کٹنے یاچٹانیں کھسکنے کو مقامی آفت تصور کیاجائے گا۔ ساتھ ہی اس نئی بیمہ یوجنا کا دائرہ بڑھاکربوائی سے لے کر کٹائی کے بعد کے نقصانوں کی بھرپائی تک کردیاگیا ہے۔ پہلے فصل کٹنے کے بعد کھیت میں پڑے رہنے کے دوران اگر کوئی قدرتی آفت (بارش، اولے یاباڑھ)آتی توبیمے سے اس کی بھرپائی نہیں ہوپاتی تھی لیکن اب فصل کٹنے کے 14دن تک فصل کھیت میں ہے اوراس دوران کوئی آفت آتی ہے توکسانوں کودعویٰ رقم حاصل ہوسکے گی اس میں یہ انتظام بھی کیاگیا ہے کہ فصل برباد ہونے پرانشورڈ کی گئی فصل کے نقصان کا 25فیصد بھگتان فوراً کسانوں کے کھاتے میں پہنچ جائے گا باقی رقم زیادہ سے زیادہ 90دنوں کے اندر مل جائے گی۔ یہ اسکیم اس سال خریف کی فصل سے لاگو ہوگی۔ مانا جارہا ہے کہ اس سے پچاس فیصد فصلوں کو بیمہ کے دائرے میں لایاجاسکے گا۔

اس اسکیم کی ٹھیک طرح سے تشہیر کی جائے تو بلاشبہ کسان اس کافائدہ اٹھائیں گے۔ پریمیم کم ہونے سے ممکن ہے درمیانی کسان بھی اپنی فصلوں کا بیمہ کرانے کا من بنائیں۔ لیکن ہوسکتا ہے کہ چھوٹے، غریب اور بٹائی دار کسانوں کو یہ بھی بھاری لگے۔ سرکار کو اس زمرے کے کسانوں کو بیمہ کے دائرے میں لانے کیلئے کچھ اور طریقہ ڈھونڈنا ہوگا۔ دوسرے یہ کہ اس پالیسی کی کامیابی اس بات پر منحصر کرے گی کہ فصلوں کے نقصان کے جائزے میں کتنی شفافیت برتی جائے گی ۔ حالانکہ اس اسکیم کو جدید تکنیک سے جوڑنے کی منصوبہ سازی کی گئی ہے۔ عام طورپر دیکھا گیا ہے کہ فصلوں کی بربادی کاتخمینہ ٹھیک سے نہ کئے جانے یا پھر سرکاری ملازموں کے تکنیکی روڑے اٹکانے کی وجہ سے کسانوں کو مناسب معاوضہ نہیں مل پاتا۔ جو ملتا بھی ہے وہ اتنا کم ہوتا ہے کہ اس سے کسانوں کو کوئی فائدہ نہیں ہوتا۔ سرکاری لوگوں کا یہ رویہ عام ہے کہ سوکھے، باڑھ، مٹی یا زمین کے کٹاؤ یااولے گرنے وغیرہ کا تخمینہ کرنے میں وہ بھیدبھاؤ یا پھر اندیکھی کرتے ہیں۔ شاید یہی وجہ ہے کہ کھیتی کے لحاظ سے اہم سمجھے جانے والے پنجاب، ہریانہ، مدھیہ پردیش اوراترپردیش میں کھیتی کا انشورنس لینے والے کسان بہت کم ہیں۔ فصلوں کے بیمہ کے معاملہ میں بھی اگر ان کا یہی رویہ رہا تو کسانوں کو مایوسی کے علاوہ کچھ ہاتھ نہیں لگے گا۔

سرکار نے قدرتی آفت کے تخمینہ کیلئے کمپیوٹر، ای میل اور فون کے استعمال کا بندوبست کیا ہے۔ تحصیلداروں کو اسمارٹ فون کے ذریعہ اپنی رپورٹ بھیجنے کی سہولت مہیا کرانے کا انتظام ہوگا۔ لیکن اس سب کے باوجود شفافیت ضروری ہے تاکہ کسان خود بھی جانچ سکیں کہ ان کی انشورڈفصل کے بارے میں رپورٹ صحیح دی گئی ہے یانہیں۔ اس اسکیم کی کامیابی سے کسانوں کو راحت ملے گی اوران میں کھیتی کے تئیں حوصلہ پیدا ہوگا لیکن اس کیلئے ضروری ہے کہ اس پالیسی کو اثرانداز طریقے سے زمین پر لاگو کیا جائے ورنہ اس کاحال ان ریاستوں کی طرح ہوگا جہاں فصل بیمہ یوجنا میں بڑی تعداد میں کسان شامل ہیں جیسے مہاراشٹر ،کرناٹک یا تمل ناڈو، وہاں دھوکا دھڑی اورفرضی واڑہ بہت زیادہ ہے۔ کسان، بینک اورسرکاری افسران مل کر فرضی دعویٰ بناکر بیمہ کا پیسہ لے لیتے ہیں۔ اس طرح اس وقت ملک میں دوطرح کے علاقے ہیں ایک وہ جن میں بیمہ لگ بھگ ندارد ہے دوسرے وہ جن میں بیمہ کا پھیلاؤ خوب ہے لیکن وہاں دھوکہ دھڑی بھی بہت ہورہی ہے۔

ہرریاستی سرکار کسانوں کے حق کی بات کرتی نظرآتی ہے لیکن زمینی حقیقت اس سے مختلف ہوتی ہے۔ اترپردیش کو دیکھیں جس نے گزشتہ سال کو’’کسان برس‘‘ ہونے کا اعلان کیاتھا۔ کسانوں کی حالت سدھارنے کیلئے ایک ہزار ایگری جنکشن قائم کرنے کا منصوبہ بنایاتھا۔ اس کیلئے چھ کروڑ روپے کا بجٹ بھی مختص کردیاگیا۔ آپ کو یہ جان کر تعجب ہوگا کہ پورے سال میں اس منصوبے پر ایک روپیہ بھی خرچ نہیں ہوپایا۔ جبکہ ان ایگری جنکشنز پر مٹی کی جانچ، کھیتوں کی پیداوار کاجائزہ لینے، اچھے بیج، کھاد، کیڑے مارنے کی دوائیں فراہم کرنااورکسانوں کو منافع بخش کھیتی کے طریقے سکھانے جیسی سہولیات مہیاکرانا تھا۔ اس ریاست کے زیادہ لوگوں کا انحصار کھیتی پرہے اوراسی صوبے میں بندیل کھنڈ جیسا علاقہ بھی ہے جہاں سب سے زیادہ کسان خودکشی کرتے ہیں اس کے باوجود ریاستی سرکار، وزارت زراعت اور شعبہ زراعت کی بے پرواہی انتہائی افسوسناک ہے۔

چناؤ میں ہرپارٹی کسانوں کی ہمدر ہونے کا دعویٰ کرتی ہے۔ لیکن اقتدار میںآتے ہی کسان نظرانداز کئے جانے لگتے ہیں۔ بھاجپا نے لوک سبھا چناؤ کے اپنے منشور میں کہا تھا کہ اگر وہ اقتدار میںآئی تو ایم ایس سوامی ناتھن کمیشن کی سفارشات کے مطابق یہ یقینی بنائے گی کہ کسانوں کو ان کی پیداوار کی لاگت سے ڈیڑھ گنا قیمت ملے۔ بی جے پی کے اقتدار کو دوبرس ہونے کو ہیں لیکن اس طرف پہل نہیں ہوسکی ۔ کسانوں کی خودکشی ویسے ہی جاری ہے۔ واقعات پنجاب جیسی ریاست میں بھی ہورہے ہیں۔ پنجاب کے کسان بھی بحران کا شکار ہیں۔ کھیتی گھاٹے کا کاروبار ہوگئی ہے۔

بہر حال فصل کو سچ مچ حفاظت ملے، اس کیلئے زراعت کے میدان میں سدھاروں کی سب سے زیادہ ضرورت ہے۔ آب پاشی کی اچھی سہولت اورسائنسدانوں کی صلاح اور مدد سے کھیتی میں بے یقینی کو کافی حد تک کم کیاجاسکتا ہے۔ موسم پرتوانسان کا کوئی بس نہیں لیکن اس کی وجہ سے ہونے والے نقصان کی بھرپائی کا معقول انتظام ہو اس کیلئے فصل بیمہ کی افادیت بنی رہے گی۔ اس یوجنا کی مزید تفصیلات آناابھی باقی ہیں ہم یہی امید کریں گے کہ کھیتی کی ترقی ہو اورکسانوں کی آمدنی بڑھے تاکہ وہ فصل بیمہ کافائدہ اٹھاسکیں۔ ملک کی ترقی میں کسانوں کا حصہ رہا ہے بس اسے اوربہتر بنانے کی ضرورت ہے۔