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Thursday 21 November 2019
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सरसंघचालक के ख़िलाफ़ एक्सप्रेस, लोकसत्ता ने चलाई फ़र्ज़ी ख़बर; प्रेस काउंसिल ने भेजा कारण-बताओ नोटिस

द इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता ने सरसंघचालक मोहन भागवत को ग़लत उद्धृत करते हुए बताया था कि उन्होंने मुहम्मद अख़लाक़ की हत्या को सही ठहराया था

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मुंबई | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ० मोहन भागवत के बारे में फर्जी खबरें प्रकाशित करने के लिए, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने एक्सप्रेस ग्रुप के अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस और लोकसत्ता कोफटकार लगाई है। इंडियन एक्सप्रेस के स्तंभकार और अनुभवी पत्रकार करण थापर और लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर ने सरसंघचालक के नकली उद्धरण वाले लेख लिखे थे।

2018 में संघ ने नई दिल्ली में “भविष्य का भारत” नाम से तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला का आयोजन किया था। व्याख्यान श्रृंखला के अंतिम दिन बातचीत सत्र में बोलने वाले मोहन भागवत को उद्धृत करते हुए मराठी दैनिक लोकसत्ता ने 21 सितंबर 2018 को एक संपादकीय प्रकाशित किया जिसमें कहा गया कि 2015 में मोहम्मद अखलाक को गौमांस के भंडारण और उपभोग के संदेह में मौत के घाट उतार दिया गया था। इस पर आरएसएस प्रमुख द्वारा प्रतिक्रिया व्यक्त करने की आवश्यकता है। गिरीश ने भागवत को उद्धृत करते हुए लिखा कि “वेद गाय को मारने वाले पापी की हत्या का आदेश देते हैं।” इस दुखद घटना के तीन दिन बाद आरएसएस प्रमुख ने यह प्रतिक्रिया व्यक्त की।

उसी दिन द इंडियन एक्सप्रेस ने एक लेख प्रकाशित किया, “हैज़ द आरएसएस ग्राउंड शिफ़टेड?” जहाँ कारण थापर ने लिखा कि “दरअसल भागवत स्वयं भड़काऊ भाषण देने से बाज़ नहीं आते। 2015 में जब मुहम्मद अख़लाक़ की गौमांस रखने और खाने के संदेह में हत्या कर दी गई थी, उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि वेद इसकी अनुमति देता है कि गाय को मारने वाले की हत्या कर दी जाए।“

दरअसल सरसंघचालक ने घटना की तीव्र निंदा की थी। लेकिन दोनों अख़बारों ने उनके नाम से ऐसे उद्धरण छापे जो उन्होंने कहे ही नहीं थे।

फिर डोम्बिवली निवासी अक्षय पाठक द्वारा शिकायत किए जाने पर प्रेस काउंसिल ने दोनों संपादकों को ‘कारण बताओ’ नोटिस भेजे।

29 मार्च को जब मुआमले की सुनवाई हुई तब दोनों संपादकों ने प्रेस काउंसिल से कहा कि उन्होंने अनुमान लगाया कि उद्धरण सही होगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस ग़लत उद्धरण के पीछे उनकी कोई ग़लत मंशा नहीं थी। साथ ही साथ उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि शिकायतकर्ता शिकायत करने वाला होता कौन है?

काउन्सिल ने यह मानने से इनकार कर दिया कि ग़लती जानबूझकर नहीं कि गई। काउन्सिल ने कहा कि यदि किसी जूनियर पत्रकार द्वारा यह ग़लती होती तो यह अनजाने में कई गई ग़लती मानी जा सकती थी, पर करण थापर को बरसों का अनुभव है। इस उद्धरण की आसानी से जाँच हो सकती थी। जब कि किसी बड़े संगठन के शीर्षस्थ व्यक्ति पर आरोप लगाया जा रहा है, स्तंभकार को और भी सावधान होना चाहिए।

शिकायतकर्ता के बारे में काउंसिल ने कहा कि यदि किसी अख़बार में कुछ ग़लत छपता है तो एक मामूली से पाठक को भी शिकायत का अधिकार है।

प्रेस काउंसिल ने अख़बारों द्वारा खेद व्यक्त किए जाने के तरीके पर भी असहमति जताई और कहा कि यह केवल क़ानून से बचने का एक चोंचला है। दोनों संपादक अपनी गलती मान लेने से कतरा रहे हैं।

काउंसिल ने निर्देश दिए कि आर्डर की एक-एक प्रति DAVP, लोक संपर्क निदेशालय महाराष्ट्र सरकार और डिप्टी कमिश्नर मुम्बई को भेज दी जाए।

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