नदियों का सूखना देश के प्राणतत्व के अवसान सरीखा

इस देश की 65 फीसदी जल संबंधी जरूरत नदियों से पूरी होती है, लेकिन मौजूदा स्थिति पर विचार करें तो हर तीन में से दो बड़े शहर पहले से ही रोज पानी की कमी से जूझ रहे हैं

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सूर्यदेव अंगारे बरसा रहे हैं। तापमान में निरंतर इजाफा हो रहा है। बिजली आपूर्ति की मांग बढ़ रही है, जबकि उसके बरक्स उत्पादन कम हो रहा है। नदियां सूख रही हैं, तालाब सूख रहे हैं। जलाशयों का जलस्तर भी निरंतर कम हो रहा है। सच तो यह है कि भारत की नदियां जबर्दस्त बदलाव के दौर से गुजर रही हैं। आबादी और विकास के दबाव ने उनकी कमर तोड़ दी है। बारहमासी नदियां मौसमी बन कर रह गई हैं। अब उनमें बरसात के दिनों में ही पानी नजर आता है। कई छोटी नदियां पहले ही गायब हो चुकी हैं। इससे हर साल बाढ़ और सूखे की स्थिति पैदा होती है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और दिल्ली की जल जरूरतों को पूरा करने वाली सदानीरा गंगा भी इस प्रचंड गर्मी में छोटी नदी का शक्ल धारण कर चुकी है। इलाहाबाद में तो गंगा की सतह नजर आने लगी है। ऐसे अनेक जिले हैं, जहां गंगा के पाट तो चौड़े दिखाई देते हैं, लेकिन धारा के लिहाज से वह एक छोटी नदी या माइनर जैसी ही नजर आती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान चला रखा है। नमामि गंगे योजना चला रखी है, इसके बाद भी नाले बड़ी संख्या में गंगा में गिर रहे हैं। औद्योगिक कचरे भी गंगा में बहाए जा रहे हैं। कमोबेश यही स्थिति उसकी सहायक नदियों की है।
गंगा पर जगह-जगह बने बांधों के चलते भी गंगा में पानी की कमी नजर आने लगी है। यमुना की हालत तो और भी दयनीय है। आदिगंगा समझी जाने वाली गोमती भी सूख रही है। यद्यपि सरकार के स्तर पर इसे सदानीरा बनाने के लिए जनसहभागिता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन हनुमान सेतु के पास गोमती में जलकुंभी की भरमार गोमती के संरक्षण के प्रति सरकार और स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका पर सवाल जरूर खड़ा करती है। घाघरा, सरयू और शारदा नदियों में भी पानी की कमी देखी जा रही है। लखीमपुर जिले में तो सुहेली नदी एक तरह से सूख ही गई है। रामगंगा नदी में भी पानी की कमी शिद्दत से देखी जा रही है। सरायन नदी भी सूख गई है। सई नदी के तट पर बालू उड़ रही है। कर्मनाशा, दुर्गावती, चंद्रप्रभा और गोहुअन जैसी नदियों में भी जलाभाव देखा जा रहा है। कहीं-कहीं तो इन नदियों में घुटने भर भी पानी नहीं है। उत्तराखंड में चंद्रभागा तो बरसात में ही नीरपूर्णा होती है बाकी समय तो वह सूखी ही रहती है।
उत्तराखंड के 800 झरने जो सदानीरा हुआ करते थे, अब या तो मौसमी हो गए हैं या फिर अपना वजूद खो चुके हैं। नदियों के सूखने से भारत का 25 प्रतिशत हिस्सा रेगिस्तान बनने की ओर अग्रसर है। अगर यही हालत रहे तो आगामी कुछ वर्षों में हमें अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत जल भी नहीं मिल पाएगा। गंगा दुनिया की उन पांच नदियों में से एक है, जिसके वजूद पर खतरा मंडरा रहा है। गोदावरी भी पिछले साल कई जगहों पर सूख गई थी और इस साल भी उसमें पानी का अभाव देखा जा सकता है। कावेरी अपना 40 प्रतिशत जल प्रवाह खो चुकी है। कृष्णा और नर्मदा में भी 60 फीसदी पानी घट गया है। देश के हर प्रांत में नदियों की स्थिति बेहद दयनीय है। केरल में भरतपूजा, कर्नाटक में काबिनी, तमिलनाडु में कावेरी, पलार और वैगाई, उड़ीसा में मुसल, मध्य प्रदेश में क्षिप्रा में जलाभाव शिद्दत से देखा जा सकता है। कई छोटी नदियां तो गायब ही हो गई हैं। इस देश की 65 फीसदी जल संबंधी जरूरत नदियों से पूरी होती है, लेकिन मौजूदा स्थिति पर विचार करें तो हर तीन में से दो बड़े शहर पहले से ही रोज पानी की कमी से जूझ रहे हैं। शहरियों को एक केन पानी के लिए सामान्य से दस गुना अधिक खर्च करना पड़ता है। 80 फीसदी पानी अन्न को उगाने के लिए इस्तेमाल होता है।
हर व्यक्ति की औसत जल आवश्यकता 11 लाख लीटर सालाना है। ऐसे में अगर नदियां ही नहीं बचीं तो आम आदमी का क्या होगा? मध्य-प्रदेश के सतपुड़ा व अन्य इलाकों की ज्यादातर नदियां सूख गई हैं। नरसिंहपुर और होशंगाबाद जिले की, सींगरी, बारूरेवा, शक्कर, दुधी, ओल, आंजन, कोरनी, मछवासा और पलकमती जैसी नदियां पूरी तरह सूख गई हैं। इनमें से ज्यादातर बारहमासी थीं। पीने के पानी से लेकर फसलों के लिए भी पानी का संकट बढ़ गया है। नदियों के सूखने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं। 148 दिनों तक चली ‘नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा’ के समापन समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि देश में अनेक नदियां हैं। नक्शे पर उनके निशान है, लेकिन पानी का नामोनिशान नहीं है। कई नदियां इतिहास के गर्त में चली गई हैं। केरल की ‘भारत पूजा’ नदी बचेगी कि नहीं बचेगी, यह चिंता का विषय है। नर्मदा नदी भी मध्यप्रदेश और गुजरात में सूख रही है। उसका जलस्तर निरंतर सूख रहा है। इसकी वजह उस पर बने कई बड़े बांध भी हैं। गुजरात में नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध में भी जलस्तर का घटना चिंता का विषय बना हुआ है। कई इलाके तो ऐसे हैं जहां नदियों के नामोनिशान तक नहीं बचे हैं। वहां लोगों ने कब्जा कर लिया है। शिवराज सिंह चौहान सरकार ने भी 313 ऐसी नदियों को चिह्नित किया है, जो सूख चुकी हैं। इन्हें पुनर्जीवित किए जाने की योजना बनाई गई है। नर्मदा, चंबल, बेतवा, क्षिप्रा, गंभीर, जामनी व धसान लगातार प्रदूषित हो रही हैं। इनका जल प्रवाह भी प्रभावित हो रहा है।
पंजाब के भाखड़ा नांगल और रणजीत सागर समेत इसके सभी बांधों में पानी की कमी चिंता का विषय है। इसका असर बिजली उत्पादन पर भी पड़ रहा है। डेयर डैम में दो फुट पानी कम हो गया है। कांग्रेस शासन में ही उत्तराखंड के लोहारी, नाग, पाला मनेरी, और भैरव घाटी के बांधों को तो निरस्त किया गया था लेकिन सांसदों के प्रतिरोध के बाद भी 150 बांधों पर काम नहीं रोका गया। अलबत्ता 550 बांधों को चिह्नित कर लिया गया, जहां से बिजली उत्पादन हो सकता है। गंगा को, अलकनंदा को और मंदाकिनी को बचाने के लिए टिहरी डैम से बड़े बांधों के मोह से उबरना ही होगा। गंगा और हिमालय समाप्त हो गये तो देश की पहचान मिट जाएगी। देश के 50 करोड़ लोगों की आजीविका गंगा और यमुना से चलती है। उत्तराखंड में ऐसी कई जल परियोजनाएं कांग्रेस के दौर से ही चल रही हैं, जिन्हें पर्यावरण के लिहाज से अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी, लेकिन अब भी उन्हें कोई देखने वाला नहीं है। बोरवेल व हैंडपंप जहरीला पानी उगल रहे हैं । हिमालय जिस तरह से पिघल रहा है, वहां की नदियों में पानी नहीं है। उन नदियों में रन ऑफ दी रिवर प्रोजेक्ट्स का बनना चिंताजनक तो है ही।
हिन्दुस्थान समाचार/सियाराम पांडेय ‘शांत’
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