देश के उच्च कोटि के शिक्षा शास्त्री, देश की एकता और अखण्डता के संरक्षक, विभाजन के दंश से त्रस्त देशवासियों के तारणहार, राष्ट्रवादी विचारधारा से ओत-प्रोत, ‘जनसंघ’ नामक राजनीतिक पार्टी के संस्थापक, देश के सांस्कृतिक, यथार्थवादी और भविष्यद्रष्टा चिंतक, राजनीतिज्ञ, जम्मू-कश्मीर को भारत से पूरी तरह एकाकार करने के प्रयास में अपने प्राणों की आहुति देने वाले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को निःसन्देह बिना किसी झिझक के भारतमाता का महान और समर्पित सपूत कहा जा सकता है।

भारत माता के ऐसे महान सपूत का जन्म 07 जुलाई 1901 को भवानीपुर, उत्तर कोलकाता में हुआ था। इनके पिता का नाम सर आसुतोष मुखर्जी और माता का नाम योगमाया देवी था। बंगाल का यह मुखर्जी परिवार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पितामह गंगा प्रसाद मुखर्जी के समय से ही कोलकाता के सर्वाधिक प्रतिष्ठित परिवारों में गिना जाता था। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता सर आसुतोष मुखर्जी ने तो अपनी विद्वता, प्रतिष्ठा, निष्ठा और देश भक्ति से अपने कुल की प्रतिष्ठा को असीम ऊंचाई तक पहुंचाया था।

1923 में डाॅ. श्यामा प्रसाद ने एमए की परीक्षा विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान पर रहते हुए उत्तीर्ण की। इसके अगले ही वर्ष 1924 में उन्होंने बेचलर ऑफ लॉ की परीक्षा भी विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान पर रहते हुए उत्तीर्ण की। कोलकाता हाईकोर्ट में वकालत के साथ-साथ कोलकाता विश्वविद्यालय के कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करने के अतिरिक्त वह पत्रकारिता से भी जुड चुके थे। उन्होंने बंगबाणी नाम से बांग्ला भाषा की एक पत्रिका भी निकाली। वे कोलकाता विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे।

1938 के पश्चात मुखर्जी ने सक्रिय राजनीति में जाने का निश्चय किया। 1940 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को हिन्दू महासभा का कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्ति किया गया। डॉ. मुखर्जी एक यथार्थवादी राजनेता थे, उन्होंने कृषक प्रजा पार्टी को जो मुस्लिम लीग की सहयोगी थी, उसे अपनी सूझबूझ से अलग कर लिया और फजहुलहक के नेतृत्व में नई सरकार बनवाया। डॉ. मुखर्जी स्वयं इस सरकार में वित्त मंत्री बने। 1942 को मिदिनापुर में आए भयानक तूफान से पीड़ित जनता को न तो ब्रिटिश सरकार द्वारा कोई सहायता दी गई और न डॉ. मुखर्जी और उनके मंत्रिमण्डल के सहयोगियों को ऐसा करने दिया गया। डॉ. मुखर्जी ने जब यह देखा कि सरकार में मंत्री होते हुए भी वे पीड़ित आम जनता की सहायता नहीं कर पा रहे है तो 16 नवम्बर 1942 को उन्होने बंगाल के गर्वनर को अपना त्यागपत्र प्रेषित कर दिया।

1943 में बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, लेकिन ब्रिटिश सरकार और बंगाल की मुस्लिम लीग की सरकार ने कोई सहायता नहीं पहुंचाई। ऐसी स्थिति में डॉ. मुखर्जी के नेतृत्व में बंगाल के अकाल पीड़ितों को सहायता पहुंचाने के लिए जो कार्य किए गए, वो अपने आप में एक अमिट उदाहरण बन गया। डॉ. मुखर्जी के आह्वान पर जिस प्रकार देशवासियों ने जाति-धर्म का भेद भुलाकर इन राहत कार्यो में योगदान दिया, वह राष्ट्र और मानवता की सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण था। इसी दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत को धर्म के आधार पर विभाजित करने वाले क्रिप्स प्रस्ताव को पुनः अमल में लाने की प्रक्रिया आरंभ कर दी। पहले से ही उपयुक्त समय की ताक में बैठी मुस्लिम लीग ने भी इस प्रस्ताव के आधार पर पृथक मुस्लिम राष्ट्र बनाने की अपनी मांग तेज कर दी।

कांग्रेस पार्टी का रवैया भी इस मामले पर समर्थन देने वाला जैसा ही था। इधर मुस्लिम लीग पूरा बंगाल और पंजाब पाकिस्तान में मिलाना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने हिन्दू बहुल पश्चिम बंगाल के लोगों को बंगाल से खदेड़ने के लिए वहां साम्प्रदायिक दंगे भड़का दिए। ऐसी स्थिति में अगस्त 1946 में जैसे ही मुस्लिम लीग ने कोलकाता में भीषण लूटपाट और मारकाट मचाते हुए दंगे भडकाने की शुरूआत की, तो डॉ. मुखर्जी द्वारा बनाए गए हिन्दुस्तान नेशनल गार्ड नामक संगठन के स्वयंसेवकों और जागरूक हिन्दुओं ने डा. मुखर्जी के नेतृत्व में लीगी आतताइयों का जमकर मुकाबला किया और बंगाल को हिन्दू मुक्त करने की मुस्लिम लीग की योजना को विफल कर दिया। डॉ. मुखर्जी ने विभाजन को अपरिहार्य देखते हुए निर्णय लिया कि बंगाल के हिन्दू बहुल पश्चिमी भाग को मुस्लिम बहुल पूर्वीं भाग से अलग कर दिया जाए, ऐसी ही सोच उनकी पंजाब के बारे में थी, क्योंकि उन्हे अच्छी तरह से पता था कि यदि दोनो प्रान्त पूरी तरह पाकिस्तान में गए तो दोनो ही जगह हिन्दुओं का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। इस तरह से डॉ. मुखर्जी के प्रयासों से यह मुद्दा जन आंदोलन बन गया और ब्रिटिश सरकार को बंगाल और पंजाब का विभाजन करना पड़ा। यदि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पूरी ताकत से संघर्ष न किया होता तो आज न तो पश्चिम बंगाल और न पंजाब भारत के नक्शे में होता।

स्वतंत्र भारत में जब प्रथम सरकार का गठन हुआ तो कांग्रेस पार्टी ने उन्‍हें मंत्रिमण्डल में शामिल होने के लिए निमंत्रित किया। डॉ. मुखर्जी ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और उन्हें उद्योग मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने अत्यन्त सफलतापूर्वक अपने दायित्व का निर्वहन किया। पर 1947 में जब पाकिस्तान ने कबाइलियों के माध्यम से जम्मू-कश्मीर पर हमला कर उसके करीब एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया, तभी से हालात बिगड़ने लगे। पण्डित नेहरू जिस प्रकार दुर्बलता का परिचय दे रहे थे, उसने डॉ. मुखर्जी को किसी भावी खतरे के प्रति आशंकित ही नहीं, चिंतित भी कर दिया था। पाकिस्तान ने काश्मीर के हिन्दुओं के साथ पूर्वी बंगाल के डेढ़ करोड हिन्दुओें को भी त्रस्त करना शुरू कर दिया था। स्थिति यहा तक बिगड़ी कि 1949 तक लगभग बीस लाख हिन्दू पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थी के रूप में भारत आ चुके थे। 1950 तक पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में तो मानवता का गला ही घोंट दिया गया। पचास हजार से अधिक हिन्दुओं की नृशंस हत्या कर दी गई।

हिन्दुओं का सब कुछ लूटकर पशुओं की भांति उन्हे खदेड़ा जाने लगा। ऐसे में डॉ. मुखर्जी ने नेहरू सरकार से तत्काल सैन्य कार्यवाही करने का कहा, लेकिन जब सरकार ने कोई ठोस और सार्थक कदम नहीं उठाया तो अप्रैल 1950 में पण्डित नेहरू को मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया। इसके पश्चात् डॉ. मुखर्जी ने देश की तात्कालीन राजनीतिक परिस्थितियो का आकलन करने के पश्चात् यह निश्चय किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही वह संगठन है जो एक नए राजनीतिक दल का आधार बन सकता है। इसी भित्ति पर जनवरी 1951 में दिल्ली में भारतीय जनसंघ के नाम से एक नए राजनीतिक दल का गठन हुआ, जिसके डाॅ. मुखर्जी प्रथम अध्यक्ष बने।1952 के चुनाव परिणामों में जनसंघ को 3 लोकसभा और 33 विधानसभा सीटों पर ही विजय मिल सकी। यद्यपि यह अपेक्षित नहीं था फिर भी जनसंघ के प्रत्याशियों को जिस प्रकार जनमत प्राप्त हुआ था, उसने उसे देश के चार प्रमुख राजनीतिक दलों में शामिल कर दिया था। यह डॉ. मुखर्जी की योग्यता ही थी कि विपक्ष के 25 सदस्यों को संगठित कर उस गुट के नेता बन गए और कांग्रेसियों तक ने उन्हें विरोधी दल के नेता के रूप में स्वीकार कर लिया। स्थिति यह थी कि डॉ. मुखर्जी की प्रभावी भूमिका के चलते कई जनविरोधी कदमों को वापस लेना पड़ा।

उन्हे निकटता से जानने वाले उन्हे संसद का शेर कहते थे, और यह भी कहते थे कि देश का शासन भले ही पण्डित नेहरू के हाथों में है, किन्तु संसद में डा. मुखर्जी का ही शासन चलता है। पूर्वी बंगाल में नेहरू सरकार के निष्क्रिय और उदासीन रवैए के चलते डॉ. मुखर्जी अपना सत्याग्रह आरंभ करने वाले थे कि तभी काश्मीर की समस्या अत्यन्त भयावह हो उठी। यद्यपि काश्मीर को पाकिस्तानी आक्रमण से बचाने के लिए काश्मीर के महाराज हरिसिंह और वहां के मुस्लिम नेता शेख अब्दुला ने काश्मीर के भारत में विलय के प्रस्ताव पर अपनी मोहर लगा दी थी, पर पण्डित नेहरू के इस कथन ने कि काश्मीर के भारत के विलय का निर्णय वहां की आम जनता लेगी-इस समस्या की नींव रख दी, साथ ही इस समस्या को यूएनओ में ले जाकर बड़ी भूल की। इन सबका परिणाम यह हुआ कि शेख अब्दुला को वहां अपनी मनमानी करने का अवसर सहज ही उपलब्ध हो गया और वह अपनी सोची समझी राजनीति के तहत कश्मीर को भारत से अलग एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने की अपनी महत्वाकांक्षी योजना पर काम करने लगा।

पंडित नेहरू पर दबाव डालकर उसने जो समझौता किाय उसके तहत शेख अब्दुला को पृथक नागरिकता, पृथक संविधान, पृथक ध्वज और राज्य के निर्वाचित प्रधान का अधिकार मिल गया था। डॉ. मुखर्जी ने इस समझौते का कड़ा विरोध करते हुए इसे भारत की अखण्डता और संप्रभुता के लिए बड़ा खतरा बताया। उन्होंने कहा कि यदि देश का संविधान सभी रियासतों के लिए समान है तब कश्मीर के लिए क्यों नहीं? चूंकि उस समय जम्मू-कश्मीर में परमट व्यवस्था लागू थी और उसके तहत जम्मू कश्मीर के अलावा देश के और किसी भी नागरिक को वहां जाने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। पर डाॅ. मुखर्जी का कहना था कि जब जम्मू काश्मीर भी भारत के अन्य प्रांतों की भांति भारत का अभिन्न अंग है, तो जम्मू कश्मीर जाने के लिए भी उन्हे किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं थी। इसी के तहत 8 मई 1853 वे कश्मीर के लिए रवाना हुए। जब डॉ. मुखर्जी अपने चार साथियों के साथ तवी नदी के पुल पर जम्मू -कश्मीर की सीमा के भीतर पहुंचे तो पुलिस ने उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया गया और निशातबाग के समीप एक छोटे से बंगले में ले जाकर नजरबंद कर दिया।

यहां उन्हें किसी से मिलने की अनुमति नहीं थी। वस्तुतः यह एक यातना-शिविर जैसा था। यहां संदिग्ध स्थिति में 23 जून 1953 को उनकी मृत्यु हो गई। डॉ. मुखर्जी को बलिदान व्यर्थ नहीं गया। जम्मू-कश्मीर की स्थितियों में बहुत परिवर्तन हुआ। उन्हीं के चलते अब वहां प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री है। भारत का संविधान बहुत कुछ वहां लागू हो रहा है। यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान का ही प्रतिफल है कि आज केन्द्र में एक पूर्ण बहुमत वाली बीजेपी सरकार शासन कर रही है। डॉ. मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी कहलाएगी, जब वहां कश्मीरी पण्डितों की ससम्मान वापिसी होगी और धारा 370 की समाप्ति होगी। पूरी उम्मीद है कि आने वाले समय में ऐसा हो सकेगा।

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