आतंकियों पर मत कीजिये रहम

आतंकवादी और कश्मीर के अलगाववादी समूहों कि मानवीय संवेदनाएं समाप्त हो चुकी हैं और उन्हें सिर्फ भारत के खिलाफ एक मुहिम चलाने और खूनखराबा करने से ही मतलब है

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पाकिस्तान और उसकी शह पर पलने वाले आतंकवादियों ने रमजान के दौरान केंद्र सरकार के सीजफायर के दौरान अपनी हरकतों से साफ कर दिया है कि वे कभी भी सुधर नहीं सकते। केंद्र सरकार ने इस उम्मीद से एकतरफा सीजफायर का ऐलान किया था, ताकि रमजान का महीना शांतिपूर्वक मनाया जा सके और मुस्लिम समाज में विश्वास की भावना को जगाया जा सके। सरकार का इरादा आतंकवादियों और अलगाववादी गुटों को सद्भावपूर्ण माहौल में बातचीत का रास्ता अख्तियार करने के लिए प्रेरित करने का भी था। भारत सरकार के इस सद्भावपूर्ण पहल की न तो पाकिस्तान ने कोई इज्जत की, ना ही उसके टुकड़े पर पलने वाले आतंकवादियों ने। और यही वजह है कि सरकार को ईद के बाद सीजफायर के अपने फैसले को वापस लेने के लिए बाध्य होना पड़ा। हालांकि केंद्र सरकार द्वारा रमजान के दौरान किये गये सीजफायर के फैसले की हर तरफ काफी तारीफ हुई।

कश्मीर के मुस्लिम बहुसंख्यक लोगों को शांतिपूर्ण तरीके से रमजान मनाने देने के लिए सुरक्षाबलों ने सरकार के फैसले को पूरी तरह से लागू भी किया। इस फैसले की जम्मू कश्मीर के साथ-साथ पूरे देश के लोगों की ओर से सराहना भी हुई। यह कश्मीर के आम निवासियों के लिए राहत लेकर आने वाला फैसला था। उम्मीद की गई थी कि केंद्र सरकार की इस पहल की सफलता सुनिश्चित करने में हर कोई अपनी ओर से सहयोग करेगा। निश्चित रूप से सुरक्षाबलों ने रमजान की अवधि में पूरे संयम और धैर्य का प्रदर्शन करते हुए अपने हाथ बांधे रखे, लेकिन आतंकवादी अपनी गंदी हरकतों से बाज नहीं आये, वहीं पाकिस्तान ने भी बार-बार सीजफायर का उल्लंघन कर बता दिया कि उसकी नीयत में ही खोट है। उम्मीद की जा रही थी कि अगर सीजफायर के दौरान आतंकी घटनाओं में कमी आई तो रमजान के बाद भी इसे कुछ और समय के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है, लेकिन सरकार की इस सदाशयता को आतंकवादियों ने उसकी कमजोरी समझा और इस दौरान आतंकी हमलों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई।

स्वाभाविक रूप से सरकार के इस फैसले की जहां शांति के पक्षधर लोग स्वागत कर रहे थे, वहीं राजनीतिक तौर पर इसकी जमकर आलोचना भी हुई। भारत की वही विपक्षी पार्टियां, जो बुरहान वानी और ऐसे कई युवा आतंकवादियों के मारे जाने पर अपनी छाती पीटने के लिए कुख्यात रही हैं, उसने भी केंद्र का विरोध करने के लिए एकतरफा सीजफायर के फैसले की जमकर आलोचना की। जहां तक राजनीतिक आलोचना की बात है, तो इसकी उपेक्षा भी की जा सकती है, लेकिन महत्वपूर्ण बात तो यह रही कि सीजफायर के दौरान ना तो आतंकी घटनाओं में कमी आई, ना ही पाकिस्तान ने सीजफायर का उल्लंघन करने की घटनाओं पर कोई अंकुश लगाया। मजबूरन केंद्र सरकार को ईद के बाद सीजफायर के फैसले को वापस लेना पड़ा। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस आशय की घोषणा करते हुए आदेश दिया है कि सेना को आतंकवादियों के खिलाफ चल रहे ऑपरेशन को पहले की तरह ही शुरू कर देना चाहिए। दरअसल, जब केंद्र सरकार ने रमजान के महीने में एकतरफा सीजफायर करने का ऐलान लिया किया था, तभी इस बात की आशंका जतायी गयी थी की सरकार का यह निर्णय आतंकवादियों के लिए अपनी शक्ति जुटाने का मौका भी साबित हो सकता है।

इसमें कोई शक नहीं है कि केंद्र के दिशा निर्देश पर चल रहे आतंकवाद विरोधी अभियान में सेना और सुरक्षाबलों ने पिछले कुछ समय में जबरदस्त सफलता हासिल की है। यह ठीक है कि इस दौरान सुरक्षाबल को भी अपने कई जांबाज़ जवानों को खोना पड़ा है, लेकिन इसी दौरान कई दुर्दांत आतंकवादियों को भी मार गिराने में तथा गिरफ्तार करने में सुरक्षाबलों तथा सेना के जवानों को सफलता मिली है। सच्चाई तो यह है कि रमजान के पहले तक आतंकवादियों की स्थिति इतनी बुरी हो चुकी थी कि सुरक्षाबल आने वाले कुछ महीनों में आतंकियों का पूरी तरह से कमर तोड़ सकते थे। लेकिन, जब जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केंद्र से रमजान के दौरान आतंकवादियों के खिलाफ चल रहे अभियान को रोकने का आग्रह किया, तो गठबंधन की मजबूरी के कारण केंद्र ने भी इस सलाह को स्वीकार कर लिया। लेकिन इससे आतंकवादियों को शह ही मिली और उन्होंने अपनी गतिविधियां और तेज कर दी। हमें मानना पड़ेगा कि आतंकवादी और उनको शह देने वाला पाकिस्तान किसी भी सदाशयता पूर्ण कार्यवाही का तलबगार नहीं है। उनसे शांति और अमन की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। उन्हें जब भी मौका मिलेगा, वे देश को तोड़ने और निर्दोष नागरिकों के बीच जाकर खूनखराबा करने से बाज नहीं आएंगे। इन लोगों का सिर्फ एक ही इलाज है कि किसी भी तरह इन्हें चुन-चुनकर मौत के घाट उतार दिया जाए।

हमें याद रखना होगा कि मानवाधिकार की बात उनलोगों के लिए की जानी चाहिए, जिनमें मानवीय संवेदनाएं होती हैं। लेकिन, जिनमें मानवीय संवेदनाएं नहीं होती, उनके लिए मानवाधिकार की बात करना भी बेमानी है। आतंकवादी और कश्मीर के अलगाववादी समूहों कि मानवीय संवेदनाएं समाप्त हो चुकी हैं और उन्हें सिर्फ भारत के खिलाफ एक मुहिम चलाने और खूनखराबा करने से ही मतलब है। इसलिए इनसे बातचीत की पेशकश करने से ज्यादा बेहतर है कि इन्हें कुचल डाला जाए। कहना होगा कि केंद्र सरकार ने सीजफायर खत्म करने का फैसला करके एक जरूरी फैसला किया है और अब आतंकवादियों के खिलाफ अभियान चलाने में किसी भी तरह की सुस्ती नहीं बरती जानी चाहिए। रमजान के दौरान सीजफायर करने का फैसला सरकार के लिए एक सबक भी होना चाहिए। उसे यह समझ लेना चाहिए कि यह आतंकवादी सिर्फ देश के ही दुश्मन नहीं हैं, बल्कि इंसानियत और मानवता के भी अपराधी हैं और इन्हें सीजफायर जैसे तरीकों से सुधारा नहीं जा सकता। इन को सुधारने का एक ही तरीका है। और वह है, इन्हें निर्ममता के साथ कुचल डालना। ये लोग ऐसे ही बर्ताव के हकदार हैं।

SOURCEहिन्दुस्थान समाचार/दिव्य उत्कर्ष
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