संवाद लोकतंत्र की आत्मा है। लोकतंत्र को जिंदा रखना है तो संवाद जरूरी है। हिंदुस्तान में अरसे बाद जन संवाद पर जोर दिया गया है। इसकी अनिवार्यता सुनिश्चित की गयी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र में अपनी सरकार बनने के तत्काल बाद ही जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र से जुड़ने, उनकी समस्याएं जाने और उनका समाधान करने की जरूरत पर बल दिया था। लाल किले की प्राचीर से उन्होंने सांसदों से अपील की थी कि हर सांसद कम से कम अपने क्षेत्र के एक गांव को गोद ले। उसे आदर्श गांव बनाए। यह और बात है कि बहुत कम सांसदों ने उनकी इस अपील पर अमल किया। विपक्षी सांसदों ने तो उसे हवा में ही उड़ा दिया। कुछ ने सवाल उठाया कि इसके लिए तो अतिरिक्त धन की जरूरत होगी। वे किसी गांव को गोद तो तब लें जब सरकार उनकी सांसद निधि बढ़ाये। उस समय जितने मुंह, उतनी बातें हुई थीं। बस गांवों को गोद लेने का उपक्रम नहीं हुआ। जिन कुछ सांसदों ने गांवों को गोद लिया, उनमें भी कुछ ने ही गांवों को विकसित करने की औपचारिकता निभायी। सांसदों की इस अन्यमनस्कता को जनता ने भी महसूस किया और इसका असर इस बीच होने वाले चुनाव परिणामों पर दिखा भी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार अपने सांसदों और मंत्रियों का जनता के बीच जाना और गांवों में रात्रि विश्राम अनिवार्य कर दिया है। उनके इस निर्देश को बेहद गंभीरता से लिया गया है। लोकसभा का अगला चुनाव इसकी वजह हो सकती है, लेकिन आजाद भारत में सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों का जनता से जुड़ना, उनके दरवाजे तक पहुंचना बहुत बड़ी बात है। हालांकि जनता आपके द्वार कार्यक्रम अन्य सरकारों में भी शुरू हुए थे, लेकिन यह सब केवल औपचारिकता और पब्लिसिटी स्टंट तक ही सिमट कर रह गये थे। मंत्रियों और अधिकारियों के रात्रि विश्राम की तो नौबत ही नहीं आयी। उत्तर प्रदेश की योगी आदि सरकार और अन्य बीजेपी शासित राज्यों में मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और अधिकारियों का रात्रि विश्राम विकास की उम्मीद तो जगाता ही है।

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने तो यहां तक मुनादी कर दी है कि जब तक लोक महत्व की नौ विकास योजनाओं को बीजेपी गांव-गांव पहुंचा नहीं देगी तब तक वह 2019 के लोकसभा चुनाव का प्रचार नहीं करेगी। यह अपने आप में बहुत बड़ी भीष्म प्रतिज्ञा है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए। इस तरह की प्रतिज्ञा करने के लिए 56 इंच का सीना होना चाहिए। लोकतंत्र में इस तरह के प्रयोग पहली बार हो रहे हैं। इसके लिए बीजेपी साधुवाद की पात्र है। योगी आदित्यनाथ सरकार में नियमित जनता दरबार आज भी लग रहा है। भले ही हरबार उनकी उपस्थिति न रहती हो, लेकिन कोई न कोई मंत्री जनता की समस्याओं को सुनता जरूर है। पहले मुख्यमंत्रियों के जनता दरबार रस्म अदायगी से अधिक नहीं हुआ करते थे। जनता दरबार में आई भीड़ को मुख्यमंत्री तक पहुंचने में पसीने छूट जाते थे, लेकिन योगी आदित्यनाथ खुद हर फरियादी तक जाते हैं, उसका शिकायत पत्र लेते हैं और उसकी समस्या सुनते हैं। इससे जनता का सरकार के प्रति विश्वास तो बनता ही है। मुख्यमंत्री खुद जिलों में रात्रि विश्राम कर रहे हैं। दिन में जन संवाद कर रहे हैं। जनता की समस्याओं को जानने, विकास योजनाओं की हकीकत से रूबरू होने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है? लखीमपुर, सीतापुर, वाराणसी और मथुरा की जन चैपाल में उन्होंने जिस तरह ग्राम प्रधानों से सीधा संवाद किया है, विकास में ग्राम प्रधानों के महत्व को प्रतिपादित किया है, उसे हल्के में नहीं लिया नहीं जा सकता।

योगी आदित्यनाथ की इस बात में दम है कि अब तो ग्राम प्रधानों को विधायकों से अधिक विकास पैकेज मिल रहा है। प्रोत्साहन का यह तरीका प्रदेश ने खूब पसंद किया है। मथुरा को उन्होंने शराब मुक्त जिला घोषित किया है। इस बाबत कैबिनेट में प्रस्ताव भी पास हो गये हैं। अच्छा होता कि योगी आदित्यनाथ प्रदेश भर में शराब बंदी कानून लागू करते। उत्तराखंड के कुछ जिलों में पहले ही शराबबंदी कानून लागू है। शराब से देश के लाखों-करोड़ों घर बर्बाद हो रहे हैं। जहरीली शराब से लोगों के मरने का सिलसिला भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। पड़ोसी राज्य बिहार में शराब बंदी हो सकती है तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं। रात्रि विश्राम के दौरान सरकार को गांव की सभी समस्याओं का अध्ययन करना चाहिए और सूची बनाकर एक-एक समस्या का समाधान करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों बहुत पते की बात कही थी कि थाने, तहसील और ब्लाॅक के कर्मचारी ही अगर अपना काम ईमानदारी से करने लगें तो गांवों की अधिकतम समस्या खुद समाप्त हो जाएंगी। इतना सब जानने के बाद भी ग्रामीणों की समस्या हल न हो तो इसे सरकार की विफलता ही कहा जाएगा। लोकतंत्र में जो कुछ भी होता है, उसमें प्रचार पाने की अभीप्सा प्रमुख होती है। जनता की समस्याओं का तो सरकार को भान हो जाता है, लेकिन उसका समाधान नहीं हो पाता। इसे बहुत मुफीद नहीं कहा जा सकता।

मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक जितना ही जनता के करीब रहेंगे, उतना ही वे उनके हित की सोच पाएंगे। इसका असर अधिकारियों पर भी पड़ेगा। अभी तक गलतियों के लिए छोटे अधिकारियों और कर्मचारियों पर ही कार्रवाई की गाज गिरती रही है, जब तक बड़े अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन संभव नहीं है। लोकतंत्र के लिए इसे बेहद शुभ संकेत कहा जा सकता है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीएसपी भी अब जनता चौपाल लगाने जा रही हैं। अगर सभी दल जनता के बीच जायेंगे, तो इससे जनता को भी उन्हें समझने का मौका मिलेगा और जनसमस्याओं के समाधान में कोई निर्णायक राय बनाने में मदद मिलेगी। हालांकि जनसमस्याओं को हर राजनीतिक दल अपने-अपने नजरिये से देखता है। प्रयास तो समस्याओं के समाधान का होना चाहिए। समस्याओं पर राजनीति से तो उनका उलझना तय है। राजनीतिक दल चाह लें, सरकारें चाह लें तो जन समस्याओं का समाधान चुटकी बजाते ही हो सकता है। बस इच्छाशक्ति होनी चाहिए।