प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ़्रॉम सेक्शुअल ऑफ़ेन्सेस एक्ट (पॉस्को) क़ानून में 12 साल से कम आयु की बच्चियों के साथ बलात्कार के दोषी को मृत्युदंड दिए जाने का प्रावधान शामिल करना समाज का सरकार पर दबाव का नतीजा है। उन्नाव और कठुआ की कथित बलात्कार की घटनाओं पर शोर अधिक हुआ हालांकि दुष्कर्म की घटनाएँ — और पुलिस की अकर्मण्यता की घटनाएँ भी — देश भर में आम हैं और ऐसी प्रत्येक शर्मनाक घटना पर प्रतिक्रिया इतनी ही तीव्र होनी चाहिए। तदापि ऐसी प्रतिक्रियाएँ स्वाभाविक व मानवीय हैं और इसलिए इनके आगे नतमस्तक होना लोकतंत्र का सम्मान है, भले ही ये प्रतिक्रियाएँ चयनात्मक क्यों न हों। इस हंगामे के कारण विदेशी संस्थाएँ और विभिन्न सक्रिय प्रतिभागी (activist) संगठनों के अलावा यह मांग केन्द्रीय महिला व शिशु विकास मंत्री मेनका गाँधी तथा सांसद हेमा मालिनी ने भी की थी। परन्तु विश्व भर के अपराध के रिकॉर्ड से ऐसे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता कि भयानक सज़ा के ख़ौफ़ से अपराधी मानसिकता के लोग अपराध करना छोड़ देते हैं। इस सन्दर्भ में अक्सर कुछ इस्लामी मुल्कों की मिसालें दी जाती हैं जहाँ अपराध की संख्या कम है और इसका कारण यह बताया जाता है कि गोली मारकर या पथराव के द्वारा मुजरिम को मौत के घाट उतारना या उसके अंग-प्रत्यंग कटवा देने जैसी भयंकर सज़ा के डर से अपराधी अपराध से बाज़ आ जाते हैं। यह भुला दिया जाता है कि उन देशों में मुआमले जल्द-अज़-जल्द निपटा दिए जाते हैं — कहीं-कहीं क़ाज़ी जुर्म के मौक़े पर ही सज़ा सुना देते हैं और हुक्म की तामील के लिए जल्लाद वहीं मौजूद होता है — और अदालत द्वारा मुल्ज़िम को मुजरिम क़रार दिए जाने का दर काफ़ी ऊँचा होता है जिससे कि सज़ा की सम्भावना अपराधी मानसिकता वाले लोगों को अधिक निकट और अवश्यम्भावी नज़र आती है।

धैर्य और विवेचना से यदि अपराध के दृश्य पर विचार किया जाए तो यह बोध होगा कि अपराधी अपराध करने के मुहूर्त पर यह सोच अपने मस्तिष्क में आने ही नहीं देता कि वह पकड़ा जाएगा और उसे सज़ा भी होगी। अपराध के समापन के पश्चात उसमें अपने कृत्य के परिणाम का ख़याल आता है और तब वह अपराध के प्रमाण मिटाने की कोशिश करता है। ऐसे में कोई बलात्कारी भी इसी मानसिक अवस्था से गुज़रेगा और उसका शिकार पुलिस को कोई बयान न दे पाए, वह इसका इंतज़ाम करेगा। तात्पर्य यह है कि वह अपने शिकार को मार डालेगा। परन्तु यदि बलात्कार और क़त्ल की सज़ाएँ अलग हों तो यह संभव है कि उसे आइ पी सी की धारा 376 के अंतर्गत सात साल की सज़ा मंज़ूर हो पर आइ पी सी की धारा 302 के तहत फाँसी मंज़ूर न हो। जब बिना ख़ून किए भी सज़ा मौत होगी तो बलात्कार के शिकार का ख़ून कर देना अपराधी को क़ानून से बचने का बेहतर उपाय मालूम होगा। अतः जो प्रावधान समाज के हित में बनाया गया है उससे बलात्कार की घटनाएँ कम हों या न हों, क़त्ल की घटनाओं की संख्या अवश्य बढ़ जाएंगी — ख़ास कर बलात्कारियों द्वारा क़त्ल की घटनाएँ।

भारत में विपक्ष के राजनेता, प्रतिभागी और सरकार में मंत्री एक ही ढर्रे की सोच रखते हैं। किसी भी घटना की देश भर में तीव्र प्रतिक्रिया हो तो तुरंत नए क़ानून की मांग उठती है और मांग मंज़ूर भी कर ली जाती है। विड़म्बना यह है कि दुनिया में सबसे वृहद् संविधान भारत का है और सर्वाधिक संख्या में क़ानून भी इसी देश में मौजूद हैं। अगर क़ानून के बन जाने मात्र से अपराध ख़त्म हो जाते तो विश्व भर में भारत में अपराधों की संख्या सबसे कम होनी चाहिए थी, पर ऐसा है नहीं। सन 2011 में तो इस मांग को लेकर कुछ मीडिया द्वारा प्रोत्साहित प्रतिभागी टीवी पर तांडव करने लगे थे कि भ्रष्टाचार मिटाने के लिए लोकपाल का गठन कर दिया जाए। इसमें हास्यास्पद बात यह थी कि भष्टाचार के आरोप सरकार पर लगे थे और उसी सरकार के एक तंत्र लोकपाल को भ्रष्टाचार का समाधान बताया जा रहा था! अगले ही साल 16 दिसंबर की रात एक भयंकर घटना देश की राजधानी दिल्ली में घटी। वबाल तब भी हुआ। पर अत्यंत विलक्षणता का प्रमाण देते हुए जस्टिस जे एस वर्मा, जस्टिस लीला सेठ व वकील गोपाल सुब्रमण्यम् की न्यायिक समिति ने 80,000 सुझावों पर विचार करने के बाद बलात्कारी को फाँसी देने की मांग की अनसुनी कर दी। ख़ैर, न्याय के पंडितों की बुद्धि के साथ किन्हीं राजनेताओं की मजबूरी की तुलना सामान्यतः नहीं की जा सकती। अब यस्मिन देशे यदाचार के मन्त्र को शिरोधार्य कर भारतीय समाज यह देख ले कि उसने जो मांग की थी और जो मांग मंज़ूर कर ली गई उसके क्या परिणाम परिलक्षित होते हैं।

Leave a Reply