‘दलित’ समुदाय जिसे नहीं चाहिए आरक्षण

इस समुदाय के लोगों का कहना है कि 1927 में जब अंग्रेजों ने इनको अनुसूचित जाति में शामिल किया था तब भी इस समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया था क्योंकि उसके पहले इन लोगों को समाज में मान सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था

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आजादी के 70 साल बाद भी देश में आरक्षण एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। आरक्षण हटाने, आरक्षण की स्थिति की समीक्षा करने और आरक्षण को जारी रखने की बात को लेकर लगभग हमेशा ही देश के किसी न किसी हिस्से में हंगामा मचता रहा है।

अप्रैल के महीने में ही आरक्षण के समर्थन में और आरक्षण के खिलाफ भारत बंद का आयोजन किया जा चुका है। गुर्जर, जाट और पटेल जैसे समृद्ध और उन्नत समझे जाने वाले देश के कई वर्ग भी अब आरक्षण की मांग को लेकर सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में अगर कोई आरक्षण छोड़ने की मांग करे या खुद को अनुसूचित जाति से बाहर करने की मांग करे तो इसे एक आश्चर्यजनक बात ही समझना चाहिए।

तमिलनाडु का एक समुदाय लंबे समय से खुद को आरक्षण की श्रेणी से बाहर करने की मांग कर रहा है। लगभग 60 लाख की जनसंख्या वाला देवेंद्रकुला वेल्लालर समुदाय आजादी के पहले से ही इस बात की मांग कर रहा है कि वे क्षत्रिय हैं और उन्हें अनुसूचित जाति में नहीं रखा जाना चाहिए। वे खुद को आरक्षण के दायरे से बाहर किए जाने की भी मांग करते रहे हैं।

इस समुदाय के लोग तमिलनाडु के मध्य, पश्चिमी और दक्षिण तमिलनाडु में ज्यादा संख्या में बसे हुए हैं। इसके साथ ही दिल्ली के बाहरी इलाकों में भी इस समुदाय के लगभग चार लाख लोग रहते हैं। इस समुदाय ने अपनी मांग को लेकर पुतिया तमिलगम के नाम से एक राजनीतिक पार्टी भी बनाई हुई है और इसके नेता कृष्णासामी दो बार तमिलनाडु विधानसभा के लिए भी चुने जा चुके हैं।

इन लोगों का मानना है कि रिजर्वेशन की वजह से उनका नुकसान ही हो रहा है। इस समुदाय के लोगों का कहना है कि 1927 में जब अंग्रेजों ने इनको अनुसूचित जाति में शामिल किया था तब भी इस समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया था क्योंकि उसके पहले इन लोगों को समाज में मान सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। एक बार अनुसूचित जाति का दर्जा मिलते ही समाज के तमाम वर्गों ने इन्हें दलित मान लिया और समाज से उनका मान-सम्मान खत्म हो गया।

[pullquote]खेती का काम करने के बावजूद समाज में उनकी स्थिति दलितों के समान बनी हुई है और 1927 में अनुसूचित जाति से संबद्ध कर दिये जाने की वजह से उन्हें समाज में भेदभाव का शिकार भी होना पड़ता है। और तो और, निजी व्यवसाय की कोशिश करने पर भी लोग इन्हें दलित मानते हुए इनके साथ व्यापार करना नहीं चाहते हैं[/pullquote]

इस समुदाय के अधिकांश लोग खेती मजबूरी के काम से जुड़े हुए हैं या खुद खेतिहर किसान हैं। कुछ लोगों को आरक्षण की वजह से सरकारी नौकरियां भी मिली है लेकिन अभी भी अधिकांश लोग खेती किसानी से ही जुड़े हुए हैं। इस समुदाय के नेता कृष्णासामी, जो पेशे से डॉक्टर हैं, का कहना है कि अनुसूचित जाति के रूप में उनके समुदाय को शामिल कर लिए जाने की वजह से पूरे समुदाय का सोशल स्टेटस कुछ भी नहीं रह गया है और क्षत्रिय के रूप में हमारी मूल पहचान भी खत्म हो गई है।

अनुसूचित जाति में शामिल कर दिए जाने की वजह से इस समुदाय को भी आदि द्रविड़ समुदाय के समकक्ष मान लिया गया है। आदि द्रविड़ समुदाय के लोग पुश्तैनी रूप से ढोल बजाने का काम करते रहे हैं और उन्हें सैकड़ों सालों से समाज से बाहर माना जाता रहा है। इसलिए आदि द्रविड़ समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा देकर आरक्षण की मदद से उनका संवर्द्धन करना जरूरी था।

देवेंद्रकुला वेल्लालर समुदाय का काम हमेशा ही समाज के बीच में रहकर खेती-किसानी करके जीवनयापन करना रहा है। खेती का काम करने के बावजूद समाज में उनकी स्थिति दलितों के समान बनी हुई है और 1927 में अनुसूचित जाति से संबद्ध कर दिये जाने की वजह से उन्हें समाज में भेदभाव का शिकार भी होना पड़ता है। और तो और, निजी व्यवसाय की कोशिश करने पर भी लोग इन्हें दलित मानते हुए इनके साथ व्यापार करना नहीं चाहते हैं। ऐसे में उनके लिए सरकारी नौकरी करने का ही विकल्प बचता है, लेकिन जिस तरह से सरकारी नौकरियों की संख्या कम होती जा रही है, उसमें इनके लिए विकास के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।

समुदाय के नेताओं का कहना है कि आजादी के बाद आरक्षण 10 वर्षों के लिए दिया गया था, लेकिन राजनीतिक वजह से इसे लगातार बढ़ाया जा रहा है। सरकार को इस बात की भी समीक्षा करनी चाहिए कि आरक्षण का वास्तविक हकदार कौन है। साथ ही सरकार को इस बात का भी ध्यान देना चाहिए कि आरक्षण की सुविधा पाने वाले किन समुदायों की स्थिति ऐसी हो गई है कि वे बिना आरक्षण के भी अपना जीवनयापन आसानी से कर सकते हैं। ऐसी समीक्षा करके सरकार को हर साल कुछ समुदायों को आरक्षण के दायरे से बाहर निकालकर सामान्य वर्ग में करना चाहिए।

डॉ कृष्णासामी कहते हैं कि उनका समुदाय पहले भी आरक्षण लेने का पक्षधर नहीं था और आज भी आरक्षण पाने का पक्षधर नहीं है। ऐसे में सरकार सबसे पहले उनके ही समुदाय को आरक्षण के दायरे से बाहर कर दे ताकि वे लोग समाज में भेदभाव की भावना से बच सकें और सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर सकें।

ऐसा नहीं है कि इस समुदाय के लोगों में गरीबी नहीं है। खेतिहर मजदूर होने की वजह से इस समुदाय के अधिकांश लोग रोजाना कमा कर खाने वाले हैं। खेती का मौसम नहीं होने पर इन लोगों के सामने दो जून का खाना जुटा पाना भी कठिन हो जाता है। इसके बावजूद अपने सामाजिक सम्मान के लिए यह समुदाय अनुसूचित जाति के दायरे से खुद को बाहर करना चाहता है तो सरकार को इस दिशा में भी विचार करना चाहिए।

देवेंद्रकुला वेल्लालर समुदाय तमिलनाडु के 18 जिलों में अच्छी संख्या में है। इन 18 जिलों की 30 विधानसभा सीटों पर इस समुदाय के लोग अपना असर डालते हैं। इन तमाम सीटों पर लगभग 30 से 35 हजार की संख्या में इस समुदाय के वोटर हैं। ऐसी स्थिति में इस समुदाय की मांग को मानकर सरकार अपना वोट बैंक मजबूत भी कर सकती है। लेकिन डर इस बात का भी है कि अगर एक समुदाय को अनुसूचित जाति के दायरे से बाहर करके आरक्षण की सुविधा से वंचित किया गया, तो देश में इसे नकारात्मक तरीके से प्रचारित करके कहा जायेगा कि सरकार आरक्षण खत्म कर रही है। इस तरह की पब्लिसिटी कोई भी सरकार नहीं चाहेगी। कोई भी पार्टी नहीं चाहेगी कि एक समुदाय के लिए किया गया कोई काम बाकी समुदायों को उससे दूर कर दे।

सच्चाई यह है कि अगर देश का समग्र विकास करना है तो सरकार को इस बात की समीक्षा करनी ही होगी कि आरक्षण से आजादी के बाद के सालों में किन समुदायों को लाभ मिल सका है और अभी भी कितने समुदाय आरक्षण के लाभ से वंचित हैं। जिन समुदायों को आरक्षण का समुचित लाभ मिल चुका है, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर करके वंचित समुदाय को आरक्षण का पूरा फायदा देने की कोशिश होनी ही चाहिए, ताकि देश का हर नागरिक विकास की दिशा में अग्रसर हो सके।

हिन्दुस्थान समाचार/लेखक दिव्या उत्कर्ष आईसीएफएआई यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक हैं

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