फिर पीछे रह गये दलित

2015 में पार्टी में इस पर मंथन भी हुआ था और वैचारिक रूप से माना गया कि यह पार्टी की कमजोर नब्ज है

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बात तीन साल पहले 2015 की है। विशाखापत्तनम में आयोजित सीपीएम की 21वीं पार्टी कांग्रेस के दौरान तत्कालीन महासचिव प्रकाश करात से पूछा गया था कि सीपीएम पोलित ब्यूरो में दलितों का प्रवेश कब होगा। तब उन्होंने कहा था कि नए केंद्रीय समिति के गठन का इंतजार कीजिए। उस समिति का कार्यकाल अप्रैल 2018 में खत्म हो गया और उसकी जगह नई केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो ने ले ली है, लेकिन इंतजार है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। हैदराबाद में पार्टी का 22वां अधिवेशन खत्म हो गया और एक बार फिर एक भी दलित को पोलित ब्यूरो में चुनने लायक नहीं समझा गया। हालांकि चर्चा थी कि छात्र संगठन एसएफआई से आगे आए एके बालन को यह मौका मिल सकता है, क्योंकि वह लंबे समय से केंद्रीय समिति के सदस्य थे और केरल सरकार में मंत्री भी हैं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। नवगठित केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो के सदस्यों के नाम पर सरसरी निगाह डालने से साफ हो जाता है कि संगठन पर अगड़ी जातियों का कब्जा है। इसकी अगुवाई तेलुगू ब्राह्मण सीताराम येचुरी करते हैं। इन दोनों सूची में कुछ पिछड़े और मुसलमान अवश्य दिखते हैं, लेकिन दलित नहीं। जानकर हैरानी होगी कि पार्टी के पचास साल से अधिक के इतिहास में सिर्फ 5 महासचिव हुए हैं, सभी अगड़ी जातियों के। जबकि जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकताओं की बड़ी संख्या दलितों की है।

2015 में पार्टी में इस पर मंथन भी हुआ था और वैचारिक रूप से माना गया कि यह पार्टी की कमजोर नब्ज है। तब लगा कि नेतृत्व के स्तर पर दलितों की भगीदारी बढ़ानी होगी, लेकिन उसे अमली जामा आज तक नहीं पहनाया जा सका है। पार्टी के नेताओं से बात करिए तो वे कहेंगे कि ‘हम कॉमरेड की जाति नहीं देखते। उनके काम, जमीनी स्तर पर संघर्ष, लोगों के बीच काम करने का अनुभव ही उनकी योग्यता है। लेकिन पार्टी में बड़ा पद पाने के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता सबसे उपर है।’ सवाल है कि जब पार्टी में पद देने के लिए जाति नहीं योग्यता देखते हैं तो फिर दलितों को सरकारी नौकरियों और निजी क्षेत्र में आरक्षण देने की वकालत किस आधार पर करते हैं? दरअसल वैचारिक रूप से जड़ हो चुकी सीपीएम आज भी जाति के बदले वर्ग की राजनीति करने पर भरोसा करती है। यह अलग बात है कि उसकी यह नीति पूरी तरह से फेल हो गई है। वाम दलों की इस नीति के कारण ही समाजवादी पार्टी, बीएसपी, आरजेडी जैसी पार्टियां फली-फूली और सत्ता पाने में सफल रही है। पहले कांग्रेस और फिर बीजेपी से विमुख हुए कमजोर तबके के वोटरों ने वाम दलों की बजाए उन दलों को चुना जहां उन्हें अपनी जाति का नेता दिखा। नतीजा सामने है।

आज सीपीएम सिर्फ केरल में तक ही सिमट कर रह गयी है। बंगाल से तृणमूल कांग्रेस ने सीपीएम का पहले ही सफाया कर दिया था और अब त्रिपुरा से भी बीजेपी ने उसको बेदखल कर दिया है। लोकसभा में भी उसके पास मात्र नौ सांसद ही हैं। जाति आधारित राजनीति के केंद्र हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी का जनाधार खत्म हो चुका है। फिर भी पाटी के राष्ट्रीय अधिवेशन में पांच दिनों तक इसी पर चर्चा होती रही कि पार्टी को कांग्रेस के साथ जाना चाहिए या नहीं। सीताराम येचुरी को महासचिव चुनने के पीछे एक बड़ी वजह यह रही कि वे राहुल और सोनिया गांधी के लगातार संपर्क में हैं और 2019 के आम चुनाव में पार्टी को कांग्रेस के प्रस्तावित गठबंधन में जगह दिला सकते हैं। सारा खेल इसी बात पर टिका है कि सीपीएम अगले चुनाव में ऐसे किसी गठबंधन की मदद से किस तरह से अपने कुछ नेताओं को लोकसभा में भेज सके, ताकि संसद में उनका नामलेवा बचा रहे। ऐसे में क्या कोई इस बात की उम्मीद कर सकता है कि सीपीएम कभी सच में दलितों को पार्टी नेतृत्व में आगे लाने की बात पर गंभीर हो सकेगी?

हिन्दुस्थान समाचार/संजय झा

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