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Wednesday 8 July 2020

माकपा घोषणापत्र — ग़रीबी हटा नहीं सकते तो क्या, बाँट तो सकते हैं!

भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी [माकपा या CPI(M)] ने अपने घोषणापत्र में कमर-तोड़ टैक्स की पेशकश की है

नई दिल्ली — माकपा ने गुरुवार को आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए अपने घोषणापत्र में बड़े पैमाने पर निगरानी, वैधानिक न्यूनतम वेतन रु० 18,000 प्रति माह से कम और दूरसंचार और इंटरनेट सेवा प्लेटफार्मों पर एकाधिकार पर अंकुश लगाने का प्रस्ताव किया। लेकिन मेनीफ़ेस्टो में जो बात सबसे कम्युनिस्ट-योग्य है वह यह कि अमीरों पर ही नहीं बल्कि मध्यम वर्ग पर भरपूर टैक्स लगाए जाएँ।

माकपा के घोषणापत्र में पार्टी ने वैकल्पिक नीति मंच का प्रस्ताव किया है जिसके तहत उसने धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत और संविधान में निहित अधिकारों और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी उपज बेचने के अधिकार को लागू करने के अधिकार में निहित अधिकारों के संरक्षण के लिए कहा।

इसने रु० 18,000 प्रति माह से कम नहीं, वैधानिक न्यूनतम वितरण प्रणाली, प्रति परिवार 35 किलो अनाज के साथ सार्वभौमिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली, अमीर के करों में वृद्धि, विरासत कर की बहाली और प्रति माह रु० 6,000 रुपये की वृद्धावस्था पेंशन का भी प्रस्ताव किया है।

हैरत की बात है कि माकपा ने कांग्रेस के वादे 5 करोड़ ग़रीबों को सालाना रु० 72,000 अनुदान से बढ़-चढ़ कर कोई वादा नहीं किया है।

पर घोषणापत्र में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि इन तमाम अनुदानों की आपूर्ति कैसे होगी, इतने पैसे आयेंगे कहाँ से।

वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के अनुसार भारत को यदि अपने सकल घरेलु उत्पाद या जीडीपी के 3.5% से अधिक का राजकोषीय घाटा (fiscal deficit) हुआ तो विकास के काम आने वाली धनराशि के कई सारे अंतर्राष्ट्रीय स्रोत बंद हो जायेंगे — जैसे बिजली, सड़क, पानी आदि के प्रकल्पों के लिए लागत के लिए दिए गए वर्ल्ड बैंक, आइएमएफ़, एडीबी आदि से ऋण।

इसके अलावा व्यवसाय में पूँजी लगाने वाले अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के लिए भी भारत का आकर्षण कम हो जाएगा क्योंकि एक ऐसी अवधारणा बनेगी कि इस देश में बिज़नेस पर काफ़ी टैक्स लगाया जाता है। उद्योगों के कम होने से नौकरियाँ भी कम होंगी जिसका अंत में असर ग़रीबों पर ही पड़ेगा।

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