Saturday 31 October 2020

दिल्ली में कोरोनावायरस नियंत्रण की जर्जर अवस्था — आपबीती

दिल्ली में तमाम हेल्पलाइन्स से निराश COVID के एक मरीज़ ने गंगा राम अस्पताल से होते हुए मैक्स, अपोलो, एम्स, सफदरजंग आदि के चक्कर लगाते हुए आख़िर एलएनजेपी में अपना दम तोड़ दिया

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हम दिल्ली के निवासी हैं। छब्बीस मई को मेरे 67 वर्षीय ससुर को हल्का बुखार हुआ। जब अगले दो दिनों में बुखार कम नहीं हुआ (उन्हें दमे की भी शिकायत थी और उनकी हालत नाज़ुक थी) तो हमने अस्पताल जाने का जोखिम नहीं उठाया, हमने ऐसी स्थिति में ऑनलाइन परामर्श लेना बेहतर समझा। यह ऑनलाइन सेवा चिकित्सा जगत में ख्यातिप्राप्त है, सो इसपर हम भरोसा कर सकते थे। फिर 29 मई को डॉक्टर ने हमें तीन दिनों के लिए दवाएँ बताईं और सुझाव दिया कि यदि बुख़ार कम नहीं हुआ तो हम COVID-19 परीक्षण करवाएं।

मेरे ससुर को वैसे तो बुख़ार कम था, लगभग 100°F, पर तापमान इससे नीचे नहीं गया, सो हम 31 मई को गंगा राम अस्पताल गए। एक्स-रे से पता चला कि मेरे ससुर को सीने में संक्रमण है। कोरोनावायरस की बीमारी (COVID) के परीक्षण के लिए नमूने लिए गए और अस्पताल के अधिकारियों ने हमें बताया कि परिणाम ऑनलाइन बता दिए जायेंगे। हमें यह भी बताया गया कि यदि रिपोर्ट सकारात्मक आती है तो अस्पताल ख़ुद हमसे संपर्क करेगा।

जिस दिन हम परीक्षण करवाने के लिए गए, भारी बारिश हो रही थी और चूंकि वहाँ कोई सही और साफ़-सुथरा प्रतीक्षा क्षेत्र नहीं था, मेरे ससुर पूरी तरह से भीग गए थे।

फिर 1 जून को हमने रिपोर्ट डाउनलोड की जिसमें कहा गया था कि हमारे ससुर COVID-पॉज़िटिव थे। अब पूरे परिवार के परीक्षण का समय था। हालांकि गंगा राम अस्पताल ने वादा किया था, उन्होंने हमसे संपर्क नहीं किया। जब हमने उन्हें कॉल करने की कोशिश की यह पूछने के लिए कि हमें आगे क्या करना चाहिए तो किसी ने भी उन कॉल का जवाब नहीं दिया।

निराश होकर हमने दिल्ली के दूसरे अस्पतालों से संपर्क करना शुरू किया जिन्हें हम जानते थे कि वे COVID रोगियों को भर्ती कर रहे हैं। हमने मैक्स, अपोलो, एम्स, सफदरजंग को बुलाया — सभी अस्पतालों ने हमें बताया कि उनके यहाँ बेड ख़ाली नहीं हैं।

हम निराश हो चुके थे, मेरे ससुर को भर्ती करने के लिए दिल्ली का कोई भी अस्पताल तैयार नहीं था। ऐसे में हमने उन डॉक्टरों को फ़ोन करना शुरू कर दिया जिन्हें हम जानते थे। उनमें से एक परिचित थे जो किसी अस्पताल में वैसे भी COVID रोगियों के इलाज के लिए बतौर विशेषज्ञ काम कर रहे थे।

इस डॉक्टर को हमारी दुर्दशा के बारे में जानकर हैरत हुई। उन्होंने हमसे कहा कि गंगा राम अस्पताल को ससुर जी को तुरंत दाख़िल करना चाहिए था, अगर वहाँ बेड उपलब्ध नहीं थे तो कम से कम मरीज़ COVID पॉज़िटिव हैं या नहीं इतना अस्पताल के डॉक्टर बता सकते थे। इसके बजाय हमें उन्हें लेकर जगह-जगह अस्पतालों में जाकर गिड़गिड़ाना पड़ रहा था।

वैसे भी डॉक्टरों से COVID रोगियों के इलाज की सलाह फ़ोन पर लेकर मैंने अपने ससुर की दवा शुरू कर दी थी। पर उधर दिल्ली के गंगा राम अस्पताल ने हमारी कॉल का जवाब देना पूरी तरह से बंद कर दिया था।

जब सारे अस्पतालों ने अपने हाथ खड़े कर दिए तब हमें सरकारी हेल्पलाइन की सूझी। हमने पहले केंद्र सरकार की COVID हेल्पलाइन का नंबर लगाया। उधर से जवाब आया कि हमें दिल्ली की हेल्पलाइन पर कॉल करना होगा, कॉल का जवाब देने वाले व्यक्ति ने हमें दिल्ली के हेल्पलाइन नंबर दिए और कहा कि हमारी मदद करने के लिए वे और कुछ नहीं कर सकते। हमने दिल्ली सरकार की हेल्पलाइन को कॉल किया और करते ही रहे! जब भी हमने फोन किया फ़ोन व्यस्त मिला।

फिर बिना किसी मदद के मेरी पत्नी ने ट्विटर का रुख़ किया। उसने अपने पिता के लिए ट्विटर पर अधिकारियों से ख़ूब गुहार लगाईं। कई लोगों ने जवाब दिया, जिसमें एक राजनेता भी शामिल हैं, लेकिन हमें जो सलाह मिली, वह यह थी कि मेरे ससुर का तापमान 101°F से कम था, इसलिए उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं है! हम आश्वस्त नहीं हुए, पर हम असहाय थे क्योंकि कोई अस्पताल मेरे ससुर को दाख़िल करने को तैयार नहीं था।

बार-बार किए गए ट्वीट के बावजूद किसी अस्पताल ने जवाब नहीं दिया।

हालत यह थी कि न तो सरकार से और न ही किसी क्वारंटाइन केंद्र से कोई हमारी मदद को तैयार था। इधर आरोग्य सेतु ऐप पर भी ससुर जी बीमार नहीं दिख रहे थे।

एक तो हमें आगे का रास्ता सूझ नहीं रहा था, ऊपर से 3 जून को ससुर जी का तापमान चढ़ने लगा। यह अब 102°F तक पहुंच गया था। हम फिर से अस्पतालों को कॉल करने का एक सिलसिला शुरू किया पर फिर से हर अस्पताल से वही प्रतिक्रिया मिली — ‘मत आना, हमारे पास बेड नहीं हैं, हम तुम्हें वापस भेज देंगे।’

गुरुवार को सुबह 5 बजे ससुर जी का तापमान फिर से 102°F तक चढ़ गया, हमने उन्हें अब तक डॉक्टरों द्वारा सुझाई गई दवाएं दीं और उनका तापमान 98°F तक नीचे आ गया। हमने फिर से अस्पतालों को फोन करना शुरू किया, लेकिन एक ही जवाब मिला — ‘बेड नहीं है, बेड नहीं है, बेड नहीं है।’

हमने एक बार फिर दिल्ली COVID हेल्पलाइन का नंबर लगाया। इस बार किसी ने जवाब दिया और कहा कि एलएनजेपी में 1,100 बेड हैं, हम मरीज़ को वहां ले जाएं।

हमने ससुर जी को अपनी कार में बिठाकर सुबह 6:50 बजे एलएनजेपी पहुंचे। जब हम COVID ब्लॉक में पहुँचे तो डॉक्टर ने पूछा कि उनका परीक्षण कब और कहाँ हुआ। हमने उसे सभी विवरण दिए, जिसमें यह भी बताया कि मरीज़ को दमे की शिकायत है। इस डॉक्टर ने कहा कि चूंकि गंगा राम में मरीज़ का परीक्षण किया गया था, हमें उन्हें वापस वहीं ले जाना चाहिए। मेरे ससुर पहले से ही बहुत बीमार थे, अस्पताल के आपातकालीन ब्लॉक के ठीक सामने कार में बैठे थे।

जब हम कार में वापस आए तो मेरे ससुर अब और बैठ नहीं पा रहे थे; जल्द ही वे बेहोश हो गए। हम डॉक्टरों के पास वापस गए, उनसे भीख माँगते हुए कहा कि मरीज़ बेहोश हो गया है। वे कहते रहे, ‘यह मरीज़ गंगा राम का है, आपको इन्हें वहीं ले जाना चाहिए।’

हममें से एक ने पास में पड़ी एक स्ट्रेचर को पकड़ लिया, जिससे ससुर जी ठीक से लेट सके, तभी अस्पताल वालों ने कहा, ‘कृपया हमारे स्ट्रेचर न लें, उस अस्पताल में जाएँ जहाँ उनकी पहले जांच हुई थी।”

हमने एक राहगीर से मदद की गुहार लगाई और मेरे अचेत ससुर को कार से बाहर निकाला और स्ट्रेचर पर लेटा दिया। और सभी डॉक्टर कहते रहे कि उन्हें गंगा राम अस्पताल ले जाना चाहिए। हम ज़बरदस्ती आपातकालीन कक्ष में घुस गए। पर अन्दर भी कोई डॉक्टर मरीज़ को देखने को तैयार नहीं हुआ।

हम पहले डॉक्टर के पास भागे जो हमें मिला और उसके पैर पड़ गए। हाथ जोड़कर हमने उनसे हमारे मरीज़ को देखने के लिए विनती की। उन्होंने कहा कि वे उन्हें 10 मिनट में देखेंगे, लेकिन उन्हें गंगा राम अस्पताल ले जाना चाहिए था। दस मिनट बाद उन्होंने आकर कहा कि मरीज़ को तुरंत ऑक्सीजन लगाने की ज़रूरत थी। फिर उन्हें ऑक्सीजन लगाई गई। पंद्रह मिनट बाद ससुर जी का देहांत हो गया।

जब हम अस्पताल जा रहे थे, मेरे ससुर हमसे बात करने की हालत में थे। हम बजाय उनके इलाज के बारे में सोचने के यह सोच रहे थे कि न जाने इस अस्पताल में क्या नई समस्या पैदा होगी। और कुछ ही घंटे बाद की बात थी कि वे हमारे बीच नहीं थे।

फिर से एक नया, लंबा इंतज़ार शुरू हुआ। शवों के बारे में प्रोटोकॉल स्पष्ट है — एम्बुलेंस शव को श्मशान घाट तब तक नहीं ले जाती जब तक कि गाड़ी में भरने के लिए तीन या चार शव नहीं होते। लगा कि ससुर जी के पार्थिव शरीर को श्मशान घाट ले जाने के लिए एक कोटा की ज़रूरत है।

उस दिन हम एक ज़िंदा इंसान को घर से ले गए थे; उनका दाह संस्कार करके वापस लौटे।

मनदीप सिंह

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