Thursday 4 March 2021
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कोरोनावायरस, श्रम का शिकंजा और सिसकता बचपन

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Views Article कोरोनावायरस, श्रम का शिकंजा और सिसकता बचपन

प्राकृतिक आपदा, बाढ़, हिंसक संघर्ष और विस्थापन का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि बच्चे का संबंध गरीब, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग से हो तो उसकी हालत और दयनीय होती है। भोजन, स्वच्छ पेयजल, चिकित्सा, सुरक्षित आवास, कुछ भी उपलब्ध नहीं होता। माइग्रेशन के कारण उन का स्कूल छूट जाता है। अनिश्चितता, कठोर परिस्थिति और गरीबी में हंसता खेलता बचपन श्रम के बोझ तले दब जाता है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा 2015 में सतत विकास के जो लक्ष्य निर्धारित किये गये थे हर प्रकार के बाल श्रम का उन्मूलन उनमें से एक था। दुनिया को 2030 तक गरीबी, बीमारी, अशिक्षा, पर्यावरण के लक्ष्य को प्राप्त करना है। बाल श्रम सहित मानव दासता को 2025 तक खत्म करना है। इस लक्ष्य को हासिल करने में केवल साढ़े चार साल बाकी हैं। लेकिन वैश्विक महामारी के चलते इस लक्ष्य तक पहुंचना आसान नहीं होगा। कोरोनावायरस संकट केवल स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़ा मामला नहीं है। यह बच्चों के भविष्य का संकट भी है।

साल 2000 में दुनिया में 26 करोड़ बच्चे ऐसे थे जिन की उम्र 14 वर्ष से कम थी, उन का वक्त कॉपी किताबों और दोस्तों के बीच नहीं बल्कि होटलों, घरों, कारखानों, उद्योगों, खेत खलियानों, बर्तन बनाने, पोलिश करने वाली फैक्टरीयों और उपकरणों के बीच गुजर रहा था। संयुक्त प्रयासों के कारण, उनकी संख्या घटकर अब 15 करोड़ रह गई है। बच्चों के द्वारा सब से ज्यादा सामान भारत, बांग्लादेश और फिलीपींस में बनाए जाते हैं। दुनिया के कुछ देशों में, श्रम के लिए कोई आयु सीमा नहीं है और कुछ ने खतरनाक कामों की सूची भी नहीं बनाई है। बाल श्रम दुनिया भर में एक बड़ी समस्या है। पिछले साल, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रबंध निदेशक गाय राइडर ने एक कार्यक्रम में चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि जिस गति से बाल श्रम पर काम हो रहा है, उस से अनुमान है कि 2025 में भी 12 करोड़ बाल श्रमिक बच जाएंगे। नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने अपनी प्रतिक्रया देते हुए कहा था कि दुनिया बाल श्रम को समाप्त करने में पूरी तरह सक्षम है। वहां मौजूद कई बुद्धिजीवीयों ने इस बात का समर्थन करते हुए माना था कि योजनाबद्ध तरीके से इस बुराई को मिटाया जा सकता है।

कैलाश सत्यार्थी के अनुसार कोरोनावायरस एक बड़ी चुनौती लेकर आया है। इससे बाल श्रम, बाल विवाह, यौन शोषण और बाल उत्पीड़न का खतरा बढ़ गया है। इसलिए अब हमें और अधिक ठोस और त्वरित समाधान खोजने की जरूरत है। विकास और दासता साथ साथ नहीं चल सकते। लिहाज़ा गुलामी का खात्मा तो करना ही पड़ेगा। कोरोनावायरस से इस वर्ष लगभग 6 करोड़ नए बच्चे अत्यधिक गरीबी में धकेले जा सकते हैं जिन में से बड़ी संख्या बाल मजदूर बन जाएंगी।

1991 की जनगणना के अनुसार, भारत में बाल श्रम का आंकड़ा 11.3 मिलियन था। बच्चों के लिए काम करने वाली एनजीओ के अनुसार, इन में से 50.2 प्रतिशत बच्चे सप्ताह में सातों दिन काम करते हैं। 53.22 प्रतिशत मासूम यौन शोषण का शिकार होते हैं। 50 प्रतिशत खतरनाक परिस्थितियों में काम करते हैं। उनका जीवन गुलामों से भी बदतर है। उन से दिन-रात काम लिया जाता है और मजदूरी का भुगतान भी नहीं किया जाता। और काम न करने पर उन्हें शारीरिक कष्ट सहना पड़ता है। अनुमान है कि नियोजित बाल श्रमिकों में एक तिहाई लड़कियां हैं। बाल श्रम में लगे ज्यादातर बच्चे एशियाई देशों के हैं। खास तोर पर भारत में इस समस्या ने कोरोनावायरस संकट के कारण गंभीर रूप धारण कर लिया है।

जब भी बच्चों के अधिकारों की बात आती है, तो बहाने बनाये जाने लगते हैं। छोटे बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने के लिए गोपाल कृष्ण गोखले ने 1911 में इंपीरियल विधान परिषद में एक विधयक पेश किया था। यह विधयक किशोरों की शिक्षा तक ही सीमित था लेकिन फिर भी पारित नहीं हो सका।1986 में, जब संसद ने क़ानून बनाया कि 18 साल से कम आयु के बच्चों से मजदूरी नहीं कराई जा सकती, तब भी यह सवाल उठा था कि गरीब परिवारों के लिए मुश्किल हो जाएगी। इसका मतलब साफ है कि जो गरीब हैं वे अपनी आजीविका में उलझे रहें। इस से बहार निकल कर उन्हें सोचने का मौका न मिले और न ही उनका देश के किसी मामले से कोई सरोकार हो। बाल श्रम, गरीबी और अशिक्षा के बीच त्रिकोणीय संबंध है। वे एक-दूसरे को जन्म देते हैं, जो सतत विकास, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय और मानव अधिकारों के लिए सबसे बड़ी बाधा है।

सुप्रीम कोर्ट में चले कई मुकदमों, शोध रिपोर्टों और सैकड़ों सामाजी व कल्याणकारी संगठनों की मेहनत और कोशिशों के परिणाम स्वरूप बने राजनीतिक दबाव के कारण 2009 में कांग्रेस सरकार ने अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का कानून बनाया। इसके तहत 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त शिक्षा का मूल अधिकार मिला। इस कानून की बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें छोटी लड़कियां शामिल थीं। इसी के सहारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बेटी बचाओ बेटी पढाई योजना शुरू करने का अवसर मिला। जबकि पिछड़े और वंचित वर्गों को यह सबक पढ़ाया जाता रहा है कि बालिका को जन्म से ही घर के कामों में हाथ बटाने का प्रशिक्षित दिया जाये। यह हमारी सभ्यता का हिस्सा है। सात- आठ साल की लड़की घर कि साफ सफाई, खाना बनाने जैसे दैनिक कामों में सहायता करने के अलावा उस काम में भी दाखिल हो चुकी होती है जो जात के अनुकूल उसका परिवार करता है। लड़की को स्कूल भेजने और स्कूल में उसकी शिक्षा की गुणवत्ता को मापने की कोशिश करने वाला कानून एक सपने जैसा था। इस सपने के साकार होने में सांस्कृतिक कांटे और सरकारी चट्टानें पहले से ही बाधा थीं, फिर 2016 के नए बाल श्रम कानून ने उनके सपने को दशकों आगे खिसका दिया। अर्थव्यवस्था को सुधारने और निवेशकों को आकर्षित करने के लिए श्रम कानूनों को अधिक लचीला बनाने पर सरकारों का जोर रहा है। इस वायरस संकट के दौरान भी कई राज्य सरकारों ने श्रम कानूनों में संशोधन किये हैं।

बाल श्रम कानून को 2012 और फिर 2016 में नरम किया गया। तत्कालीन श्रम और रोजगार मंत्री बंडारु दत्तात्रेय ने बाल श्रम संशोधन विधेयक 2016 को ऐतिहासिक व मील का पत्थर बताया था। उनके अनुसार, इसका उद्देश्य बाल श्रम को पूरी तरह से समाप्त करना था। इस विधेयक में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए पारिवारिक कार्यों को छोड़ कर विभिन्न श्रेणियों में काम करने पर पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि जब कोई कानून जमीन से जुड़ा होता है तभी टिकता है और न्याय देता है। इसे शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 से भी जोड़ा गया है। नया विधेयक कहता है कि कोई भी बच्चा किसी भी काम में नहीं लगाया जाएगा, लेकिन कानून तब लागू नहीं होगा जब बच्चा अपने परिवार या परिवार के काम में मदद कर रहा हो, स्कूल के बाद या छुट्टियों के दौरान और काम खतरनाक न हो। बंडारु दत्तात्रेय ने तर्क दिया कि पारिवारिक व्यवसाय में मालिक-मजदूर का संबंध नहीं होता। यह बड़ी सरल बात लगती है कि बच्चे घर के कामों में मदद करें। सवाल यह है कि बच्चे स्कूल के बाद या छुट्टियों के दौरान काम करेंगे तो सैर व तफरी कब करेंगे? पढ़ेंगे कब ? खेलेंगे कब? क्या यह उनके मानसिक विकास के लिए यह ठीक होगा? क्या उनके नाजुक शरीर पर किसी भी तरह के श्रम का बोझ लादना सही होगा? और यह कौन निर्धारित करेगा कि बच्चा परिवार के काम में मदद कर रहा है? या वह अपने माता-पिता के कर्ज का भुगतान करने के लिए बंधुआ मजदूर बन गया है।

बाल श्रम विधेयक 2016 में खतरनाक उद्योगों की संख्या 83 से घटाकर 3 कर दी गई है। अब केवल खनन, अग्निशामक और विस्फोटक को ही खतरनाक माना गया है, तो क्या ज़री, प्लास्टिक, चूड़ी उधोग, कपड़े, कालीन बनाने, दुकान, कारखाने, खेत खल्यान में कीटनाशकों और रसायनों के बीच काम करना बच्चों के लिए सुरक्षित है? क्या बीड़ी बनाने, रंग पेंट करने, ईंट के भट्टों में काम करना उनके लिए ठीक है? क्या कचरा चुनना या ढोना उनके स्वास्थ्य के लिए सही है? क्या फिल्म, टीवी धारावाहिक और विज्ञापनों में कलाकार के रूप में काम करने से बच्चों में तनाव पैदा नहीं होता है? क्या यह उनके मानसिक विकास के लिए अच्छा है? कुछ लोग ट्रैफिक सिग्नल पर किताबें, अखबार, फूल, खिलौने, मोबाइल चार्जर बेचकर अपना जीवन यापन करते हैं, तो क्या उनके बच्चों को ट्रैफिक सिग्नल पर सामान बेचने की अनुमति होगी? पारिवारिक कार्यों में बच्चों के सहयोग के पीछे तर्क यह है कि यह बच्चों को गृहकार्य और कौशल सिखा सकता है, लेकिन यह जाति व्यवस्था को मजबूत करने का एक षड्यंत्र है। विशेषज्ञ इसके विरुद्ध हैं, उनका मानना है कि इससे स्कूल छोड़ने वालों की संख्या बढ़ेगी। सवाल यह है कि बच्चे को माता-पिता के पेशे को क्यों अपनाना चाहिए? वास्तव में, बच्चों को माता-पिता के व्यवसाय से जोड़ने का मतलब है उद्योगों के लिए सस्ते श्रम की व्यवस्था करना। मोदीजी ने दुनिया भर में घूम -घूम कर वादा किया है कि यदि आप हमारे देश में औद्योगीकरण करते हैं, तो सस्ते श्रमिक हम प्रदान करेंगे। बाल कल्याण एवं अधिकारों के लिए काम करने वालों का मानना है कि अगर बाल श्रम को देश से समाप्त करना है, तो बाल श्रम कानूनों में ढील नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि इस से असंगठित श्रेणी के श्रमिकों में गरीबी और बाल श्रम में इजाफा होगा।

कोरोनावायरस संकट के कारण बाल श्रम में सुधार के बजाए हालत और बिगड़ने की संभावना है। कोड- 19 से सब से अधिक सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा कमज़ोर वर्ग प्रभावित हो रहा है। उन में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है, जिसका ख़मयाज़ा उनके बच्चों को भुगतना पड़ेगा। इसका परिणाम बाल श्रम के रूप में सामने आ सकता है। सरकार 30 करोड़ बच्चों को मिड-डे मील या स्कूल जाने के बदले उनके माता-पिता को नकद रक़म देती है। लॉकडाउन और बीमारी के डर से स्कूल बंद हैं। लंबे समय के लिए स्कूल छूट जाने के बाद, अधिकांश गरीब बच्चे दोबारा स्कूल नहीं लौटते। उनके मजदूर बनने की संभावना बढ़ जाती है। भारत के लाखों प्रवासी श्रमिकों के बच्चों के साथ भी ऐसा ही कुछ हो सकता है। यदि समाज, सरकार, उद्योगपति, व्यवसायी बच्चों को काम पर जाने से रोकने के लिए ठोस पहल करें तो बच्चों को श्रम की बेड़ियों से बचाया जा सकता है। सुरक्षित और समृद्ध बचपन से ही एक सुरक्षित और समृद्ध देश का निर्माण संभव है। आज यदि हम अपने बच्चों को बेहतर जीवन नहीं दे पाए तो कल पूरी पीढ़ी की बर्बादी के दोषी कहलायेंगे।

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Muzaffar Husain Ghazali
Lawyer by training, associate editor at Daily Urdu Net and editor at UNN India

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