कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी की सरकार बने अभी एक महीने भी नहीं हुए हैं, लेकिन उनकी कुर्सी डांवाडोल होने लगी है। शपथ लेने के बाद से ही उनको एक के बाद एक झटका लग रहा है। पहले यह तय नहीं हो पा रहा था की सरकार में कांग्रेस और जेडीएस की हिस्सेदारी किस अनुपात में होगी। बड़ी मुश्किल के बाद जब यह बात तय हुई, तो विभागों के बंटवारे को लेकर मामला अटक गया। अब जब विभागों के बंटवारे का मामला निपटा तो कांग्रेसी विधायकों के असंतोष ने सरकार की परेशानियां बढ़ा दी हैं। कांग्रेस विधायकों के असंतोष ने कुमारस्वामी की पेशानी पर बल ला दिया है। माना जा रहा है कि 20 से अधिक कांग्रेसी विधायक मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर नाराज हैं। ये सभी विधायक मंत्रिमंडल में स्थान पाने का दावा कर रहे हैं। परेशानी ये है कि मंत्रिमंडल में दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे का जो फार्मूला तय हुआ है, उसके मुताबिक अब अधिकतम 6 कांग्रेसी विधायकों को मंत्री पद दिया जा सकता है।

परेशानी ये भी है कि मंत्री पद के दावेदार अधिक हैं और जगह कम। कुमारस्वामी की एक परेशानी ये भी है कि कांग्रेस के किन छह विधायकों को मंत्री पद दिया जायेगा, ये तय करने का अधिकार भी उनके पास न होकर कांग्रेस आलाकमान के पास है। कहा जा सकता है कि असंतोष की बात से तो कांग्रेस को चिंतित होना चाहिए, लेकिन परेशान कुमारस्वामी दिख रहे हैं। पहले असंतोष जेडीएस में भी था, लेकिन अब वहां मामला लगभग सलट गया है, लेकिन कांग्रेस के अंदर जारी विवाद अभी भी सतह पर नजर आ रहा है। और कांग्रेस का असंतोष कुमारस्वामी का ब्लडप्रेशर बढ़ा रहा है। वे अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस में चल रहे विवाद को जल्द निपटा लिया जाये, ताकि वे निश्चिंत होकर अपनी सरकार चला सकें। लेकिन परेशानी ये है कि कांग्रेस आलाकमान ने इस मसले पर चुप्पी साध रखी है। कुमारस्वामी असंतुष्ट कांग्रेसी विधायकों को मनाने के लिए प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एमबी पाटिल से भी मिल चुके हैं। लेकिन नाराज विधायकों के तेवर अभी भी ढीले नहीं हुए हैं। पाटिल से मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस विधायकों की नाराजगी का मुद्दा उनसे जुड़ा हुआ नहीं है, लेकिन गठबंधन का नेता होने के नाते उनकी नैतिक जिम्मेदारी है कि गठबंधन के सहयोगी दल में किसी भी तरह का असंतोष ना रहे।

दरअसल, कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद जो स्थिति बनी है, उसमें जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन की स्थिति काफी नाजुक है। थोड़ी सी भी ऊंच-नीच सरकार को डांवाडोल कर सकती है। 224 सदस्यों वाली विधानसभा में तीन स्थान अभी रिक्त हैं। शेष 221 स्थानों में से 104 पर बीजेपी का कब्जा है। ऐसे में यदि कांग्रेसी विधायकों का असंतोष बढ़ा तो यह सरकार के लिए घातक हो सकता है। स्वाभाविक रूप से सरकार डांवाडोल हुई, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी भी नहीं बचेगी। एचडी कुमारस्वामी की भी चिंता यही है। देखा जाए तो सरकार को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कांग्रेस में असंतोष खत्म होता है या नहीं। चिंता इस बात की है कि असंतुष्ट विधायकों ने मंत्री पद नहीं मिलने की स्थिति में विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देने की धमकी दे दी है। नाराज विधायकों का ये भी कहना है कि संख्या बल में अधिक होने की वजह से सरकार में कांग्रेस की महत्ता अधिक होनी चाहिए, लेकिन चूंकी सरकार की अगुवाई जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी कर रहे हैं, इसलिए सरकार में जेडीएस अधिक प्रभावशाली हो गई है।

कांग्रेस आलाकमान कीहालांकि गुलाम नबी आजाद ने मामले को सुलझाने की कोशिश जरूर शुरू की है, लेकिन उनकी सारी कोशिश अभी टेलीफोनिक ही है। वो दिल्ली में बैठ करके ही टेलीफोन पर अलग-अलग विधायकों से बात करने में जुटे हुए हैं। बताते हैं कि कुछ विधायकों को चेतावनी दी जा रही है, तो कुछ को प्यार से समझाने की कोशिश की जा रही है। संभव है कि कांग्रेस के विधायक कुछ दिनों की नाराजगी के बाद पार्टी आलाकमान के दबाव में शांत भी हो जाएं, लेकिन सरकार के कार्यकाल की शुरुआत में ही जिस तरह का संकट खड़ा हुआ है, उसे पांच साल के कार्यकाल के लिहाज से अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। जहां तक बीजेपी की बात है, तो पार्टी नेता बीएस येदियुरप्पा ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस के अंदरूनी झगड़े से उनकी पार्टी का कोई लेना देना नहीं है। उनका ये भी कहना है कि ये सरकार कुछ ही समय में गिर जाएगी, क्योंकि सैद्धांतिक तौर पर दोनों ही दल अलग-अलग विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके लिए लंबे समय तक साथ चलना संभव नहीं होगा।

यह सच्चाई भी है कि कई मुद्दों पर दोनों दलों के बीच अभी से ही मतभेद नजर आ रहे हैं। जेडीएस अपना चुनावी मुद्दा छोड़ना नहीं चाहती है, वहीं कांग्रेस भी अपने मुद्दों को पकड़ कर रखना चाहती है। यही वजह है कि अभी तक दोनों दलों के बीच न्यूनतम साझा कार्यक्रम भी तैयार नहीं हो सका है। ये सारे संकेत ऐसे हैं, जो किसी भी गठबंधन सरकार के भविष्य की अनिश्चितता को दर्शाते हैं। अगर कांग्रेस ईमानदारी से 2019 के आम चुनाव तक इस गठबंधन को बनाये रखना चाहती है, तो उसे अपनी जिद छोड़कर जीडीएस की बात को मानते हुए ही आगे बढ़ना पड़ेगा। क्योंकि, अगर यह गठबंधन टूटा, तो न केवल कर्नाटक में बीजेपी सत्ता में आ जाएगी, बल्कि आने वाले लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी राज्य में सबसे बड़ी शक्ति बन कर उठ खड़ी होगी। राज्य में गठबंधन की सरकार को चलाते रहना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती है। उसे तत्काल अपने असंतुष्ट विधायकों को मनाने की कोशिश करनी चाहिए और एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार कर उसके मुताबिक सरकार का कामकाज संपादित होने देना चाहिए।

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