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Friday 24 January 2020

उमर अब्दुल्ला — ‘कांग्रेस में कुछ मित्रों’ की साज़िश थी कि AFSPA न हटे

कांग्रेस के घोषणापत्र में AFSPA में संशोधन के वादे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा कि काश वे इस मुद्दे का उल्लेख तब करते जब वे मुख्यमंत्री थे

बारामुला | सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम (AFSPA) में संशोधन के कांग्रेस के चुनावी वादे को ‘देर आए, दुरुस्त आए’ बता कर नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने मंगलवार को कहा कि कांग्रेस में उनके कुछ मित्रों ने अधिनियम को हटाने के ख़िलाफ़ साज़िश रची थी। इस क़ानून को हटाने की मांग उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान की थी।

“काश वे इस मुद्दे का उल्लेख (घोषणापत्र में) तब करते जब मैं मुख्यमंत्री था। उस समय जब मैंने AFSPA को हटाने की मांग की थी, कांग्रेस में कुछ दोस्तों ने इसके ख़िलाफ़ साज़िश रची थी। मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता। लेकिन, मुझे (पूर्व केंद्रीय मंत्री पी) चिदंबरम साहब से ही समर्थन मिला,” उमर अब्दुल्ला ने कहा।

उमर अब्दुल्ला ने कहा, “अगर कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में इसका उल्लेख किया है तो मैं इसका स्वागत करता हूँ… यह पहले से कहीं बेहतर है। यदि उन्होंने 2014 से पहले ऐसा किया होता तो हमने राज्य के कुछ हिस्सों से ASFPA को हटाने का काम कर दिया होता।”

अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए आज कांग्रेस ने वादा किया कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद अगर पार्टी सत्ता में आई तो वह AFSPA अधिनियम में संशोधन करेगी जो उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में भारतीय सशस्त्र बलों को विशेष अधिकार प्रदान करता है।

कांग्रेस ने घोषणा पत्र में कहा, “सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम, 1958, में सुरक्षा बलों और नागरिकों के मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाने और लागू गायब होने, यौन हिंसा और यातना के लिए प्रतिरक्षा को हटाने के लिए संशोधन (हम करेंगे)।”

कांग्रेस ने कहा कि जम्मू व कश्मीर में अशांत क्षेत्र अधिनियम और AFSPA अधिनियम की समीक्षा की जाएगी यदि चुनाव के बाद पार्टी सत्ता में आई तो। पार्टी ने कहा, “जम्मू और कश्मीर में सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम और अशांत क्षेत्र अधिनियम की समीक्षा की जाएगी। सुरक्षा की आवश्यकताओं और मानवाधिकारों की सुरक्षा के संतुलन के लिए क़ानूनों के प्रावधानों में उपयुक्त बदलाव किए जाएंगे।”

जम्मू और कश्मीर के अलावा AFSPA अधिनियम नागालैंड और मणिपुर और उत्तर-पूर्वी राज्यों के कुछ हिस्सों में लागू है।

AFSPA के तहत, सशस्त्र बलों को क़ानून का उल्लंघन करने वाले को गिरफ़्तार करने और बल का उपयोग करने की विशेष शक्तियाँ दी जाती हैं ताकि किसी आतंकवादी गतिविधि की भनक लगते ही जान-ओ-माल को भारी नुक़सान होने से पहले कार्रवाई की जा सके।

विगत वर्षों में कुछ दलों और एक्टिविस्ट्स ने उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सेना की ज़्यादतियों के आरोप लगाए हैं। मानवाधिकार समूह AFSPA अधिनियम को समाप्त करने की मांग करते रहे हैं। वे दावा करते हैं कि क़ानून नागरिकों को नागरिकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए “व्यापक अधिकार” देता है। विदेशी अनुदान से NGO चलाने वालों ने उन क्षेत्रों में अतिरिक्त-न्यायिक हत्याओं का भी आरोप लगाया है जहाँ AFSPA लागू है।

दूसरी तरफ़ सेना का कहना है कि क़ानून का दुरूपयोग असंभव है क्योंकि सभी अफ़सर और जवान अनुशासन से बंधे होते हैं और कोर्ट मार्शल का क़ानून असैनिक क़ानूनों से कहीं अधिक कठोर होता है जिसमें दोषी को तुरंत सज़ा हो जाती है। जबकि अगर क़ानून हटा दिया गया तो दोषी सैनिकों पर सिविलियन क़ानून के तहत कार्रवाई होगी जहाँ इंसाफ़ का रिकॉर्ड बहुत ही ख़राब है।

प्रसिद्ध मणिपुरी एक्टिविस्ट इरोम शर्मिला ने विवादास्पद अधिनियम के विरोध में 16 साल (2000-2016) का उपवास किया था।

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