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सुनहरे भविष्य की चिंता

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दसवीं कक्षा से उत्तीर्ण होने के बाद तय करना होता है कि आगे किस स्ट्रीम में पढ़ाई करनी है — ग्यारहवीं में क्या विषय लेने हैं कि मनचाही लाइन में जा सकें। कुछ बच्चे 12वीं के बाद यह निर्णय लेते हैं। हाल ही में ऐसा वक़्त गुज़रा है जहाँ विश्वविद्यालयों में दाख़िले के लिए कई छात्रों को काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ी।

अपरिपक्व मन भविष्य तय करने में अधिक सक्षम नहीं होता और उसे बेहतर निर्णय लेने के लिए अपने माता-पिता के सहयोग की ज़रूरत होती है। हमारे समाज का कुछ ऐसा रवैया है कि अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को डॉक्टर या इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं। माता-पिता की ऐसी मानसिकता को भी दोष देना पूरी तरह से सही नहीं है। देश में रोज़गार से सम्बन्धित हालात भी कुछ ऐसे हैं कि अधिकाँश माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे जल्दी से जल्दी एक सही दिशा में पढ़ाई शुरू कर दें ताकि उनका भविष्य सुरक्षित और खुशहाल हो सके।

लेकिन सच्चाई यह भी तो है कि सभी डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन पाते। ऐसे में बच्चे क्या करें? कहाँ जाएँ? कौन सी पढ़ाई करें जो उन्हें सुरक्षित भविष्य दिला सके?

सच्चाई तो यही है कि बच्चों को उन्हीं विषयों में पढ़ाई करनी चाहिए, जिनमें उनकी रुचि हो। क्योंकि कोई भी इंसान उसी दिशा में सबसे अधिक तरक्की करता है जिस क्षेत्र में काम करना उसे अच्छा लगता है। लेकिन परेशानी ये है कि किसी बच्चे की अभिरुचि जानी कैसे जाए? यों तो इसके लिए मनोवैज्ञानिक परीक्षण होते हैं। लेकिन हमारे यहाँ इसका अधिक चलन नहीं है। हमारे यहाँ तो अधिक महत्व ये दिया जाता है कि शर्मा जी का बेटा क्या कर रहा है, या चोपड़ा जी की बेटी ने क्या किया।

हम अच्छी तरह से जानते हैं कि हमारे पड़ोसियों या रिश्तेदारों के बच्चों की ज़िन्दगी से हमारे बच्चों की तय नहीं होने वाली। हम ये भी जानते हैं कि भले ही देखने-सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि हमारे बच्चे ने टॉप किया। लेकिन सच्चाई तो यही है कि सभी बच्चे टॉप नहीं करते। यह भी सच है कि हम सोचते हैं कि जो काम हम नहीं कर सके वो हमारे बच्चे करें, लेकिन ये भी तो सच है कि जिस काम में बच्चों की रुचि नहीं होगी उस काम में वे तरक्की कैसे करेंगे? हमारी ये चाहत जायज़ ही है कि हमारे बच्चे हमारे अधूरे सपने पूरे करें, हमसे कहीं अधिक तरक्की कर सकें। लेकिन क्या इस बात की गारंटी है कि जिस लाइन में हम उन्हें भेजने की कोशिश कर रहे हैं उसी में उनकी तरक्की होगी? या, वे महत्वाकांक्षा और कुंठा के बीच फँसकर घुटन महसूस कर सकते हैं?

इसलिए यही ज़रूरी भी है और इसी में समझदारी भी है कि बच्चों के साथ ही उनके माता-पिता भी उनकी असल रुचि पर ध्यान दें।

किस काम में बच्चे का अधिक दिल लगता है, कौन सा विषय पढ़ने में अधिक दिल लगता है, कौन सा विषय बिना प्रयास, या बहुत कम प्रयास के ही समझ में आ जाता है, किन विषयों में बच्चे को आसानी से अच्छे अंक आ जाते हैं, कौन सा व्यवसाय बच्चे को अधिक प्रभावित करता है… यदि माता-पिता थोड़ी बारीकी से इन सारी बातों पर ध्यान दें, और आवश्यकता हो तो इन बातों को समझने के लिए बच्चे के शिक्षकों से बात करें, और इनके आधार पर ग्यारहवीं में उसके लिए विषयों का चयन किया जाए, ये बच्चे बारहवीं के बोर्ड में भी अच्छे अंकों से पास हो सकते हैं और उनका भविष्य भी उज्जवल हो सकता है।

यह लालसा कि हमारे बच्चे का भविष्य बारहवीं के बाद ही सुरक्षित हो जाए अंध-दौड़ की विचित्र स्थिति पैदा करती है। लगभग सभी माता-पिता अपने बच्चों को विज्ञान विषयों के साथ ही पढ़ाना चाहते हैं। भले ही उनके बच्चे को उस विषय में रुचि हो या नहीं, सभी अपने बच्चों को या तो डॉक्टर बनाना चाहते हैं या फिर इंजीनियर।

हम कैसे भूल जाते हैं कि प्रति वर्ष केवल इंजीयरिंग की पढ़ाई में दाखिले के लिए करीब बारह-पंद्रह लाख बच्चे प्रवेश परीक्षा देते हैं। इनमें से मुश्किल से तीस-पैंतीस हज़ार बच्चों का दाखिला देश के स्तरीय इंजीयरिंग कॉलेज में होता है। उनमें से भी बहुतों को अच्छी स्ट्रीम नहीं मिलती। ऐसे में केवल गिने-चुने बच्चे ही इंजीनियर बनकर भी अच्छी नौकरी पाने में सक्षम होते हैं। कितने ही विद्यार्थी ऐसे होते हैं कि उनके इंजीनियरिंग कॉलेज की फ़ीस से कम वेतन पर उनकी नौकरी लगती है।

कई बार होता है, कि आगे चलकर इन्हीं बच्चों के वे साथी जिन्होंने अपनी रुचि के अनुसार कुछ और विषय लेकर पढ़ाई की, वे अधिक तरक्की कर रहे होते हैं। कई बार ऐसे बच्चे अधिक सफल होते हैं और अधिक संतुष्ट भी।

तो, क्यों न दसवीं पास करने के बाद ग्यारहवीं में अपने लिए विषय चुनने के लिए अपनी पसंद पर ध्यान दें?

और, क्यों न आगे चलकर ऐसा व्यवसाय करने की योजना बनाएँ, जो आपको रुचिकर लगे?

आखिर, ज़िन्दगी आपकी है, न ही शर्मा जी के बेटे की, और न ही आपके किसी पडोसी या रिश्तेदार की! है न?

इस आलेख में व्यक्त राय लेखिका की व्यक्तिगत राय है

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