हड़ताल से खुली बैंकिंग सेक्टर के दावों की पोल

ये ठीक है कि एटीएम और सीडीएम जैसी मशीनों की उपलब्धता के कारण नगरीय उपभोक्ताओं की दैनिक जरूरत पर इसका बहुत असर नहीं पड़ा

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सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कर्मचारियों की दो दिवसीय हड़ताल से शहरी क्षेत्र में रहने वाले आम लोगों की जीवन पर भले ही अधिक असर न पड़ा हो, लेकिन इस हड़ताल ने देश के बैंकिंग सेक्टर के बड़े-बड़े दावों की असलियत जरूर सामने ला दी है। मूल रूप से ये हड़ताल बैंककर्मियों के वेतनमान में वृद्धि की वजह से हुई थी। बैंकिंग कर्मचारियों का कहना है कि उनके वेतनमान में महज दो फीसदी की वृद्धि की गई है, जबकि इसके पहले यह वृद्धि 15 फीसदी की हुई थी। यहां ये बताना जरूरी है कि इस बढ़ोतरी का सालाना वेतनवृद्धि (इंक्रीमेंट) से कोई लेना देना नहीं है। बैंकिंग सेक्टर की ओर से कहा गया है कि वेतनमान में हुई इस मामूली वृद्धि की वजह सार्वजनिक बैंकों पर बढ़ता घाटे के बोझ है। मौजूदा स्थिति में बैंकों के लिए अपने कर्मचारियों के वेतनमान में इससे ज्यादा की बढ़ोतरी कर पाना संभव नहीं है। वहीं कर्मचारी इस मामूली बढ़ोतरी से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। यह एक सच्चाई है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अभी बहुत ही दयनीय स्थिति में पहुंच चुके हैं। दिसंबर 2017 में समाप्त हुई तीसरी तिमाही में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक का घाटा 19,000 करोड रुपए का था, जबकि मार्च 2018 की तिमाही में इसके बढ़कर 50,000 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाने का अनुमान है। निश्चित रूप से ये घाटा इसके पहले की तिमाही के दोगुने से कुछ ही कम है। हालांकि इस तिमाही का वास्तविक घाटा कितना होगा, ये बैंकों के अंकेक्षित परिणामों के सामने आने के बाद ही पता चल सकेगा। निश्चित रूप से बैंकों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। देश की बैंकिंग व्यवस्था अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है। लगातार बढ़ते एनपीए और बैड लोन की वजह से बैंकों का घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। जानकारों के मुताबिक सरकारी योजनाओं के तहत रियायती दर पर दिए जाने वाले कर्ज की वजह से भी बैंक के घाटे में लगातार बढ़ोतरी हुई है। कुछ समय पहले तक भारतीय बैंकिंग सिस्टम को दुनिया में सबसे मजबूत बैंकिंग सिस्टम माना जाता था। लेकिन, पिछले डेढ़ दशक में बैंकिंग व्यवस्था में लगातार बढ़े राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से एनपीए और बैड लोन में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। विलफुल डिफॉल्टर की संख्या भी काफी तेजी से बढ़ी है। इसके साथ ही स्वरोजगार के नाम पर दी जाने वाली सरकार की ओर से दी जाने वाली मुद्रा योजना जैसी जनकल्याणकारी योजनाएं भी सीधे-सीधे बैंकों के मुनाफे पर असर डालती हैं। इन योजनाओं में डूबने वाला पैसा सीधे-सीधे बैंक का नुकसान है, जबकि अगर उसे समय से किश्तों की प्राप्ति भी हो जाए, तब भी रियायती दर पर दिए गए कर्ज की वजह से उन्हें अपेक्षित मुनाफा नहीं हो पाता। स्वाभाविक रूप से बैंकिंग सिस्टम में आई इस आर्थिक कमजोरी का असर बैंक कर्मचारियों पर भी पड़ना ही था। बैंकिंग सेक्टर की ओर से भी यही कहा गया है कि इसी आर्थिक दबाव की वजह से वेतनमान में महज दो फीसदी की वृद्धि की गई है। इस बाबत यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंकिंग यूनियन का कहना है कि बैंकिंग सेक्टर को हुए नुकसान की बात पर ध्यान दिया जाना जरूरी है, लेकिन इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि महंगाई का स्तर दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। हर चीज महंगी हुई है। पिछले छह सालों में स्कूलों की फीस से लेकर खाने-पीने की सामग्री और दैनिक उपभोग की वस्तु समेत हर चीज महंगी हुई है। ऐसे में वेतनमान में दो फीसदी की वृद्धि निश्चित रूप से बैंक कर्मचारियों के साथ हुआ एक भद्दा मजाक है। बैंकों को नुकसान हो रहा है और बैंकों की आर्थिक सेहत खराब हुई है, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन, बैंकों की स्थिति ठीक हो यह देखना भी सरकार का ही दायित्व है। कहा जा सकता है कि सरकार एक सीमा से अधिक सहायता प्रदान नहीं कर सकती, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि अगर बैंक डूबे, तो उसके साथ ही जनता का पैसा भी डूबेगा। जनता की गाढ़ी कमाई का डूबना किसी भी सरकार की सेहत के लिए नुकसानदेह ही साबित होगा। औद्योगिक संगठन एसोचैम ने भी एक बयान जारी करके कहा है कि बैंकों की सेहत बनाए रखना और बैंकिंग सेवाओं को दुरुस्त किया जाना जरूरी है। इसके लिए सरकार को बैंकों के लिए राहत पैकेज पेश करना चाहिए, जिससे कि सरकारी बैंकों की स्थिति बेहतर हो सके। लेकिन इसके साथ ही इस बात पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से सरकारी योजनाओं का भार जबतक कम नहीं होगा, तबतक बैंकों की सेहत को पूरी तरह से नहीं सुधारा जा सकता है। जहां तक बात इस दो दिवसीय हड़ताल की है, तो इससे बैंकिंग व्यवस्था से होने वाले लगभग बीस हजार करोड़ रुपये के लेनदेन पर प्रत्यक्ष असर पड़ा है। ये ठीक है कि एटीएम और सीडीएम जैसी मशीनों की उपलब्धता के कारण नगरीय उपभोक्ताओं की दैनिक जरूरत पर इसका बहुत असर नहीं पड़ा। इसके साथ ही अधिकांश प्राइवेट सेक्टर के बैंकों के खुले रहने की वजह से भी शहरी उपभोक्ताओं को अधिक परेशानी नहीं हुई। लेकिन, इसमें कोई शक नहीं है कि इस हड़ताल की वजह से देश भर में चेक क्लियरिंग, नगदी की निकासी और जमा जैसे जरूरी कामकाज बाधित हुए। यह स्थिति भविष्य में न बने, इसलिए बैंकिंग सेक्टर की सेहत में सुधार पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। सरकार को सबसे पहले इस दिशा में ही ध्यान देना होगा, ताकि बैंकिंग व्यवस्था भी मजबूत बनी रहे और बैंकिंग कर्मचारियों में वेतन को लेकर कोई असंतोष न हो।

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