सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय पर उनके घरेलू दफ़्तर में काम कर चुकी एक औरत द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जाँच हेतु बनाई गई कमेटी के अध्यक्ष ‘सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय’ ने कहा है कि यह आरोप सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय को कमज़ोर करने के लिए किसी बहुत बड़ी साज़िश के तहत लगाए गए हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि बेहतर होगा मीडिया इस मामले में ज़्यादा बातें न फैलाए (क्यूँकि कचहरी में एक दिन उन्हें भी आना पड़ सकता है), और अपने ऊपर ‘नियंत्रण’ रखे (क्यूँकि क़ायदे में रहोगे तो फ़ायदे में रहोगे)।

बाक़ी और भी कुछ अतिमहत्वपूर्ण बातें कहीं ‘सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय’ ने, जैसे ―

  1. “आज बहुत ही संगीन मसला है इसलिए मैं शनिवार को भी कोर्ट में आया हूँ” (इसलिए 99999999999999 करोड़ पृथ्वियों के वज़न से भी ज़्यादा भारी इस अहसान के नीचे कुचल कर इस देश के हर आम नागरिक को आज रात ही कुत्ते की मौत मर जाना चाहिए)।

  2. “आज न्यायपालिका की स्वतंत्रता बेहद-बेहद-बेहद बड़े ख़तरे में आ गई है” (इसीलिए हत्या-बलात्कार-लूटमार-भ्रष्टाचार जैसे फ़ालतू वाहियात ग़ैर-ज़रूरी 5 करोड़ मुक़दमे यहाँ 70 सालों से लटके हुए हैं और ‘बालकनी में चिड़ियों को दाना क्यूँ न खिलाएँ’ टाइप ब्रह्मांडीय महत्व के मुक़दमों पर सुप्रीम कोर्ट में रोज़ाना अहम बहसें जारी हैं)।

  3. “पानी अब सर से ऊपर जाने लगा है” (क्यूँकि जनता ने अभी तक ब्रिटिश ग़ुलामी की विरासत के गूँ में सड़ चुकी न्याय-व्यवस्था की खाद बनाने के लिए फावड़ा नहीं उठाया है अपने हाथ में)।

  4. “मुझ पर आरोप लगाने वाली औरत का आपराधिक इतिहास रहा है” (जिसमें उसके ख़िलाफ़ पूरे जीवनकाल में सिर्फ़ साल 2011 में अपने पड़ोसियों से हुए मात्र एक झगड़े की दोतरफ़ा रिपोर्ट दर्ज करवाई गई थी, जिसमें हुए आपसी सुलहनामे के बाद मुक़दमे की समाप्ति की सरकारी कॉपी भी वह पहले ही सार्वजनिक कर चुकी है)।

  5. “यही सब चलता रहा तो अब ‘अच्छे लोग’ न्यायपालिका में नहीं आएँगे (क्यूँकि ‘कॉलेजियम’ वाले परिवारों के सारे होनहार नन्हें-मुन्ने उस कृतघ्न स्त्री द्वारा किए गए इस घोर अत्याचार तथा जघन्य पाप से आहत हो कर आज रात के अँधेरे में ही लँगोट धारण कर के सन्यासी बनने के लिए हिमालय पर्वत की ओर निकल जाएँगे), और

  6. “कल रात से अब तक 4 मीडिया हाउस मुझसे इन घटिया आरोपों को लेकर प्रतिक्रिया माँग चुके हैं” (इसलिए इन चारों के मालिकान अब अपनी खाल उतरवाने के लिए उस्तरा भी ख़ुद ही ख़रीद लें, अब मालूम चलेगा इन्हें क्या चीज़ होती है कोर्ट-कचहरी)।

बाक़ी ‘सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महोदय’ ने उस ‘विशेष रूप से बुलाई गई अदालत’ में जो नहीं कहा लेकिन हर इंसान को कान खोल कर ख़ुद अपनी ही आवाज़ में सुन लेना चाहिए, वह है ―

“इस मामले में
1. #MeToo के $^%&!%& का @!$#%&, और
2. #BelieveTheWoman गया @#$&!$ की $#^&&@ का $#@%#!& लेने.”

दोहरे मापदंड

पिछले साल बॉलीवुड में #MeToo आंदोलन की धूम रही. बहुत सी स्त्रियों ने लंबे समय के बाद सामने आकर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के कड़वे अनुभव साँझा किए. ज़ाहिर है, उनमें से कुछ एक काफ़ी हद तक झूठे या तिल का ताड़ बनाने वाले भी रहे होंगे, लेकिन फिर भी सबको #BelieveTheWoman की शरण में सही मानने के दबाव डाले गए. याद रखें इन सभी स्त्रियों के पास कोई फ़ोटो, कोई वीडियो, कोई ऑडियो रिकॉर्डिंग, कोई ख़तो-किताबत, कोई स्क्रीनशॉट मौजूद नहीं थे अपनी बात को साबित करने के लिए सबूत बतौर. फिर भी उन सबको संदेह का लाभ दिया गया.

आज एक साल बाद एक 35 साला शादीशुदा औरत जो कि क़ानून की छात्रा रही है और भारत के मुख्य न्यायाधीश के घरेलू दफ़्तर में बतौर कोर्ट असिस्टेंट कार्यरत रही एक अरसे तक, वह सामने आती है और मुख्य न्यायाधीश पर अपने साथ यौन उत्पीड़न तथा उसका विरोध किए जाने के बाद उसके पूरे परिवार से भयानक बदला लिए जाने के आरोप पूरी तफ़सील से, एक-एक ब्यौरा देते हुए लगाती है, देश के 22 वरिष्ठतम न्यायाधीशों को न्याय की गुहार लगाते हुए। ध्यान दें, वह उस यौन उत्पीड़न के लिए न्याय नहीं माँग रही है, वह उस घिनौने, पैशाचिक और हैवानियत से भरे योजनाबद्ध प्रतिशोध से बचाव की गुहार लगा रही है, जो कथित रूप से उस दिन उसको ज़बर्दस्ती अपनी बाँहों में भर रहे गोगोई साहब को परे धकेलने के बाद उसके परिवार के एक-एक सदस्य से लगातार लिया जा रहा है।

पहले ‘एक दिन की छुट्टी बिना बताए लेने’ जैसे आधार पर उसे सीधे बर्खास्त किया गया, फिर एक-एक कर के उसके पूरे परिवार की नौकरियां छीनी गईं, उन पर सिलसिलेवार तरीक़े से फ़र्ज़ी मुक़दमे लगाए गए (जिन सबके ब्यौरे उसने दिन-तारीख़ों के साथ मय सबूत अपने हलफ़नामे में दिए हैं), उन्हें नाजायज़ तरीक़े से कितनी ही बार पुलिस द्वारा उठा कर थाने में 24 घंटे से भी अधिक समय तक हथकड़ियां डाल कर बैठाया गया (जिसकी वीडियो रिकॉर्डिंग वह सबूत के तौर पर लगा चुकी है) ― जो कि सीधे सीधे मानवाधिकार विरोधी अपराध की श्रेणी में आता है।

उसके द्वारा दिए गए साक्ष्यों में मोबाइल कॉल रिकॉर्डिंग के अलावा तिलक मार्ग थाने के एसएचओ के साथ हुए वार्तालाप की गोपनीय कैमरे से की गई वीडियो रिकॉर्डिंग भी है जिसमें थानाध्यक्ष महोदय सहानुभूति से भरे स्वर में पूछ रहे हैं कि “मैडम किसी बड़े आदमी से ग़लती हो जाएगी तो क्या वो अपनी ग़लती मानेगा, आप ही बताओ?” उसके पास उन एसएमएस के स्क्रीनशॉट्स भी हैं जो उसके पति ने मुख्य न्यायाधीश के सचिव को भेजते हुए ‘किसी भी तरह उन्हें इस भयानक प्रताड़ना से मुक्ति दिलवाने’ की गिड़गिड़ाते हुए अर्जी लगाई थी, और कहा था कि उनका ‘परिवार तबाह हो चुका है, और सिर्फ़ CJI साहब ही उन पर दया कर सकते हैं’। उस कथित यौन उत्पीड़न वाले दिन के बाद से बर्खास्तगी तक बिना किसी बुनियाद के उसके लगातार किए गए तबादलों के भी साक्ष्य हैं जिन्हें देख कर मालूम होता है कि यह किसी का मानसिक उत्पीड़न करने के लिए ही लगाए जा रहे हैं।

याद रखें और अपने दिमाग़ में ड्रिल मशीन से छेद करके अच्छी तरह से याद रखें, कि यह 35 साला औरत क़ानून के ही क्षेत्र में काम करती रही है, और अच्छे से जानती है कि बिना मज़बूत साक्ष्यों के इतने ताक़तवर और ग़ैर-जवाबदेह पद पर बैठे व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई भी आरोप लगाना कितना ज़्यादा भारी पड़ सकता है। इसलिए भले ही वह अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न को कभी साक्ष्यों के आधार पर साबित न कर सके, लेकिन अपने परिवार के एक-एक सदस्य के योजनाबद्ध, राक्षसी और भयंकर उत्पीड़न के बारे में उसके द्वारा कही गई एक-एक बात प्रमाणों, साक्ष्यों और तर्कों के आधार पर इतनी मज़बूत है कि अगर इस देश में न्याय जैसी किसी चिड़िया का एक पर भी बाक़ी है और इस पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच कर के न्याय हुआ, तो इसमें बहुत सारे लोग बहुत क़ायदे से नपेंगे इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं।

लेकिन फिर भी, उस #MeToo और #BelieveTheWoman का ज़ोरशोर से अंधा समर्थन कर रहे बहुत से लोग आज उसके द्वारा दिए गए मज़बूत सबूतों और साक्ष्यों को नज़रअंदाज़ कर के उसके आरोपों को ‘संदेहास्पद’ बता रहे हैं. यह रवैया क्या है, हम कभी समझ पाएँगे?