भारत के प्रति अब चीन के व्यवहार में नरमी आई है। उसकी वजह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच मुलाकात ही है। देर से ही सही, चीन के दिमाग में यह बात धर कर गई है कि भारत से वैर रखने में उसका अपना कोई हित नहीं है। वह भारत को धमकाता तो है, लेकिन एक सीमा तक। बात बिगड़ने की हद तक कभी नहीं जाती। भारत की ओर से भी चीन को लेकर सतर्कता बरती जा रही है। अपनी सुरक्षा तैयारियों को बढ़ाया जा रहा है, लेकिन चीन को सीधे तौर पर निशाना नहीं बनाया जा रहा है। चीन को भी पता है कि भारत अनेक क्षेत्रों में बहुत ऊपर उठ चुका है। यहां तक कि उससे भी आगे जा चुका है। उसने अपनी युद्धक क्षमता विकसित कर ली है और कुल मिलाकर वह समृद्ध परमाणु शक्तिशाली देश बन चुका है। जिनपिंग और मोदी के बीच हुई वार्ता के बाद दोनों ही देश एक दूसरे के प्रति तल्ख नहीं हो रहे हैं। बराबरी वाले देशों में शत्रुता नहीं होती, वहां मित्रता ही अच्छी लगती है।
नरेंद्र मोदी ने अपने चार साल के कार्यकाल में बराबरी वाला माहौल तो बना ही दिया है। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन से मोदी की वार्ता के बाद चीन पूरी तरह ठंडा पड़ गया है। पाकिस्तान के मामलों में भी वह खुलकर दिलचस्पी नहीं ले रहा है, जैसा कि वह पहले किया करता था। अपनी इंडोनेशिया और सिंगापुर यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दी गई नसीहत कि भारत और चीन को मिलकर शांति के क्षेत्र में काम करना चाहिए, बेहद मायने रखती है, वहीं बालासोर में अग्नि -5 मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद चीन की नपी-तुली टिप्पणी कि भारत मित्र ही नहीं, साझीदार देश है, भारत में नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की आलोचना करने वालों को करारा जवाब है। संभव है कि भारत की इस वैज्ञानिक सामरिक उपलब्धि से चीन खुश न हो क्योंकि अग्नि-5 की जद में पाकिस्तान ही नहीं, पूरा चीन भी आ रहा है और चीन अपने वजूद पर संकट कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। उसकी जगह और कोई दूसरा भी होगा तो उसका चिंतित होना स्वाभाविक ही है।
चीन ने उम्मीद जताई है कि भारत द्वारा अग्नि-5 का परीक्षण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के नियमों के मुताबिक है और इससे दक्षिण एशिया का सामरिक संतुलन नहीं गडबड़ाएगा तो यह उसका भारत के प्रति विश्वास ही है। वर्ना कुछ ताकतें तो हमेशा इसी फिराक में रहती हैं कि भारत और चीन के बीच परस्पर सहकार, शांति और सहयोग का वातावरण बने ही नहीं। दुर्भाग्यवश उनके इस खेल में भारत का अति उत्साही मीडिया भी शामिल हो जाता है। चीन इस बात से बखूबी वाकिफ है कि दक्षिण एशिया में सामरिक संतुलन का अर्थ है भारत और पाकिस्तान के बीच शांति। पाकिस्तान हमेशा भारतीय भूभाग पर आतंकी हमले कर भारत की अस्मिता को ललकारता रहता है और उसका खून खौलाता रहा है। पाकिस्तान का साथ देने की कीमत चीन को चुकानी पड़ती है। चीन को पता है कि उसके पूर्व के कुछ नेताओं ने भारत की पीठ में छुरा भोंका है। जब भारत और चीन पंचशील के सिद्धांतों पर आगे बढ़ रहे थे। पूरी दुनिया में भारत-चीन भाई- भाई वाला नारा गूंज रहा था तब चीन ने अकस्मात भारत की पीठ में छुरा भोंका था। उस पर युद्ध थोपा था और उसके बहुत बड़े भूक्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। जिस कांग्रेस के शासनकाल में भारत का बहुत बड़ा भूभाग चीन ने कब्जा लिया था, उसने कभी भी इस भूमि को चीन से वापस लेने की कोशिश नहीं की।
अपने प्रधानमंत्रित्व काल में नरेंद्र मोदी ने अनेक बार चीन की यात्रा की और जिनपिंग की आंखों में आंखें डालकर बातचीत की। यही नहीं वैश्विक स्तर पर भी चीन को चौतरफा घेरने का प्रयास किया। जलडमरूमध्य के दोनों ओर इंडोनेशिया और सिंगापुर की उनकी हालिया यात्रा को इसी रूप में देखना मुनासिब होगा। हिन्द प्रशांत क्षेत्र में मलक्का जलडमरूमध्य के दोनों ओर बसे इंडोनेशिया एवं सिंगापुर रणनीतिक रूप से बेहद अहम क्षेत्र हैं। उनके साथ अहम रक्षा समझौते कर उन्होंने निर्विवाद रूप से चीन को यह संदेश देने का काम किया है कि भारत सर्वधर्म समभाव में, वसुधैव कुटुंबकम की भावना में यकीन नहीं करता है। वह किसी भी देश से अकारण शत्रुता नहीं रखता लेकिन खुद से शत्रुता रखने वालों को मुंहतोड़ जवाब देना भी उसे आता है। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय सैनिकों का न केवल मनोबल बढ़ा रहे हैं, बल्कि उन्हें अत्याधुनिक असलहों से लैस भी कर रहे हैं। सैनिकों से मिलने का एक भी मौका वे अपने हाथ से जाने नहीं देते। भारतीय नौसेना के पोत आईएनएस सतपुड़ा पर नौसैनिकों से उनकी भेंट सेना के उत्साह में वृद्धि करेगी, इसमें कहीं कोई शक नहीं है।
सिंगापुर के नौसेनिकों से भी उसी उदारता के साथ मिले जैसी उदारता से वे भारतीय नौसैनिकों से मिले। एक परिपक्व प्रधानमंत्री ही इस तरह की दूरदृष्टि का परिचय दे सकता है। नरेंद्र मोदी 29 मई को इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता पहुंचे थे और 31 मई को मलेशिया में संक्षिप्त प्रवास कर वहां के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद से मुलाकात की थी। इंडोनेशिया में 30 मई को मोदी एवं विडोडो की द्विपक्षीय शिखर बैठक में भारत और इंडोनेशिया ने अपने रक्षा सहयोग समझौते का नवीनीकरण तो हुआ ही, अंतरिक्ष, रेलवे, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के 15 करारों पर हस्ताक्षर भी हुए थे। भारत ने मलक्का जलडमरूमध्य के निकट सबांग द्वीप पर विशेष आर्थिक प्रक्षेत्र में निवेश के करार पर भी हस्ताक्षर किए हैं। प्रधानमंत्री के भारत लौटते ही भारत ने इंटर बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 का सफल परीक्षण किया। भारत ने छठी बार मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है।
अग्नि-5 मिसाइलों को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ने विकसित किया है और अग्नि सीरीज की मिसाइलों को चीन और पाकिस्तान को ध्यान में रखकर जमीन पर मार करने लिए तैयार किया गया है। इसके साथ ही भारत 5,000 से 5,5000 किलोमीटर की दूरी तक वार करने वाले परमाणु प्रक्षेपास्त्रों से लैस देशों के समूह में शामिल हो गया है। अभी यह क्षमता अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन के ही पास थी। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन द्वारा स्वदेश निर्मित परमाणु क्षमता वाला यह प्रक्षेपास्त्र सतह से सतह तक 5,000 से 8,000 किलोमीटर तक निशाना साध सकती है। यह चीन के लगभग हर हिस्से में पहुंच सकती है। इससे पूर्व दो फरवरी 2018 को भारत ने पारादीप के पास एक नौसैनिक पोत से परमाणु क्षमता युक्त धनुष परमाणु प्रक्षेपास्त्र का सफल परीक्षण किया था। इसकी मारक क्षमता 350 किलोमीटर थी। भारत जिस तरह परमाणु शस्त्रों और अत्याधुनिक शस्त्रों के मामले में खुद को मजबूत बना रहा है, उसकी सराहना की जानी चाहिए। नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और कूटनीति को समझना बहुत आसान नहीं है, देश के विकास के मोर्चे पर भी मोदी सरकार ग्रास रूट पर काम कर रही है, इसका असर देर-सबेर दिखेगा जरूर।

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