मोदी की इंडोनेशिया यात्रा से चीन चिंतित

अब यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निर्भर करता है कि वह अपने पहले दिए वचन की लाज रखेंगे या दूसरे मित्र की इच्छा पूरी करेंगे

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा चीन के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार इंडोनेशिया पहुंचे हैं और जिस तरह उन्हें इंडोनेशियाई हुक्मरान और अवाम के स्तर पर हाथों हाथ लिया गया है, उससे भारत की हर गतिविधि में आशंका के बीज तलाश रहे देशों का चिंतित होना तो स्वाभाविक है ही। भारत मालदीव का भी मित्र है और इंडोनेशिया का भी। यह अलग बात है कि इंडोनेशिया और मालदीव में संयुक्त राष्ट्र संघ की अस्थायी सदस्यता पाने को लेकर वैचारिक मतभेद है। इस मुद्दे पर दोनों ही का नजरिया प्रतिस्पर्द्धा का है। ऐसे में भारत के लिए इंडोनेशिया का खुलकर समर्थन कर पाना मुश्किल तो है ही। ऐसे में नरेंद्र मोदी को इंडोनेशिया में बहुत ही सूझ-बूझ का परिचय देना होगा। उनकी जरा सी असावधानी मालदीव और इंडोनेशिया में से किसी एक को उनसे बिदका सकती है और इसकी कीमत भारत को चुकानी पड़ सकती है।
इंडोनेशिया में भारतीय प्रधानमंत्री के स्वागत का तरीका भी अन्य देशों से अलहदा रहा। राष्ट्रपति भवन में नन्हें बच्चों ने भी हाथ में तिरंगा लेकर उनका राजकीय सम्मान किया। राष्ट्रपति जोको विडोडो से मुलाकात और प्रतिनिधिस्तरीय बैठक के बाद प्रधानमंत्री ने पतंग उड़ाकर पतंग महोत्सव का शुभारंभ भी किया। उनकी यह पतंग डिप्लोमेसी दोनों देशों के रिश्तों को मजबूती देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा इसलिए भी बेहद खास है, क्योंकि आबादी के लिहाज से इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है और सांस्कृतिक लिहाज से वह भारत के सबसे करीब है। यहां की संस्कृति पर हिंदू संस्कृति का काफी प्रभाव है। इंडोनेशिया अपनी साझी संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में पहचाना जाता है। जकार्ता में अर्जुन की मूर्ति भी लगी है। इंडोनेशिया के बाली द्वीप में हिंदू बहुसंख्यक हैं। भारत और इंडोनेशिया के रिश्ते आज के नहीं हैं।
प्रधानमंत्री बनने के बाद तो मोदी वहां पहली बार पहुंचे हैं, लेकिन हजारों साल पहले से ही इंडोनेशिया भारत का मित्र रहा है। सांस्कृतिक समानता और अवधारणा के धरातल पर भी दोनों देशों के बीच एकरूपता है, इसे नकारा नहीं जा सकता। इंडोनेशिया की भाषा ‘ बहासा इंदोनेसिया’ पर भी संस्कृत का काफी प्रभाव है। वहां की राष्ट्रपति मेघावती सुकर्णोपुत्री ही इस बात का प्रमाण है। रामायण और महाभारत को तो वे अपना ही ग्रंथ बताते हैं। भारत में राम का नाम लेना सांप्रदायिक माना जा सकता है, लेकिन इंडोनेशिया के मुसलमान रामायण आधारित रामलीला अरसे से करते आ रहे हैं। जावा द्वीप पर प्रांबानन में हिंदू मंदिर और बोरोबोदूर में संसार के सबसे बड़े बौद्ध स्तूप की उपस्थिति भारत से उसकी प्राचीन आत्मीयता का परिचायक ही है। इंडोनेशिया द्वारा भारत को सामरिक लिहाज से महत्वपूर्ण सबांग द्वीप तक आर्थिक और सैन्य पहुंच देना चीन के दिल में हाहाकार पैदा कर रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की वार्ता हो चुकी है, इसके बाद भी चीन की इस तरह की सोच उसकी संकीर्ण मानसिकता का ही इजहार करती है।
भारत सबांग बंदरगाह और इकोनाॅमिक जोन में निवेश कर रहा है। चीन इस निवेश का स्वागत तो कर रहा है लेकिन धमका भी रहा है कि अगर इंडोनशिया को युद्ध के लिहाज से तैयार किया गया तो हिंद महासागर में चीन भी इस तरह के प्रयोग कर सकता है। हालांकि प्रधानमंत्री को मलेशिया और सिंगापुर भी जाना है, लेकिन चीन के चिंता के केंद्र में उनका इंडोनेशियाई दौरा ही है। चीन भारत और इंडोनेशिया सबांग द्वीप को लेकर सामरिक साझेदारी पर निगाह रखे हुए हैं, ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगामी दौरे को तरजीह देना भी जरूरी हो जाता है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र के मुताबिक भारत सबांग के सामरिक द्वीप तक अगर सैन्य पहुंच चाह रहा है तो वह चीन के साथ सामरिक प्रतिस्पर्द्धा में आ जाएगा और अपने ही हाथ जलाएगा। ये बात चीन की नीतय और नीति में खोट ही कही जा सकती है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह सब अपनी एक्ट ईस्ट पाॅलिसी के तहत कर रहे हैं। दोनों देशों ने स्वतंत्र, खुला, पारदर्शी, शांतिपूर्ण, समृद्ध और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र की वकालत करके भी चीन की चिंता का ग्राफ बढ़ा दिया है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के वर्चस्व को बढ़ने से रोकने के भारतीय प्रयासों के क्रम में इस दोस्ती को बेहद अहम माना जा रहा है। वैसे आसियान देश भी यही मानते हैं कि भारत को इस इलाके में बड़ी भूमिका अदा करे निभाना चाहिए, जिससे कि चीन को जवाब दिया जा सके। इस यात्रा में भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापार दोगुना करने पर भी सहमति बनी है। आर्थिक हितों की रक्षा के लिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का जो संकल्प लिया गया है, वह भी चीन को शायद ही रास आए।
हालांकि भारत भी चीन के खिलाफ नहीं जाना चाहेगा लेकिन अपनी सीमाओं की सुरक्षा के प्रति उसे गाफिल तो नहीं ही रहना चाहिए। चीन नरेंद्र मोदी की हर गतिविधि पर इसलिए भी नजर रखता है, क्योंकि उसे पता है कि मोदी कूटनीतिक ही नहीं, बुद्धिचातुर्य के हिसाब से भी उस पर भारी पड़ते हैं। इस दौरे से भारत का ठोस समर्थन पाने की उम्मीद इंडोनेशिया को हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र में अस्थायी सदस्यता के लिए इंडोनेशिया के राष्ट्रपति और उनके मंत्रियों का अभियान आरंभ भी हो चुका है, लेकिन भारत खुलकर संयुक्त राष्ट्र में अस्थायी सदस्यता के लिए इंडोनेशिया का समर्थन इसलिए भी नहीं कर सकता, क्योंकि वह मालदीव को अस्थायी सदस्यता के लिए समर्थन का वादा कर चुका है। अब यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निर्भर करता है कि वह अपने पहले दिए वचन की लाज रखेंगे या दूसरे मित्र की इच्छा पूरी करेंगे।
SOURCEहिन्दुस्थान समाचार/सियाराम पांडेय ‘शांत’
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