जागरूकता से ही रूक पायेगें बाल विवाह

हैदराबाद में बाल विवाह से बचाई गई 16 वर्षीय लडकी बी अनुषा आज क्रिकेट के मैदान में धूम मचा रही है

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राजस्थान में जोधपुर की एक अदालत ने अलवर के थानागाजी की रहनेवाली पिंकी कंवर के बाल विवाह को निरस्त कर दिया है। पिंकी की शादी 10 साल की उम्र में 24 मार्च 2009 को दौसा निवासी हिम्मत सिंह राजपूत के साथ हो गई थी। पिंकी अभी 19 साल की है और वह जोधपुर में अपनी पढ़ाई कर रही है। पिंकी कंवर ने अपने बाल विवाह को निरस्त करने के लिए कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। पिंकी ने जोधपुर के सारथी ट्रस्ट की पुनर्वास मनोवैज्ञानिक डॉ कृति भारती के माध्यम से कोर्ट में यह मुकदमा दायर किया था। इस मामले में सुनवाई के बाद पिंकी के बाल विवाह को निरस्त कर दिया।

हैदराबाद में बाल विवाह से बचाई गई 16 वर्षीय लडकी बी अनुषा आज क्रिकेट के मैदान में धूम मचा रही है। स्थानीय गैर सरकारी संस्था की मदद से रचकोंडा पुलिस ने उन्हें शहर के सरूर नगर इलाके से बचाया। पिछले साल अप्रैल में अनुषा के घरवाले उसकी शादी करने जा रहे थे, लेकिन एक एनजीओ के पहल पर उसे बचाया गया। बाद में दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली इस छात्रा ने खेल में रूचि दिखाई और हाल ही में मध्यप्रदेश में आयोजित इंटर स्कूल अंडर-19 क्रिकेट मैच में उन्होंने अपने खेल से सबका दिल जीत लिया। इसी तरह बिहार में बाल विवाह के खिलाफ शुरु किए गए अभियान का भी असर दिखने लगा है। साफ है कि बाल विवाह के खिलाफ समाज में तेजी से जागृति आ रही है।

बाल विवाह आज भी दुनिया के कई कोनों में फल-फूल रहा है। भारत में यह कुप्रथा लम्बे समय से चली आ रही है। जिसके तहत छोटे बच्चों का विवाह कर दिया जाता है। जो बच्चे अभी खुद को भी अच्छे से नहीं समझते, जिन्हें जिन्दगी की कड़वी सच्चाइयों का कोई ज्ञान नहीं, जिनकी उम्र अभी पढने लिखने की होती है, उन्हें बाल विवाह के बंधन में बांधकर उनका जीवन बर्बाद कर दिया जाता है।

झारखंड में बाल विवाह जैसी समस्या को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आये हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक झारखंड में 38 प्रतिशत लड़कियों का बाल विवाह होता है। बाल विवाह को लेकर सेव द चिल्ड्रेन एंड ऑक्सफेम ने भी रिपोर्ट जारी की है। हालांकि बाल विवाह की दर में कमी आयी है लेकिन इसकी गति बहुत धीमी है। झारखंड के बाद बिहार और उड़ीसा की स्थिति भी भयावह है। झारखंड और बिहार में लड़कियों की शादी की औसत आयु 15 साल है। ओड़िशा में यह औसत आयु 17 साल की है। बाल विवाह जिंदगी को नरक बना देता है। कम उम्र में शादी का खमियाजा न सिर्फ वर-वधू को भुगतना पड़ता है, बल्कि समाज पर भी इसका कुप्रभाव पड़ता है। कम उम्र में गर्भधारण करने की वजह से अस्वस्थ एवं अविकसित शिशु का जन्म होता है।

भारत में बाल विवाह पर तेजी से लग रहे अंकुश की वजह से दक्षिण एशिया में बाल विवाह की दर में भारी गिरावट आई है। पिछले दस साल में दक्षिण एशिया में बाल विवाह की दर 50% से घटकर 30% पर आ गई है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 10 साल में भारत में बाल विवाह की दर 47% से घटकर 27% रह गई है। साल 2005-06 में भारत में बाल विवाह की दर 47% थी। साल 2015-16 में यह आंकड़ा घट कर 27% रह गया है। वैश्विक स्तर पर हर पांच में से एक यानी 21% लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में हो जाती है। दस साल पहले यह आंकड़ा करीब 25% का था। खासकर दक्षिण एशिया में इसमें आई तेज गिरावट की वजह से इन आंकड़ों में सुधार हुआ है। हालांकि यूनिसेफ की रिपोर्ट में यह चिंता भी जताई गई है कि आदिवासी समुदायों और अनुसूचित जाति के कुछ वर्गों में अब भी बाल विवाह की दर बहुत ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान में बाल विवाह की दर सबसे ज्यादा 40% तक है, जबकि तमिलनाडु और केरल में यह 20% से कम है।

तमाम प्रयासों के बाबजूद हमारे देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अन्त नही हो पा रहा है। जिस देश में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद तक पहुंच चुकी हैं, वहां बाल विवाह जैसी कुप्रथा के चलते बालिकाएं अपने अधिकारों से वंचित कर दी जाती हैं। बाल विवाह न केवल बालिकाओं की सेहत के लिहाज से बल्कि उनके व्यक्तिगत विकास के लिहाज से भी खतरनाक है। भारत में बेटी-बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसा अभियान शुरू होने के बावजूद हर सात सेकेंड में एक नाबालिग बेटी की अपने से दोगुने उम्र के व्यक्ति के साथ जबर्दस्ती शादी करा दी जाती है।

अगर इस कुप्रथा को जड़ से खत्म करना है तो इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा तथा बालिकाओं के पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करना होगा। समाज में शिक्षा को बढ़ावा देना होगा। अभिभावकों को बाल विवाह के दुष्परिणामों के प्रति जागरुक करना होगा। सरकार को भी बाल विवाह की रोकथाम के लिये बने कानून का जोरदार ढंग से प्रचार-प्रसार तथा कानून का कड़ाई से पालन कराना होगा। बाल विवाह प्रथा के खिलाफ समाज में जोरदार अभियान चलाना होगा। साथ ही साथ सरकार को विभिन्न रोजगार के कार्यक्रम भी चलाना होगा ताकि गरीब परिवार गरीबी की जकड़ से मुक्त हो सके और इन परिवारों की बच्चियां बाल विवाह का निशाना न बन पाएं।

विश्व बैंक और एक अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वूमन की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत यदि बाल विवाह और कम उम्र में प्रसव पर रोक लगा दे तो अगले सात वर्षों में स्वास्थ्य देखभाल और संबंधित लागतों में 33,500 करोड़ रुपयों की बचत कर सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर वर्ष 2030 तक 18 देशों में 1 लाख 14 हजार करोड़ रुपए की बचत हो सकती है। बाल विवाह और कम उम्र प्रसव पर रोक लगने से जनसंख्या वृद्धि में कमी होगी, जो सरकारी बजट पर दबाव कम करेगी।

हिन्दुस्थान समाचार/रमेश सर्राफ धमोरा