Sunday 25 October 2020
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Charlie Hebdo: या तो अपमान करें और सहें भी, या गूंगे हो जाएँ

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शार्ली एब्दो (Charlie Hebdo) के कार्टून और फ़्रांसिसी पत्रिका के स्टाफ़ पर हुए आतंकी हमले पर हुई इस बहस में सिर्फ़ न्यूज़ के संपादक सुरजीत दासगुप्ता ने फ़्रांस के समाज की प्रकृति और प्रवृत्ति को समझाते हुए यह तर्क दिया कि नास्तिकों को भी अभिव्यक्ति की आज़ादी होनी चाहिए, वे भी आस्तिकों के कृत्य से अपमानित हो सकते हैं।

इसी सन्दर्भ में उन्होंने भारतीय संविधान की आलोचना करते हुए कहा कि देश के तंत्र में फ़्रांसिसी व्यवस्था के अनुसरण करने की हिम्मत नहीं है।

दासगुप्ता ने इससे पहले सत्यान्वेषी भारत चैनल का आमंत्रण स्वीकार करते हुए फ़ेसबुक पर लिखा था, ‘अपमान की कोई परिभाषा नहीं, कोई सीमा नहीं। नास्तिक भी कह सकते हैं कि आस्तिकों को पूजा-पाठ करता देख, नमाज़ पढ़ता देख, प्रेयर करता देख वह अपमानित महसूस करते हैं। एक ही धर्म के मानने वाले किसी एक विचार पर दो अलग-अलग मत रख सकते हैं, जिनमें से एक मत दूसरे मतावलंबी को अपमानित कर सकता है। जैसे बरेलवी दरगाह पे पीर से दुआ मांगते हैं जो देवबंदी को स्वीकार्य नहीं। फिर क्या करें? चीन की तरह पूरी दुनिया को क्षिन्जीयांग बना दें जहाँ आप दाढ़ी नहीं रख सकते, बच्चे का नाम मुहम्मद या अहमद नहीं रख सकते?’

सिर्फ न्यूज़ संपादक के अनुसार ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या तो सम्पूर्ण हो सकती है या इस प्रकार की स्वतंत्रता 1% भी नहीं हो सकती। इन दोनों के बीच कोई तीसरा विकल्प नहीं हो सकता। क्या पता कौन किस बात पर अपमानित हो जाए! इसलिए या तो जो मन करे, वही बोल दें या बिल्कुल न बोलें। अपमानित करें और अपमान सहें या फिर गूंगों की दुनिया में रहें जहाँ कोई कुछ बोलता ही न हो।’

Charlie Hebdo पर आतंकी हमला

7 जनवरी 2015 को लगभग 11:30 बजे CET स्थानीय समय पर, दो भाइ सईद और शेरिफ़ कुआशी ने पेरिस के फ्रांसीसी व्यंग्यात्मक साप्ताहिक समाचार पत्र Charlie Hebdo के कार्यालय पर हमला किया। राइफलों और अन्य हथियारों से उन्होंने 12 लोगों को मार डाला और 11 अन्य को घायल कर दिया।

बंदूकधारियों ने ख़ुद को अरब प्रायद्वीप पर आतंकवादी समूह अल-क़ायदा से संबंधित बताया, अल क़ायदा ने भी हमले की ज़िम्मेदारी ली।

आगे 7 से 9 जनवरी 2015 को ओले-द-फ्रांस क्षेत्र में कई हमले हुए, जिनमें हाइपरकैचर कोशर सुपरमार्केट की घेराबंदी की गई, जहां एक आतंकवादी ने 19 लोगों को बंधक बना कर उनमें से चार यहूदियों की हत्या कर दी।

फ्रांस ने आतंकी हमले होने की चेतावनी जारी की और इल-द-फ़्रांस और पिकार्दी में सैनिकों को तैनात किया। तलाशी दस्ते द्वारा संदिग्धों की खोज के दौरान आतंकवादियों ने पुलिस पर गोली चलाई।

सईद और शेरिफ़ कुआशी भाइयों ने 9 जनवरी को दामार्तैं-ओं-गोअल की एक साइनेज कंपनी के दफ़्तर में बंधकों बंदी बनाकर रखा और अपने साथी आतंकियों से कहा कि कोई बिल्डिंग से निकलने की कोशिश करे तो उसे गोली मार दें।

11 जनवरी को 40 से अधिक विश्व नेताओं सहित लगभग 20 लाख लोग पेरिस में राष्ट्रीय एकता की रैली के लिए मिले और पूरे फ्रांस में 3.7 मिलियन लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। ‘झ सुई शार्ली (Je suis Charlie अर्थात ‘मैं शार्ली हूँ’)’ के नारे से यूरोपीय समाज और सोशल मीडिया गूँज उठा।

इस घटना और विवाद के कारण Charlie Hebdo के अगले अंक की औसतन 60 हज़ार कॉपी की जगह 79.5 लाख कॉपियों की बिक्री हुई।

इस हफ़्ते एक के बाद एक गवाहों ने एक अदालत में बताया कि कैसे जनवरी 2015 की वो सर्द सुबह उनके जीवन में इस्लामी आतंक का सन्देश ले आई और अपने परिजनों और Charlie Hebdo के सहकर्मियों को खोने का दर्द वे आज भी नहीं भूल पाए हैं। सत्यान्वेषी भारत चैनल ने पेरिस की अदालत में हुई इस सप्ताह की सुनवाई के कारण इस विषय को चर्चा के लिए चुना।