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सूडान के मदरसों में ज़ंजीरों में बांधकर बच्चों की चाबुक़ से पिटाई, छात्रों का यौन शोषण

मुसलमानों के उत्पात से तंग आकर 2011 में अफ़्रीका के सबसे बड़े देश सूडान के ईसाई अलग हो गए; शेष बचे मुस्लिम-बहुल उत्तर सूडान का आज यह हाल है

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ख़ारतूम के उपनगरीय इलाके में एक अप्रैल की शाम के अनुभव को एक पत्रकार ने बीबीसी और द गार्डियन पर साझा किया है। उस भयावह शाम की घटनाओं का उल्लेख करते हुए पत्रकार फ़तेह अल रहमान अल हमदानी बताते हैं कि महीनों के अंडरकवर काम के बाद उन्होंने तय किया कि सूडान के ख़लवा (या ख़ल्वा) यानि मदरसों को जानने के लिए शाम की नमाज़ (या सलाह) का समय उचित रहता है। वे तब किसी ख़ल्वा में प्रवेश करते थे जब शेख़ (शिक्षक) और 50-सफ़ेदपोश लड़के नमाज़ अदा करने में व्यस्त होते थे। जब ये लड़के घुटने टेकते थे तो उनकी टांगों से लिपटी ज़ंजीरों की आवाज़ आती थी। पत्रकार फ़तेह उनके पीछे बैठ जाते थे और चुपके से अपने कैमरे से गतिविधियों को शूट कर लेते थे। आगे की ह्रदयविदारक कहानी उन्हीं की ज़ुबानी सुनिए।

“मैंने इनमें से कुछ स्कूलों में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों के सामने आने के बाद जांच शुरू की। सूडान के मदरसों में बच्चों को ज़ंजीरों में बांधकर पीटा जाता है और उनका यौन शोषण किया जाता है। सदियों से सूडान में ख़लवाओं का अस्तित्व है। देश भर में उन्होंने 30,000 से अधिक बच्चो को इन इस्लामी स्कूलों में भर्ती कर रखा है जहाँ बच्चों को केवल क़ुरान कंठस्थ याद नहीं करवाया जाता बल्कि किसी शेख़ द्वारा चलाए जा रहे हर मदरसे में आमतौर पर भोजन, पेय और आश्रय भी दिया जाता है, जिसके कारण ग़रीब परिवार अपने बच्चों को यहाँ भेज देते हैं। पब्लिक स्कूलों की फ़ीस देना उनके बस की बात नहीं है और पब्लिक स्कूलों में खाना नहीं मिलता, रहने की जगह नहीं मिलती।”

“मैंने पाँच साल सूडान में बतौर पत्रकार काम किया लेकिन यह पहली बार था कि एक असाइनमेंट वास्तव में व्यक्तिगत लगा। चूँकि इस्लामी शिक्षा सभी के लिए उपलब्ध है, मैंने भी एक ख़ल्वे में बच्चों की तरह दाख़िला ले लिया जहाँ मैं हर दिन बिना पिटे गुज़ारने की कोशिश करता था।”

“सन 2018 में मैंने बीबीसी न्यूज़ अरबी के लिए खोजी पत्रकारिता शुरू की जो दो साल का काम था। स्टोरी के सिलसिले में आवश्यक जाँच-पड़ताल के लिए मुझे सूडान के 23 ख़ल्वाओं में जाना पड़ा। बीबीसी से उपयुक्त अंडरकवर उपकरण आने से पहले मैं चुपके से फ़िल्म बनाने के लिए एक नोटबुक के अंदर अपना कैमराफ़ोन चिपका के रखता था।”

“हालांकि मैं स्वयं किसी ख़ल्वे का छात्र रह चुका था, मुझे पत्रकारिता करते समय जो तथ्य मिले, उनसे मैं चौंक गया। मैंने 5 वर्ष की आयु के बच्चों को भी जानवरों की तरह ज़ंजीरों में बंधे पिटते हुए देखा। टखनों के आसपास गहरे, कच्चे घाव लिए एक लड़के ने मुझसे कहा, ‘ये हम छह या सात बच्चों को एक साथ एक ज़ंजीर में बांध देते हैं और शेख़ हमें घेरे में लेकर चलता है। हम में से कोई अगर गिर गया, और साथ बंधे और बच्चों को लेकर गिरा तो ये तब तक हमें मारते रहते हैं जब तक हम सभी पैरों पर खड़े न हो जाए… वे कहते हैं कि यह हमारे लिए अच्छा है।'”

“मेरे सबसे बुरे अनुभवों में से एक 2018 में अहमद हनफ़ी में दरफ़र के एक ख़ल्वे में हुआ। लोहे की छत वाले एक कक्षागृह के अंदर एक छोटे से लड़के उल्टा लटकाकर उसपर 30 कोड़े बरसाए गए। मैं बाहर खड़ा था और कमरे के अंदर से सिर्फ़ कोड़ों की आवाज़ आ रही थी या फिर लड़के की कराह की। मैं शेख़ से चाबुक़ छीन लेना चाहता था और शेख़ ही को पीटना चाहता था, लेकिन मुझे पता था कि मैं ऐसा नहीं कर सकता था। जब मैंने बाद में स्कूल से संपर्क किया तो शेख़ ने पुष्टि की कि वे बच्चों को पीटते हैं। उन्होंने इस घटना से कभी इनकार नहीं किया।”

“एक और परेशान करने वाला मामला दो 14 साल के लड़के मोहम्मद नादर और इस्माइल का था। जब मैंने उन्हें अस्पताल में देखा तो वे पेट के बल लेटे हुए थे, बेहोश। उनकी पीठ से मांस उधेड़ दिया गया था। उन्हें इतनी बुरी तरह पीटा गया था कि दोनों मरणासन्न थे।”

“मोहम्मद नादर के पिता नादर ने मुझे बताया कि ‘उन्होंने बच्चों को भोजन या पानी के बिना पाँच दिनों तक एक कमरे में रखा और बच्चों के शरीर पर अलकतरा मल दिया। मोहम्मद नादर को इतनी बुरी तरह से पीटा गया है कि आप उसकी रीढ़ भी देख सकते हैं’।”

“मैंने उसी ख़लवा के अंदर के हिस्से फ़िल्माए थे जहाँ की घटना नादर बता रहे थे। इस स्कूल का नाम था अल ख़ुलफ़ा अल रशीदीन। शेख़ हुसैन नामक एक व्यक्ति इसे उस वक़्त चलाता था। यहाँ की स्थिति सबसे ख़राब थी। ज़्यादातर लड़कों को ज़ंजीरों में जकड़ कर रखा जाता था और चाबुक़ हाथ में लिए शिक्षक ग़श्त लगाते थे, उन्हें बच्चों की ग़लतियों का बेसब्री से इंतज़ार रहता था और बार-बार कोड़ों के बरसने की आवाज़ से स्कूल का परिसर गूंज उठता था। एक छात्र ने यहीं मुझे लोहे की सलाख़ों वाली एक खिड़की की ओर इशारा किया और बताया कि वह कमरा कक्षा गृह नहीं बल्कि जेल है। यह वह कमरा था जिसमें इस्माइल और मोहम्मद नादर को रखा गया था।”

सूडान के मदरसों में ज़ंजीरों में बांधकर बच्चों की चाबुक़ से पिटाई, छात्रों का यौन शोषण
पत्रकार फ़तेह अल रहमान अल हमदानी

“मैं लड़कों के साथ नियमित संपर्क में रहता था। हमले के कई महीनों बाद मेरे साथ प्लेस्टेशन पर खेलते हुए मोहम्मद नादर ने उस दिन की घटना बताई जब उसने इस्माइल के साथ स्कूल से भागने की कोशिश की थी।”

“लड़के ने बताया कि ‘उन्होंने मुझे बांध दिया और मुझे कोड़े मारने से पहले अपने पेट के बल, औंधे मूंह लिटा दिया। दिनों-दिन मारपीट चलती रही। बहुत सारे लोग हमें पीटने आए थे जबकि ख़लवा के बाक़ी बच्चे सो रहे थे। उसके बाद मुझे नहीं पता कि क्या हुआ, मुझे आख़िर इस अस्पताल में होश आया।'”

“पुलिस ने दो शिक्षकों पर हमले का आरोप लगाया, जिन्हें बाद में ज़मानत पर रिहा कर दिया गया। ख़लवा खुला ही रहा, अवैध घोषित नहीं हुआ।”

“मोहम्मद नादर ने मुझे बताया कि मदरसे के अंदर शिक्षक बच्चों के साथ कुकर्म भी करते हैं और इसके लिए वे हमें इस तरह बुला भेजते हैं जैसे कि किसी बहादुरी के काम को अंजाम दे रहे हों! सिर्फ़ यही नहीं, वे हट्टे-कट्टे बच्चों से कमज़ोर बच्चों का रेप भी करवाते हैं।”

“मोहम्मद नादर और इस्माइल का यौन उत्पीड़न नहीं किया गया था, लेकिन कई अन्य लोगों ने मुझे बताया कि बलात्कार शेख़ हुसैन की निगरानी में ख़लवे में बलात्कार के कई कांड हुए हैं।”

“जब मैं उनसे बात करने के लिए ख़लवा लौटा, तो शेख़ हुसैन ने स्वीकार किया कि बच्चों को क़ैद करना ग़लत था, लेकिन यह भी कहा कि बच्चों को ज़ंजीरों में बांधने के कई ‘फ़ायदे’ हैं और ऐसा केवल वे ही नहीं करते बल्कि सभी ख़ल्वों में यह होता है। शेख़ के अनुसार इन मदरसों में अब ज़ंजीरों का इस्तेमाल नहीं होता और ‘जेल’ वाला कमरा अब स्टोररूम बन चुका है। जब मैंने यौन दुर्व्यवहार के आरोपों के बारे में पूछा तो शेख़ नाराज़ हो गए, उन्होंने आरोप का खंडन किया और मुझ पर आरोप लगाया कि मैं ‘क़ुरान-विरोधी’ हूँ।

“इस साल के शुरू में एक कार दुर्घटना में शेख़ की मौत हो गई।”

“संक्रमणकाल के दौरान आई सरकार अब सूडान के सभी ख़लवों का सर्वेक्षण कर रही है। धार्मिक मामलों के मंत्री नसीरादीन मुफ्रे ने कहा कि सभी मदरसों का सुधार किया जाएगा। ख़लवे के अंदर ‘कोई भी पिटाई, यातना, मानवाधिकारों का उल्लंघन या बच्चों के अधिकार का उल्लंघन’ नहीं होने दिया जाएगा।”

“जब मैंने मंत्री को अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में बताया तो उन्होंने जवाब दिया कि ‘पुराने शासन में ख़ल्वों को नियंत्रित करने वाले क़ानून नहीं थे। मैं रातोंरात पुराने शासन के 30 साल के अन्धकार अध्याय को समाप्त नहीं कर सकता’।”

शेख़ जाति के वर्चस्व वाले सूडान में बच्चों के परिवारों को न्याय की उम्मीद नहीं है। मोहम्मद नादर के माता-पिता ने आरोप वापस लेने का फ़ैसला लिया है हालांकि सरकारी वकील का कार्यालय बच्चों के ख़िलाफ़ हिंसा के सभी मामलों को देखने के लिए बाध्य है। मोहम्मद नादर के माता-पिता को अपना केस लड़ने के लिए एक प्राइवेट वकील रखना पड़ा।

अदालत में प्रवेश करते हुए मोहम्मद नादर की माँ फ़ातिमा ने कहा था कि 2018 की क्रांति ने उन्हें और आशावादी बना दिया था, “अतीत में, हमारे पास कोई अधिकार नहीं था, लेकिन अब बात अलग है। नई सरकार के अंतर्गत हम अपने अधिकारों को प्राप्त करेंगे, इंशाल्लाह।”

पर कई घंटे अंदर रहने के बाद वह निराश हो लौट आईं। प्रतिवादियों में से एक उस दिन अदालत पहुँचा ही नहीं था और इसलिए कार्रवाई मुल्तवी कर दी गई थी। इस बीच अभियुक्त शिक्षकों ने कोई याचिका दायर नहीं की है। पत्रकार फ़तेह ने जो सबसे भयावह मदरसा देखा था उसे अब शेख़ हुसैन का भाई चलाता है, जिन्होंने बताया कि उनके प्रबंधन के तहत बच्चों की पिटाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

मोहम्मद नादर और इस्माइल धीरे-धीरे शारीरिक स्वास्थ्य लाभ कर रहा है पर मानसिक पीड़ा बरसों उनको सताएगी। इस बीच लेकिन सूडान में हजारों अन्य बच्चों को अभी भी तीव्र शारीरिक व मानसिक शोषण का ख़तरा है।

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