केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने आखिर नौकरशाही में बदलाव का वह कदम ही उठा लिया, जिसकी सालों से प्रतीक्षा की जा रही थी। अब नौकरशाही में बड़ा अधिकारी बनने के लिए संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सर्विस परीक्षा पास करना जरूरी नहीं रह गया है। अन्य क्षेत्रों में भी विशिष्टता वाला काम कर रहे अनुभवी अधिकारी अब सरकार का हिस्सा बन सकते हैं। रविवार को ही डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी है और इसके लिए नौकरशाही के सर्विस रूल में भी जरूरी बदलाव करने की तैयारी शुरू हो गयी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुरू से ही नौकरशाही में लेटरल एंट्री के पक्षधर रहे हैं। फिलहाल 10 विभागों में संयुक्त सचिव के 10 पदों के लिए लेटरल एंट्री से जुड़ी अधिसूचना जारी की गयी है। यह सरकार के कामकाज में नौकरशाही की बढ़ती दखलंदाजी को काबू करने का की दिशा में उठाया गया सरकार का एक बहुप्रतीक्षित कदम है।
हालांकि इस बाबत अधिसूचना जारी होते ही विरोध के स्वर भी सुनाई पड़ने लगे हैं। कांग्रेस का मानना है कि यह ब्यूरोक्रेसी को प्रभावित करने वाला निर्णय है। इससे यूपीएससी की सिविल सर्विस परीक्षा पास करके नौकरशाह बनने वाले योग्य लोगों के हितों पर असर पड़ सकता है। कांग्रेस का यह भी आरोप है कि सरकार नौकरशाही में अपने लोगों को भरने के लिए लेटरल एंट्री की नीति लागू कर रही है। केंद्रीय सचिवालय सेवा के अधिकारियों ने भी सरकार के इस कदम को सीएसएस कैडर के अधिकारियों के हितों के खिलाफ बताया है। वहीं नौकरशाही में भी इसके खिलाफ सुगबुगाहट शुरू हो गयी है। नौकरशाही में आईएएस और सीएसएस कैडर की अप्रसन्नता तो समझी जा सकती है, लेकिन कांग्रेस का विरोध समझ से परे है। लेटरल एंट्री का प्रस्ताव 2005 में प्रशासनिक सुधार पर आयी पहली रिपोर्ट में ही आया था। यूपीए-1 के शासनकाल के दौरान इस प्रस्ताव को तब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मानने से इनकार कर दिया था। इसके बाद 2010 में दूसरी प्रशासनिक सुधार रिपोर्ट में भी लेटरल एंट्री का प्रस्ताव दिया गया था। उस समय भी आईएएस लॉबी के दबाव में यूपीए-2 की सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था। 2014 में एनडीए की सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लेटरल एंट्री की जरूरत पर बल देते हुए इसे शीघ्र ही लागू करने की बात कही थी। हालांकि विभिन्न कारणों से यह प्रस्ताव टलता रहा, लेकिन 2016 में केंद्र सरकार ने लेटरल इंट्री की संभावनाओं को तलाशने के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनायी, जिसने अपनी रिपोर्ट में इस प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी।
शुरू में प्रशासनिक सुधार से संबंधित जो रिपोर्ट आयी थी, उसमें सचिव स्तर तक के पद पर भी लेटरल एंट्री की अनुशंसा की गयी थी, लेकिन संभवतः आईएएस लॉबी की ओर से प्रबल विरोध होने की आशंका को भांपते हुए सरकार ने मूल प्रस्ताव में मामूली बदलाव किया है और फिलहाल संयुक्त सचिव स्तर पर नियुक्ति की बात को ही मंजूरी दी गयी है। फिलहाल यह नियुक्ति तीन साल के लिए होगी और यदि अधिकारियों का प्रदर्शन अच्छा रहा तो नियुक्ति की अवधि बढ़ाकर पांच साल भी की जा सकती है। सरकार ने जो अधिसूचना जारी की है, उसके मुताबिक निजी, सार्वजनिक या शैक्षिक क्षेत्र में काम करने वाले तथा न्यूनतम 15 साल का अनुभव रखने वाले अधिकारी इस योजना के तहत संयुक्त सचिव स्तर के पद के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह एक तथ्य है कि देश में आईएएस अधिकारियों की कमी है। अरसे से कहा जा रहा है कि सरकार का कामकाज बेहतर तरीके से चलाने के लिए आईएएस अधिकारियों की संख्या में बढ़ोतरी की जानी चाहिए। लेटरल एंट्री का यह निर्णय आईएएस अधिकारियों की कमी को पूरा करने का एक प्रभावी जरिया बन सकता है। इसके साथ ही एक बड़ी बात यह भी है कि इस प्रक्रिया के तहत मंत्रालयों में उनके विषय से संबद्ध विशेषज्ञों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो सकेगा। अभी तक आईएएस अधिकारी ही किसी भी मंत्रालय का पूरा कामकाज संभालते रहे हैं और उस मंत्रालय के नीति निर्धारण में उनका रोल सबसे अहम रहता है। मसलन वित्त मंत्रालय का सर्वोच्च अधिकारी एक आईएएस अधिकारी ही होता है, भले ही उसे अर्थशास्त्र की जानकारी हो या ना हो। जबकि वित्त मंत्रालय का सर्वोच्च अधिकारी यदि कोई अर्थशास्त्री हो तो वह अर्थशास्त्र की बारीकियों को अन्य व्यक्तियों की तुलना में ज्यादा बेहतर समझ सकता है।
इसी तरह रक्षा मंत्रालय में कोई रक्षा विशेषज्ञ हो, गृह मंत्रालय में किसी आंतरिक सुरक्षा के विशेषज्ञ को रखा जाए, मानव संसाधन विकास मंत्रालय में शिक्षा जगत के वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति की जा सकती है। ऐसे ही तमाम मंत्रालयों में उनके विषय से संबंधित विशेषज्ञों कि यदि नियुक्ति होती है, तो कामकाज का स्तर तुलनात्मक तौर पर बेहतर हो सकता है। इसके साथ ही एक बड़ी जरूरत सरकार के कामकाज में नौकरशाही की लगातार बढ़ रही दखलंदाजी को कम करने की भी है। आजादी के बाद से ही नौकरशाही के हाथ में ही सारे तंत्र होते हैं। कई बार नौकरशाहों की हठधर्मिता के कारण सरकार अपनी कई नीतियों को समय से लागू नहीं कर पाती है। लेकिन लेटरल इंट्री होने से आईएएस लॉबी का वर्चस्व कुछ कम हो सकेगा। अभी भले ही सरकार ने पहले चरण में संयुक्त सचिव के स्तर तक की नियुक्ति को ही मंजूरी दी है, लेकिन अगर सरकार का यह प्रयोग सफल रहा, तो भविष्य में सचिव स्तर तक के अधिकारियों की नियुक्ति में लेटरल एंट्री को अपनाया जा सकता है।
केंद्र सरकार ने निश्चित रूप से आईएएस और सीएसएस कैडर के पूर्ण प्रभाव वाले क्षेत्र में दखलअंदाजी कर एक बड़ा साहसिक निर्णय लिया है, लेकिन यह प्रयोग देश के हित में काफी सार्थक सिद्ध हो सकता है। जहां तक सरकार के इस निर्णय का कांग्रेस की ओर से हो रहे विरोध की बात है, तो इसे महज राजनीतिक विरोध से अधिक महत्व नहीं देना चाहिए। सत्ता से धकेली जा चुकी और देश के अधिकांश राज्यों में सिमट चुकी कांग्रेस के लिए इस मसले का विरोध सिर्फ इसलिए किया जा रहा है, ताकि केंद्र सरकार के खिलाफ एक मुद्दा बनाया जा सके। इसी तरह बीएसपी सुप्रीमो मायावती का यह कहना कि सरकार ऐसा करके दलितों के हितों पर कुठाराघात करना चाहती है, भी एक राजनीतिक स्टंट से अधिक महत्व नहीं रखता। केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि लेटरल इंट्री में आरक्षण के सभी नियमों का पालन किया जाएगा। ऐसी स्थिति में मायावती का विरोध भी महज एक राजनीतिक विरोध है, जिसका कोई आधार नहीं है। केंद्र सरकार ने लेटरल एंट्री के प्रस्ताव को मंजूर कर एक बड़ा और साहसिक कदम उठाया है और इसकी सफलता सरकार के कामकाज को सुगम ही बनाएगी।

Leave a Reply