Sunday 11 April 2021
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मिठुन की ज़िन्दगी बदल गई भाई की मौत के बाद

रुपहले परदे के पीछे के मिठुन उर्फ़ गौरांग चक्रवर्ती की ज़िन्दगी, राजनीति, व्यक्तिगत सोच और संबंधों तथा विचारधारा की संक्षिप्त पर दिलचस्प कहानी

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परसों कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी रैली से पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर एक बार फिर राष्ट्रीय ख़बरों की सुर्ख़ियों में आने वाले अभिनेता मिठुन चक्रवर्ती का वास्तविक नाम गौरांग चक्रवर्ती है। व्यक्तिगत चिंतन से नास्तिक मिठुन ने कभी कहा था कि ज्योतिषशास्त्र पर उन्हें कोई भरोसा नहीं है और इसलिए उनका नाम “मिथुन” (राशि का नाम) नहीं है, पर अगर उन्हें मिथुन नाम से भी ख्याति मिलती है तो कोई हर्ज नहीं! ग़रीबी में पले-बढ़े मिठुन का नक्सलियों की विचारधारा की तरफ़ आकृष्ट होना १९६० के दशक के बंगाल का परिचायक था जब कई नौजवानों को लगा था कि बंदूक़ की नोक पर छिनी गई प्रोलेतारिअत के लिए सत्ता का सपना शायद साकार हो सकता है। पर हाल के वर्षों में दिए गए साक्षात्कारों में मिठुन द्वारा कही गई बातों को अगर मानें तो विचारधारा या पार्टी का महत्त्व उनके लिए हमेशा गौण था।

सीपीएम के सुभाष चक्रवर्ती का साथ छोड़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने कहा था कि कम्युनिस्टों के साथ जुड़ने का उनका फ़ैसला जहाँ स्वर्गीय सुभाष चक्रवर्ती और उनकी पत्नी रमोला से व्यक्तिगत संबंध पर आधारित था, वहीं तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने का निर्णय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से व्यक्तिगत परिचय पर आधारित था। इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि तृणमूल कांग्रेस से जुड़ने के बाद उन्होंने रमोला चक्रवर्ती को फ़ोन लगाया था और दूसरी तरफ़ उदास सुभाष चक्रवर्ती की विधवा ने उन्हें अपना मन मारकर आशीर्वाद दिया था। “ये रिश्ते ही दुनिया में सबकुछ हैं,” मिठुन ने ABP आनंद को दिए साक्षात्कार में कहा था।

बहरहाल, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष तथा अन्य ने मिठुन चक्रवर्ती का 7 मार्च को पार्टी में स्वागत किया। इस दौरान उन्होंने राज्य की सत्ता पर आसीन तृणमूल कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा। चक्रवर्ती ने कहा कि वे हमेशा से वंचितों के लिए काम करना चाहते थे और भाजपा ने उन्हें अपनी आकांक्षा पूरी करने के लिए एक मंच दिया है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें 2014 में राज्यसभा भेजा था, मिठुन ने यह भी कहा कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस में शामिल होकर ग़लती की थी। अपनी नई पार्टी में किसी संबंध के नाते मिठुन जुड़े, ऐसी कोई ख़बर अब तक नहीं आई है।

चिटफंड घोटाले के बाद बदला मिठुन का रवैया

जब ममता बनर्जी ने पहली बार पश्चिम बंगाल की गद्दी संभाली थी तो उस समय मुख्यमंत्री ने मिठुन चक्रवर्ती को पार्टी ज्वाइन करने की दावत दी थी। तेलुगु और तमिल फ़िल्मों के अभिनेताओं से नेता बने लोगों के विपरीत पश्चिम बंगाल में फ़िल्मों से संन्यास लेते-लेते अभिनेता राजनीति में नहीं आते बल्कि ‘हीरो’ या ‘हीरोइन’ के रोल मिलने के दौरान ही पार्टियों से राजनीति से जुड़ने के निमंत्रण आने लगते हैं। स्वर्गीय तापस पाल और उनके ज़माने की शताब्दी राय से लेकर हाल के देव या मिमि चक्रवर्ती और नुसरत जहाँ सब इसी तरह राजनीति में आए।

ममता के आह्वान को मिठुन ने स्वीकार कर लिया और साल 2016 में राज्यसभा से सांसद भी निर्वाचित हुए लेकिन उनका नाम शारदा चिटफंड घोटाले मे आने के बाद उनके हालात ही बदल गए। वे इस कंपनी के brand ambassador थे। इसके बाद उनकी ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस से दूरियाँ बढ़ गईं और उन्होंने राजनीति से सन्यास के साथ-साथ राज्यसभा की सदस्यता से भी त्यागपत्र दे दिया। यह मिठुन के लिए अमिताभ बच्चन के बोफ़ोर्स मुहूर्त जैसा समय था। हालांकि बच्चन के संबंध राजीव गांधी के परिवार से भी ख़राब हो गए थे, बोफ़ोर्स कांड में अपना नाम घसीटे जाने के कारण राजनीति से ही बिग बी का मन भर गया था।

खैर, तृणमूल कांग्रेस में मिठुन की एंट्री दिलचस्प थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक श्मशान में उन्हें पार्टी में शामिल होने और टिकट देने का ऑफर दिया था। ये सारे लोग मशहूर कलाकार सुचित्रा सेन के अंतिम संस्कार के लिए जुटे थे।

एक इंटरव्यू में मिठुन ने बताया कि ममता बनर्जी ने इससे पहले (2014 में राज्यसभा भेजे जाने से पहले) 10 साल पहले भी उन्हें अप्रोच किया था और राज्यसभा भेजने का ऑफर दिया था, तब उन्होंने इस ऑफर को ठुकरा दिया था।

भाई की मौत ने बदली नक्सली ज़िन्दगी

बहुत कम लोगों को पता होगा कि एक्टर बनने से पहले मिठुन के हाथों में बंदूक़ और बम हुआ करते थे। मिठुन पहले नक्सली थे, लेकिन एक हादसे में भाई की मौत के कारण उन्हें अपने परिवार के बीच लौटना पड़ा और यहीं से उनके ऊपर परिवार को संभालने का दायित्व आ गया। डिस्को या उन दिनों चलन में रहे सड़कछाप नृत्य का उन्हें बहुत शौक़ था और इसी के चलते उन्होंने स्टेज शोज़ से शुरूआत की। उनकी तमाम फ़िल्मी करियर के दौरान अतिउत्साही बांग्ला मीडिया ने कभी उनकी तुलना माइकल जैक्सन से की तो कभी इस बात से इनकार किया कि वे उनके बाद आए गोविंदा जितने फुर्तीले नहीं हैं। बांग्ला मीडिया ने उनके बारे में यह भी कहा कि वे कराटे के ब्लैक बेल्ट चैंपियन हैं हालांकि यह प्रमाणित तथ्य नहीं है।

नक्सलियों के बीच से लौटने के बाद मिठुन ने पुणे फ़िल्म इंस्टिट्यूट में दाख़िला लिया जहाँ शक्ति कपूर और टॉम आल्टर उनके सहपाठी थे। पुणे फ़िल्म इंस्टिट्यूट से निकलने के बाद मिठुन चक्रवर्ती को पहली फ़िल्म भी मिल गई। मिठुन चक्रवर्ती बॉलीवुड के उन स्टार्स में से एक हैं जिन्होंने अपनी मेहनत से फिल्म इंडस्ट्री में एक अलग पहचान बनाई। अस्सी के दशक के दूसरे भाग में मिठुन ने बॉलीवुड में किसी को अपने आस-पास फटकने तक नहीं दिया। यह वह दौर था जब बच्चन की शहंशाह अदालती चक्करों में फँस गई थी, जीतेंद्र की श्रीदेवी और जयाप्रदा के साथ हैदराबाद और चेन्नई में बनने वाली फिल्मों का कालखंड समाप्त हो चुका था, बीच में चार हिट्स देने के बाद धर्मेंद्र ग़ायब हो गए थे और अनिल कपूर की तेज़ाब या जैकी श्रॉफ़ की हीरो फ़िलहाल परदे पर नहीं आई थी।

चक्रवर्ती ने मृणाल सेन की 1976 में आयी फिल्म मृगया में एक आदिवासी तीरंदाज़ की भूमिका निभाई थी, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था। मृगया के बारे में एक दिलचस्प घटना कम ही लोगों को मालूम होगा। फ़िल्म के क्लाइमैक्स में मिठुन के किरदार को फाँसी लगनी थी और इसकी शूटिंग के लिए असली जल्लाद नाटा मल्लिक को बुलाया गया था। सीन के शूट होने से पहले मिठुन ने नाटा मल्लिक से पूछा था कि किसी हादसे की संभावना तो नहीं है? मज़ाक़ में ही सही, अस्ल ज़िन्दगी में भी जल्लाद रहे नाटा मल्लिक ने कहा था, “मैं इसकी गारंटी नहीं ले सकता!” एक इंटरव्यू के दौरान मृणाल सेन ने कहा था कि मृगया के क्लाइमैक्स में इस कारण मिठुन के चेहरे पर जो तनाव दिखा था वह एक्टिंग नहीं थी बल्कि मिठुन सच में बहुत घबराए हुए थे।

अस्सी के दशक की अपार सफलता के बाद जब उनका करियर ढलान पर था तो उन्होंने होटल के बिज़नस में पूँजी लगाईं और ऊटी में शिफ्ट हो गए। उन्होंने अपना होटल फ़िल्मों की शूटिंग के लिए किराए पर उपलब्ध करवाया और साथ ही अपने प्रोडक्शन की फ़िल्में वहीं बनाने लगे! हालांकि ये फ़िल्में निम्न स्तर की थीं, उनका लो-बजट का ख़र्च निकल आता था और मुनाफ़ा भी होता था।

चक्रवर्ती कोलकाता के प्रतिष्ठित स्कॉटिश चर्च कॉलेज के छात्र थे, जहाँ से सुभाष चंद्र बोस, नेपाल के प्रथम प्रधानमंत्री बीपी कोइराला और असम के पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बार्दोलोई ने भी शिक्षा प्राप्त की थी। चक्रवर्ती को राजनीतिक रूप से जागरूक अभिनेता के रूप में देखा जाता था और अक्सर उन्हें वामपंथी फ़िल्म निर्देशकों द्वारा अपनी फिल्मों में लिया जाता था। चक्रवर्ती का तृणमूल कांग्रेस में शामिल होना हैरानी की बात नहीं थी — उसी प्रकार जैसे भाजपा में शामिल होने के उनके क़दम को इस नज़रिए से देखना चाहिए कि बंगाल में एक बार फिर परिवर्तन की लहर दौड़ रही है।

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