भारत सरकार की कोशिश पर ब्रूकिंग्स की मोहर

इसी तरह कभी उन 39 फीसदी गरीब जनसंख्या वाले देश भारत में गरीबों की संख्या अबर घटकर 21 फीसदी ही रह गयी है

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भारत में भी गरीबी हमेशा ही एक बड़ा मुद्दा रहा है। गरीबी को लेकर आजादी के बाद से ही राजनीति होती रही है। इस मुद्दे पर खासतौर पर कांग्रेस चुनावी सफलता भी हासिल करती रही है। लेकिन दुर्भाग्यवश यह मुद्दा हमेशा राजनीतिक मुद्दा ही बना रह गया। कभी भी धरातल पर कोई ठोस काम नहीं हो सका। लेकिन, अब जो आंकड़े आये हैं, उससे पता चलता है कि भारत में अत्यंत गरीब लोगों की संख्या लगातार कम हो रही है।

इन आंकड़ों को मानें तो देश में प्रति मिनट 44 व्यक्ति अत्यंत गरीबी की स्थिति से बाहर आ रहे हैं। ये बात आश्चचर्यजनक जरूर है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय शोध एवं विचार संस्था ब्रूकिंग्स की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है की पिछले कुछ सालों में भारत में बुनियादी स्तर पर किए गए कामों की वजह से अत्यंत गरीब लोगों की संख्या में काफी तेजी से कमी आयी है। कुछ साल पहले तक ही पूरे विश्व में सबसे अधिक अत्यंत गरीब लोग भारत के निवासी थे। दो साल पहले 2016 में ही देश में अत्यंत गरीब लोगों की संख्या 12.5 करोड़ आंकी गयी थी। जो अब 2018 में घटकर लगभग 7.3 करोड़ रह गयी है।

इसी तरह कभी उन 39 फीसदी गरीब जनसंख्या वाले देश भारत में गरीबों की संख्या अबर घटकर 21 फीसदी ही रह गयी है। ये आंकड़ा भी लगातार सिकुड़ता जा रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 2016 तक भारत में सबसे ज्यादा अत्यंत गरीब लोग रहा करते थे। लेकिन, भारत में इस संख्या में हुई उल्लेखनीय कमी की वजह से अत्यंत गरीब आबादी वाले देश की रैंकिंग में अब नाइजीरिया पहले स्थान पर पहुंच गया है। नाइजीरिया में अत्यंत गरीब लोगों की आबादी लगभग 8.7 करोड़ है। इसी तरह कांगो में भी अत्यंत गरीब लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है और ब्रूकिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक अगले कुछ महीनों में कांगो भी इस मामले में भारत से आगे निकलकर दूसरे स्थान पर आ जायेगा।

भारत की लगभग 132 करोड़ की जनसंख्या में अत्यंत गरीब लोगों की संख्या 7.3 करोड़ है। कुल जनसंख्या के अनुपात में अत्यंत गरीब लोगों की इस संख्या को काफी कम माना जा सकता है। यहां अत्यंत गरीब का अर्थ वैसे लोगों से है, जिनकी प्रतिदिन की आय 1. 9 डॉलर से कम है। यानी भारत के संदर्भ में प्रतिदिन लगभग 130 रुपये या इससे ज्यादा कमाने वाला व्यक्ति अत्यंत गरीब की श्रेणी में नहीं गिना जाएगा। भारत में अत्यंत गरीब लोगों की संख्या में तेजी से कमी आने की बात को उत्साहजनक है और यदि भारत में बुनियादी स्तर पर इसी तरह काम चलता रहा, तो 2030 तक भारत में एक भी अत्यंत गरीब व्यक्ति नहीं रह जाएगा।

ये ठीक है कि देश में गरीबों की संख्या को पूरी तरह से खत्म कर पाना संभव नहीं है, लेकिन यदि आगे चलकर अत्यंत गरीब लोगों की स्थिति में ही सुधार हो जाता है, तो इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जाना चाहिए। दरअसल, देश में गरीबी दूर करने में मौजूदा सरकार की कई योजनाएं काफी मददगार साबित हो रही हैं। विशेष रूप से सरकार ने गरीब महिलाओं, बालिकाओं, ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों तथा शहरी क्षेत्र में स्लम बस्तियों में रहने वाले लोगों के उत्थान के लिए जो योजनाएं शुरू की हैं, उनका असर अब स्पष्ट रूप से नजर आने लगा है। इन योजना का ही असर है कि 2016 के बाद के दो सालों में ही देश में अत्यंत गरीब लोगों की संख्या में 5.2 करोड़ यानी लगभग 42 फीसदी की कमी आयी है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस सरकार ने गरीबी उन्मूलन की दिशा में युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की योजनाओं को प्रभावी करने का महत्वपूर्ण काम किया है। ऐसा नहीं है कि देश में इसके पहले गरीबी उन्मूलन की दिशा में काम नहीं किया गया। 1947 में आजादी मिलने के बाद से ही गरीबी घटाने तथा गरीबों को राहत पहुंचाने की दिशा में लगातार विभिन्न सरकारें काम करती रही हैं। लेकिन, अभी तक सभी सरकारों का मुख्य जोर गरीबों को राहत पहुंचाने के लिए सब्सिडी के जरिये लोगों को रियायत देने का रहा है। लेकिन, ये योजनाएं गरीबों के आर्थिक संवर्द्धन की दिशा में कभी भी सहायक सिद्ध नहीं हो सकीं।

जानकारों का कहना है कि मौजूदा सरकार का ध्यान सब्सिडी देने की जगह लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की ओर रहा है, ताकि लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार आ सके और वे खुद इतने सबल हो सकें, जिससे कि उन्हें किसी सब्सिडी की ज़रूरत ही न पड़े। अभी भी राशन दुकानों या कोटा के कपड़ों आदि में सब्सिडी दी जाती है, ताकि देश का गरीब तबका कम खर्च करके भी अपने खाने और पहनने की जरूरतों को पूरा कर सके। लेकिन, इन रियायती योजनाओं के साथ ही केंद्र सरकार का पूरा जोर अधिक से अधिक संख्या में युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाली योजनाओं से जोड़ने का रहा है।

केंद्र की मौजूदा सरकार द्वारा शुरू की गयी कौशल विकास योजना, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत अभियान के तहत ग्रामीण इलाकों में करोड़ों की संख्या में शौचालयों का निर्माण, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना आदि ऐसी योजनाएं हैं, जिनसे लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। अहम बात तो ये है कि गरीबी उन्मूलन की दिशा में इस सरकार ने समाज के सबसे निचले स्तर पर रहने वाले लोगों के लिए काम किया है। सरकार का प्रमुख लक्ष्य लोगों को आत्मनिर्भर बनाना रहा है, सब्सिडी के टुकड़ों पर पालना नहीं। जबकि, इसके पहले की तमाम सरकारें लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की जगह उन्हें रियायती दर पर चीजों को उपलब्ध कराने का रहा।

गरीबी का भारतीय राजनीति पर कितना असर रहा है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1971 में स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा देकर ही जबरदस्त चुनावी सफलता हासिल की थी। ये और बात है कि चुनावी सफलता मिलने के बावजूद इंदिरा गांधी या उनके बाद के ज्यादातर प्रधानमंत्री गरीबी के मुद्दे को सिर्फ अपना चुनावी हथियार ही बनाते रहे, कभी भी इस दिशा में ठोस काम नहीं हो सका। यही कारण है कि गरीबों की संख्या तो बढ़ी ही, अत्यंत गरीब लोगों की संख्या भी बढ़ती चली गयी। एक तथ्य ये भी है कि गरीबी का सीधा संबंध आर्थिक विकास से होता है।

90 के दशक की शुरुआत में जब भारत में आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ, तो निश्चित रुप से गरीबी उन्मूलन की दिशा में परोक्षतः एक ठोस काम की शुरुआत हुई। हालांकि, एक विरोधाभास यहां यह भी था कि देश एक ओर तो आर्थिक सुधार के रास्ते पर बढ़ना चाह रहा था, दूसरी ओर सब्सिडी और रियायती दर पर जनता को दिये जाने वालों समानों का मौद्रिक बोझ भी देश की आर्थिक रफ्तार पर पड़ रहा था। जानकारों का कहना है कि अगर गरीबी को पूरी तरह से खत्म करना है, तो ऐसा करने के लिए देश की आर्थिक विकास दर को न्यूनतम सात फीसदी के स्तर पर बनाये रखना जरूरी है।

विकास दर को इस स्तर पर बनाये रखने के लिए अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में काम करना होगा। ऐसा करके हीसरकार की तमाम योजनाओं का लाभ देश के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाया जा सकता है। इसके साथ ही इस तथ्य पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि सरकारी रियासती योजनाओं के भरोसे गरीबी कम नहीं की जा सकती। इसके लिए देश की आबादी को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रोजगार से जोड़ना जरूरी है।

मौजूदा सरकार निजी उद्यम और स्टार्टअप को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है, ताकि इन कामों से जुड़ने वाले लोग न केवल खुद आत्मनिर्भर हो सकें, बल्कि अपने साथ ही कुछ और लोगों को भी रोजगार उपलब्ध करा सकें। हमें ये भी समझना होगा कि रोजगार का अर्थ सिर्फ सरकारी नौकरी ही नहीं होता। भारत में मोटे तौर पर रोजगार का अर्थ सिर्फ सरकारी या बड़ी कंपनियों में नौकरी हासिल करना ही माना जाता रहा है।

यही कारण है कि आंकड़ों के लिहाज से भारत में बेरोजगारों की एक विशाल फौज खड़ी नजर आती है। हालांकि ये भी सही है कि गरीबी उन्मूलन और रोजगार उपलब्धता की दिशा में पिछले कुछ सालों में भारत ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। ऐसे में यदि ब्रूकिंग्स की रिपोर्ट के तथ्यों को देखा जाये तो अगले 12 वर्षों में (2030 तक) देश में अत्यंत गरीब लोगों की संख्या को शून्य तक लाना कोई असंभव बात नहीं है।

SOURCEहिन्दुस्थान समाचार/दिव्य उत्कर्ष
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