स्विस बैंक में काले धन का सच

स्विस बैंकों की टैक्स हैवेन वाली छवि अभी भी लोगों के मन में बनी हुई है और जनवरी 2019 तक यह निश्चित रूप से बनी रहेगी

0

यह बात हर किसी को हैरान कर सकती है कि स्विस बैंक में भारतीयों का जमा पैसा एक साल में बढ़कर डेढ़ गुना हो गया है। बीते दिनों जब स्विट्जरलैंड में बैंकों के नियामक स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) ने नये आंकड़े जारी किये तो पता चला कि भारतीयों द्वारा स्विस बैंकों में जमा धन 101 करोड़ स्विस फ्रैंक यानी लगभग 7000 करोड़ रुपया हो गया है, जो इसके पहले के साल 2016 के मुकाबले 50.2 फीसदी ज्यादा है। इन आंकड़ों के सामने आते ही ये खबर मीडिया की सुर्खियां तो बनी ही, बैठे-बिठाए विपक्ष के हाथ भी एक बड़ा मुद्दा हाथ लग गया। विपक्ष ने कहना शुरू कर दिया कि काले धन पर लगाम लगाने का दावा करने वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में स्विस बैंकों में काले धन में जमकर बढ़ोतरी हुई है।

दरअसल लंबे समय से स्विस बैंकों में टैक्स हैवेन माना जाता रहा है। माना जाता है कि यहां लोग अपना काला धन जमा कराते हैं। ऐसा मानने की एक बड़ी वजह यह है की गोपनीयता कानूनों की आड़ में स्विस बैंक लंबे समय तक दुनिया भर में कालेधन की कमाई करने वाले लोगों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बने हुए थे। यही कारण है कि काला धन अर्जित करने वाले अपने पैसे को सुरक्षित करने के लिए सबसे पहले स्विस बैंकों का ही रुख करते थे। क्योंकि, यहां उन्हें इस बात की गारंटी होती थी कि उनका नाम कभी भी उजागर नहीं होगा। लेकिन, अब स्थितियां बदली हैं।

अब अंतरराष्ट्रीय दबाव के साथ ही भारत के आग्रह पर हुए एक समझौते के तहत स्विट्जरलैंड जनवरी 2019 से भारत सरकार को स्विस बैंक में भारतीयों के खातों की पूरी जानकारी उपलब्ध कराएगा। इसलिए अब काले धन की कमाई करने वालों के लिए स्विस बैंक सुरक्षित नहीं रहा है। काले धन का मुद्दा भारत में हमेशा ही एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान बीजेपी ने सरकार बनने की स्थिति में विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने का वादा किया था।

Ad I

चुनाव जीतने के बाद बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने काले धन पर अंकुश लगाने के लिए अपनी ओर से लगातार कई प्रबंध भी किये। इसी वजह से पिछले साल के पहले के लगातार तीन सालों में स्विस बैंकों में भारतीयों द्वारा जमा की गयी रकम में लगातार गिरावट देखी गयी। और तो और, 2016 में ही स्विस बैंकों में भारतीयों द्वारा जमा की गई राशि लगभग 45 फीसदी तक गिर गयी। भारतीयों की जमा राशि में होने वाली ये एक साल की सबसे बड़ी गिरावट है।

2016 के अंत में स्विस बैंकों में भारतीयों द्वारा जमा कुल रकम 4,500 करोड़ रुपये थी, लेकिन अगले वर्ष ही इसमें 50 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी होने के कारण यह 7,000 करोड़ के स्तर पर पहुंच गयी। एसएनबी द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीयों द्वारा 2017 में स्विस बैंकों में खुद जमा करायी गयी राशि 6,891 करोड़ रुपये थी, जबकि वेल्थ मैनेजरों द्वारा जमा 112 करोड़ रुपये जमा कराये गये थे। हालांकि अगों की बात की जाये तो यूपीए शासनकाल की तुलना में अभी भी भारतीयों की जमा राशि काफी कम है।

2007 तक सिक्योरिटीज तथा अन्य मदों में स्विस बैंकों में जमा भारतीयों की रकम अभी की तुलना में कई गुना अधिक थी। 2006 के अंत में भारतीय द्वारा सभी मदों में स्विस बैंकों में जमा रकम 23,000 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी। बाद में भारतीय नियामक एजेंसियों की सख्ती की वजह से इस रकम में गिरावट आई और 10 साल के भीतर ही यानी 2016 तक यह आंकड़ा 4,500 करोड़ रुपये तक आ गया आ गया। लेकिन 2017 में स्विस बैंकों में भारतीयों की जमा राशि में अचानक 50 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी ने विपक्षी पार्टियों को बड़ा राजनीतिक मुद्दा थमा दिया है।

कहा जा रहा है कि काले धन के विरोध के नाम पर चुनी गयी सरकार काले धन की कमाई करने वालों को संरक्षण दे रही है और इसी कारण स्विस बैंकों में भारतीयों की जमा राशि में कितनी बढ़ोतरी हुई है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो इसे सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विफलता करार दिया है। ये भी माना जा रहा है कि कांग्रेस इसी साल चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी इसको अपना चुनावी मुद्दा बनाएगी। बड़ा सवाल यह है कि क्या यह राशि काला धन है या फिर जायज तौर पर जमा की गई राशि है। जहां तक नियमों की बात है, तो भारत सरकार की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) के तहत एक व्यक्ति को हर साल ढाई लाख डॉलर तक भारत से बाहर ले जाने की अनुमति मिली हुई है।

यह योजना यूपीए के शासनकाल में लागू की गयी थी। इस स्कीम के तहत जितने पैसे स्विस बैंक में जमा किए जायेंगे, उन्हें काला धन नहीं माना जा सकता। इसी तरह भारतीय मूल के उन लोगों को जो दूसरे देशों के नागरिक हैं या अनिवासी भारतीय हैं, उनके द्वारा जमा कराये गये पैसे को भी कालाधन नहीं माना जा सकता है। कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल का दावा है कि स्विस बैंकों में भारतीयों की जमा राशि में जिस बढ़ोतरी की बात की जा रही है, उसमें 40 फीसदी से अधिक राशि तो एलआरएस के तहत ले जायी गयी है। इसलिए सिर्फ जमा राशि के आंकड़ों के आधार पर पूरे पैसे को काला धन बताना ठीक नहीं है। यह ठीक है कि सरकार की सफाई को भी गलत नहीं कहा जा सकता, लेकिन स्विस बैंकों की अभी तक जो छवि बनी रही है, उससे आम जनमानस को वहां जमा पैसा काला धन ही प्रतीत होता है।

स्विस बैंकों की टैक्स हैवेन वाली छवि अभी भी लोगों के मन में बनी हुई है और जनवरी 2019 तक यह निश्चित रूप से बनी रहेगी। हां, उसके बाद जब स्विस बैंकों के हर खाते की जानकारी भारत सरकार को मिलने लगेगी, तब जो भी बात कही जाएगी वह तथ्यपरक होगी। इस जानकारी के आधार पर भारत सरकार जमाकर्ताओं से यह भी पूछ सकेगी कि उन्होंने ये पैसा कहां से अर्जित किया। साफ है कि स्विस बैंकों में काला धन जमा कराने वालों के दिन अब लदने लगे हैं। उनकी कोई भी बात गुप्त नहीं रहने वाली है। ऐसे में काले धन की कमाई करने वाले लोग स्विस बैंक में पैसा जमा कराने का जोखिम उठायेंगे, इस बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। हर कोई जानता है कि उसके खाते की पूरी जानकारी जनवरी 2019 में भारत सरकार को मिल जायेगी। जिसके बाद अगर उनका पैसा काला धन हुआ तो उनसे भारी जुर्माना भी वसूला जा सकता है और उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है।

जाहिर है कि अगर 2017 में स्विस बैंकों में भारतीय ने अपने पैसे जमा कराए हैं, तो उसमें काले धन की मात्रा न्यूनतम ही होगी। क्योंकि ओपन इनफॉर्मेशन वाला बैंक बन जाने के बाद स्विस बैंक काले धन की कमाई वालों के लिए सुरक्षित नहीं रह जायेगा। तो फिर शायद ही कोई व्यक्ति अपना काला धन स्विस बैंकों में जमा कराने की मूर्खता करेगा। हां, ये जरूर कहा जा सकता है कि यूपीए सरकार द्वारा शुरू किये गये लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम, जिसके तहत एक व्यक्ति हर साल ढाई लाख डॉलर तक विदेश ले जा सकता है, को हर हाल में बंद किया जाना चाहिए, ताकि देश का पैसा देश में ही रहे विदेश न चला जाये। इसके साथ ही काले धन पर अंकुश लगाने की पहल जारी रहनी चाहिए, और इस मामले में किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं होना चाहिए। केंद्र सरकार ने सत्ता में आने के तुरंत बाद ही काले धन पर एसआईटी का गठन कर ठोस कदम उठाने के संकेत दिए थे, लेकिन लोगों को संतोष तभी मिलेगा, जब उन्हें काले धन के खिलाफ धरातल पर कुछ ठोस काम होता हुआ नजर आयेगा।

Ad B
SOURCEहिन्दुस्थान समाचार/अनुराग साहु
Previous articleAircel-Maxis: Court to consider charge sheet against Karti Chidambaram on 6 July
Next articleलोकपाल नियुक्ति के बहाने मोदी को घेरने की तैयारी