Thursday 26 May 2022
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व्यापारी समाज सरकार से नाराज़

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नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार आय घोषणा योजना 2016 की ‘सफलता’ से बहुत ख़ुश लग रही है। मोदी एवम् वित्त मंत्री अरुण जेटली लोगों को इस अवसर पर बधाइयां दे रहे हैं तथा भाजपा के कार्यकर्ता हर्षोल्लास के साथ विभिन्न प्रचार-प्रसार माध्यमों में इस ‘अभूतपूर्व कीर्तिमान’ की डींगें मार रहे हैं। परन्तु इस नए तंत्र से व्यापारी समाज ख़ासा रुष्ट नज़र आता है। यह कहा जा रहा है कि टैक्स महकमे वाले गुंडों की तरह उगाही कर रहे हैं और वैश्य समाज में हाहाकार की स्थिति है। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि मोदी सरकार का यह रवैया भाजपा की “business-friendly” छवि के विपरीत है और अपने वोटरों के इस ख़ास तबक़े को नाराज़ करना पार्टी को चुनावों में भारी पड़ सकता है।

दो पैग़ाम तुरंत संदेशन माध्यम WhatsApp पर पिछले महीने वायरल हो गए थे और व्यापारी बंधू इसे आपस में ख़ूब share और forward कर रहे थे। यह उस समय की बात है जब एक तरफ़ देश के करदाता बेतहाशा अपने काग़ज़ों में ढूंढ रहे थे कि कहीं पिछले किसी साल में कोई आय बताना वो भूल तो नहीं गए और दूसरी तरफ़ केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (Central Board of Direct Taxes) के अधिकारी येन-तेन-प्रकारेण अपना टार्गेट पूरा करने में लगे हुए थे।

[stextbox id=”alert” caption=”पहला WhatsApp सन्देश”]

एक CA ने PM MODI को लिखा खुला पत्र

सीए एम के अरोड़ा ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस पत्र के ज़रिये क्‍या बताया है। इसके साथ ही सीए ने ख़ुद को पार्टी का ठगा हुआ मतदाता बताया है। पत्र कुछ इस प्रकार है —

आदरणीय मोदी जी

आपने मन की बात में कहा कि देश में लाखो लोगों के पास करोड़ों के बंगले है फिर भी आय 50 लाख से कम… विश्वास नहीं होता।

यह कहते हुए आपने उन्हें धमकी दी की 30 सितंबर के बाद दिक्कत खड़ी हो सकती है। माननीय मोदी जी यह कहते हुए आपने देश के तमाम टैक्स पेयर्स को चोर ठहरा दिया।

माननीय मोदी जी आपसे यह उम्मीद नहीं थी।

माननीय जनता ने आपको व्यवस्था बदलने के लिए जिम्मेदारी सौंपी है न कि जनता को ही बुरा भला कहने के लिए।

माननीय व्यापारी, उद्योगपति, किसान, तमाम तरह के जोख़िम उठाने के बाद इस देश की अर्थव्यवस्था में विकास मैं अपना योगदान दें रहे हैं। 65-70% टैक्स देते है, आपसे कोई सुविधा उपलब्ध नहीं, अनाप-शनाप क़ानून के कारण सभी विभागों में मजबूरिवश घूस देते हैं।

हर नुक़सान में अकेले होते है आपका कोई योगदान नहीं। इसके बावजूद एक देश का प्रधानमंत्री अपनी ही जनता को दोषी ठहराए, चोर समझे यह ठीक नहीं।

मोदी जी, तमाम देश जानता है कि सारी ताक़त सत्ता में निहित होती है।

अच्छा होता कालेधन की घोषणा का यह आह्वान आप जनता के बजाए सेंट्रल एक्साइज़ एंड कस्टम, तमाम IAS, ब्युरोक्रैट्स, अधिकारियों, मंत्री एवम मुख्यमंत्री, देश के तमाम पुलिस अफ़सर, सिंचाई एवं लोक निर्माण विभाग, आबकारी विभाग के अधिकारियों, तमाम नगर निगम, नगरपालिका अधिकारियों, महापौर, नगर पालिका अध्यक्ष, तमाम राजस्व अधिकारियों, वन एवं माइनिंग से जुड़े अधिकारियों, शहरी विकास से जुड़े अधिकारियों एवं तमाम ऐसे विभाग जिन्हें आप जानते हैं कि इनमें पूरा भ्रष्टाचार व्याप्त है रजिस्ट्रार विभाग के अधिकारियों एवं आयकर विभाग के अधिकारी, सेल्स टैक्स विभाग के अधिकारी एवम् देश के तमाम न्यायाधीशों से …ईमानदारों को छोड़कर … जो पिछले कई दशकों से देश की जनता से घूसख़ोरी कर रहे है … उनको यह अपील करते कि … आज तक आपने जो कमाया सारे गुनाह माफ किसी की नौकरी नहीं जाएगी यदि वह स्वेच्छा से अपनी आय घोषित कर देता है, किंतु 30 सितंबर के बाद किसी भी अधिकारी कर्मचारी जिसने भ्रष्ट तरीके से आय अर्जित की है को हम नहीं छोडेंगे तो आप की अपील का ज्यादा प्रभाव पड़ता।

बेबस निरिह जनता को धमकी देने से न तो काला धन बाहर आएगा न काला धन बनना रुकेगा क्योकि सारा देश जानता है की अफसरों, नेताओ के गठजोड़ के बग़ैर काला धन बनाना नामुमकिन है क्योकि इन्ही लोगों के पास टैक्स चोरी करने के एक लाख तरीके बताने वालो की फ़ौज है।

और यह कहां का न्याय है कि जिन अधिकारियो कर्मचारियों ने भ्रष्टाचार के दम पर तमाम तरह की दौलत इकट्ठी कर रखी है वही लोग बेकसूर जनता का न्याय करेंगे!

आशा है मोदी जी आप इस बात पर ग़ौर फ़रमाएंगे।

निवेदनकर्ता,
आप की पार्टी का एक ठगा हुआ मतदाता

[/stextbox]

कर तंत्र के अन्य नए उपाय भी व्यापारियों को रास नहीं आ रहे। निम्नलिखित दूसरे सन्देश पर ग़ौर फ़रमाइए—

[stextbox id=”alert” caption=”दूसरा WhatsApp सन्देश”]

व्यापारी भाइयों,
अब सरकार GST लागू करने जा रही है। विपक्ष ने तीन मुद्दों पर GST बिल को रोक रखा था। और यह तीनों मुद्दे व्यापारियों व् देश की जनता के हित में थे।
1। GST लागु होने के पश्चात् किसी भी स्टेट को अलग से कोई टैक्स लगाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। जैसा कि कुछ स्टेटों ने अभी से ENTRY TAX अलग से लगाने की आवाज उठा दी है।

2। GST की दर जो भी रखी जाए, उसमें पांच वर्ष से पहले संशोधन न हो, जैसा कि पिछले दो वर्षों में सर्विस टैक्स की दर 12% से बढ़ाकर 15% तक कर दी गई है।

3। दर बढ़ाने का निर्णय पार्लियामेंट करे क्योंकि टैक्स की दर पुरे देश के लिये होगी। किसी अकेले मन्त्री को अपनी मनमर्जी से टैक्स बढ़ाने का अधिकार नहीँ होना चाहिये।

4। टैक्स अदायगी में देरी होने पर या हिसाब किताब में गड़बड़ी पाये जाने पर व्यापारियों को पांच वर्ष की सजा का प्रावधान रखा गया है, जो कि सरासर ग़लत है।
इससे व्यापारी भाइयों पर बहुत भारी मुसीबत आने वाली है।
अफ़सर स्टॉक का पूरा हिसाब किताब मांगेगा।
*मतलब।।। या तो अधिकारियों को खुश करो अन्यथा जाओ।*

इस देश में सारे कानून कायदे व्यापारियों पर ही क्यों लागु किये जाते है जबकि व्यापारी की देश के योगदान में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है।व्यापारी टैक्स COLLECT करता है, फिर उसका हिसाब रखता है और सरकार को टैक्स जमा करवाता है, फिर भी व्यापारी चोर कहलाता है।
सरकारी अधिकारियों को साठ वर्ष बाद व् सांसदो, विधायकों को उनके निर्वत होने पर चाहे कोई भी ऊम्र हो, तुरन्त पैंसन मिलनी शुरू हो जाती है।
एक व्यापारी जो सारी जिंदगी लोगों को रोजगार व् टैक्स देते देते बुढ़ा हो जाता है। उसके भविष्य व् रिटायरमेंट के बारे सरकारें क्यों नहीँ कानून बनाती। क्या व्यापारी सारी जिंदगी बंधुआ की तरह मुफ़्त में सरकार का टैक्स इकठा करके जमा करवाता रहेगा ?

हर व्यापारी को उसके द्वारा जमा करवाए GST व् पर 10% के हिसाब से कमीशन मिलना चाहिए, जो कि उनके अकाउन्ट में DIRECT जमा हो जाए और PF की भांति उस पर ब्याज मिलना चाहिए। यह अमाउंट इन्कम टैक्स से मुक्त हो, ताकि इस राशि का उपयोग वह अपने रिटायरमेंट के बाद या व्यापार कार्य छोड़ने के उपरान्त पैंशन के तौर पर इस्तेमाल कर सके।

व्यापारी वर्ग न तो सरकार से आरक्षण मांग रहा है और न ही कोई सब्सिडी। लेकिन रिटायरमेंट के बाद सम्मान से जीने का अधिकार तो उसे भी मिलना चाहिए।

माननीय वित् मन्त्री जी ने GST पर सुझाव मांगे है।

अत: सभी व्यापारी भाइयों से अनुरोध है कि माननीय वित् मन्त्री जी को उपरोक्त सुझाव अधिक से अधिक व्यापारिक संगठनो द्वारा तुरन्त भिजवाएं और अपने एरिया के सांसदो से भी संसद में इस बारे आवाज उठाने बारे आग्रह करें।

व्यापारी एकता जिंदाबाद

[/stextbox]

सम्पादक की टिप्पणी

अब यह घोषणा हो चुकी है कि लगभग 64,000 करदाताओं ने लगभग रु० 65,000 करोड़ IDS योजना के तहत सरकार के सुपुर्द किए हैं — यानी प्रति करदाता ने औसतन रु० 1 करोड़ से थोड़ा ज़्यादा राशि को इस सोच के साथ जमा करवाया है कि पहले उन्होंने ये पैसे कमाए तो थे पर इसका ब्यौरा देना भूल गए थे। जब कि चुनाव से पहले बाबा रामदेव यह प्रचार किया करते थे कि चंद अमीर लाखों करोड़ों के भारतीय रूपए विदेश के गुप्त ठिकानों में भेज देते थे; इस से भाजपा को 2014 के चुनाव में भरपूर फ़ायदा हुआ था। यदि बाबा रामदेव भाजपा/राजग सरकार के कोई नहीं लगते तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो कुछ लगते ही होंगे? वो भी रामदेव के आँकड़े से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने ऐलान कर दिया था कि इस काले धन की राशि इतनी अधिक है कि इसके प्राप्त हो जाने के बाद हर भारतीय नागरिक के खाते में 15-15 लाख रूपए जमा हो जाएंगे! फिर ये बड़े चोर कहाँ गए? साल भर में एक-एक करोड़ तो आजकल कॉर्पोरेट दुनिया के सर्वोच्च पदों पर आसीन अधिकारी भी कमा लेते हैं। उनके मालिक, जो उद्योगपति हैं, उनका हिसाब कौन लेगा?

कुछ बातें यहाँ ज़ाहिर हैं। पहला, काले धन का सम्पूर्ण उद्धार किसी सरकारी तंत्र के बस की बात नहीं है। बड़े करचोर इस बात से इतने आश्वस्त हैं कि वो कभी पकडे नहीं जायेंगे कि वो IDS या VDIS जैसी योजनाओं को साफ़ अनसुनी-अनदेखी कर देते हैं। दूसरा, वैसे भी कर का काम विकास के अलावा और क्या है? यदि भारत में पैसे लगाने से अच्छा लाभ होता है तो व्यापारी यहाँ निवेश अवश्य करेंगे। यदि निवेश किया तो विकास होगा; नए दफ़्तर खुलेंगे और लोगों को नौकरियां मिलेंगी। ऐसे में इतने कर की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। तीसरा, इस बात को भी चुनाव-पूर्व भाजपा ने ख़ूब हवा दी थी कि हो सकता है आयकर पूरी तरह समाप्त हो जाए और राजस्व में कमी को खपत पर लगने वाले कर से पूरा किया जाए। इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि अधिक भारतीय देश को कर देंगे जहाँ केवल मुट्ठी भर लोगों से आयकर वसूला जाता है। उस अवधारणा का क्या हुआ? क्या CBDT इतना भयंकर महक़मा है कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी भी उससे ख़ौफ़ज़दा हैं, और इसलिए वो इस कार्यालय को बंद नहीं कर सकते? इसके अलावा अपने वोटरों को नाराज़ करने की उनकी क्या मजबूरी है समझना मुश्किल है। माना कि वैश्य समुदाय, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुयायियों और मध्यम वर्ग के 33% निश्चित वोट से भाजपा हमेशा चुनाव नहीं जीत सकती, उसे कम से कम 10% और वोट चाहिए, जिसके लिए प्रधानमंत्री हर रैली में “ग़रीब आदमी”, “ग़रीब आदमी” चिल्लाते रहते हैं। पर जहाँ मध्यम वर्ग भी रोज़मर्रा के सामान की क़ीमतों, अपना घर व अपने शौक़ के कुछ असबाब ख़रीदने के लिए क़र्ज़ के लिए ब्याज दर में कमी न आने के कारण परेशान है, यदि भाजपा के 33% निश्चित मतांश में ही भारी कमी आ गई फिर मोदी 10% के बलबूते 2019 में कौन सी सरकार बना लेंगे?

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