Thursday 26 May 2022
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‘Bhushans and Yadav attempting a leftist coup in AAP’

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Bhushan and Yadav have a sinister plan to nationalise all major private enterprises in the country: Sources

Late last night, some founding members of the Aam Aadmi Party (AAP), who are also members of its national council, called this correspondent over the phone in response to my Facebook update questioning the role of Shalini Gupta, Shanti Bhushan’s daughter and Prashant Bhushan’s sister Bhushan family’s real last name is Gupta  to inform me that the woman’s interference in the party’s internal matters is objectionable not only because of the fact that she is not an office bearer but also for the fact that she is an American citizen who is not permitted to practise politics in India.

The first caller told this correspondent that socialists Yogendra Yadav and Prashant Bhushan have been, for the past several months, more so after the AAP’s debacle in Lok Sabha elections, trying to snatch the national-level leadership of the party from Arvind Kejriwal, relegating him to Delhi politics. “They have a sinister plan to campaign for nationalising all private enterprises in the country after displacing Kejriwal from the partys national leadership,” he said. But they can bring private companies under the government only after forming government at the Centre, which is a pipedream, I pointed out.

Such a campaign cannot even start, said the second caller. “With all his flaws,” the second caller said, “Kejriwal is our tallest leader and he alone has a nationwide appeal, however limited that appeal might be. If Yadav and Bhushan think they can lead us all, they are gravely mistaken.”

Early this morning, one Adarsh Shastri endorsed the view on Twitter: “AK (Arvind Kejriwal) has and will remain the only inspiration for many like me who quit corporate career to strengthen his hands in changing Indian politics!” It was retweeted by the AAP’s cyber head Ankit Lal.

Gupta’s name had figured in the first conversation because I had quoted on Facebook a paragraph from my blog that I had posted after quitting the AAP: “The locus standi of Shalini Gupta is curious. She was often the first to respond to my mails, while she was not even a member of the party. She would poke her nose in the party affairs because Kejriwal entertained her intrusion. She was introduced to the party as an ‘expert in organisational matters’, though her bigger claim to inclusion was certainly the fact that she was Bhushan’s sister. An undeniable proof of this being a Khaas aadmi’s party!” Both the callers agreed that Bhushan Sr’s daughter as well as son were being sidelined in the AAP; hence, he burst out in fury, seeing the situation go out of his hand in a party he was so enthusiastic about that he had donated Rs 2 crore to it in all at the time of its inauguration: Rs 1 crore on the day of the party’s inception and another Rs 1 crore subsequently.

On Twitter and Facebook, unmindful of the shenanigans of power politics at the higher echelons of their party, supporters tried to trend the hash-tag #UnitedWithAAP. Fuming at Arnab Goswami of Times Now, Kumar Vishwas questioned the news anchor’s journalistic ethics in allowing to be interviewed in the presence of prompters by his side (the day after that interview, Suhel Seth had released a short video alleging that the prompters were Priyanka Gandhi and Jairam Ramesh).

Along with preparations for a demonstration at Jantar Mantar, the AAP Volunteers’ Action Manch or AVAM is releasing its angst via and other founding members of the party are supporting them while also wondering why Bhushan Sr suddenly lost his cool.

Deep Singh wrote from Jammu & Kashmir: “To us, the proposed swaraj satyagraha will be meaningless without adopting the spirit of Swaraj by the top leadership of (the) AAP. The said top leadership never cared for the time to time objections (sic) raised by so many responsible persons of party including Shazia Ilmi but question is whether it will be serious enough after comments of Sh. Shanti Bhushan Ji?”

Amik Ahmed responded in Hindi: कल मैंने पूरे दिन टेलीविज़न पर आम आदमीपार्टी की विचार धारा पर श्री पंकज गुप्ता जी को मीडिया में पार्टी कापक्ष रखते हुए देखा। लग ही नहींरहा था यह बही पार्टी है जिसकी विचारधाराकी लोग तारीफ़ करते थे।अवश्य ही कहीं कोई बड़ी चूक हुई है।वक़्त रहते अगर यहठीक नहीं हुई तो इसका आगे क्या होगा?

Diptiman Chatterjee wrote from West Bengal: “Something is definitely wrong. I remember Shanti Bhushan ji was the one who first announced that (sic) his decision to donate 1 crore rupees in the Foundation day of the Party in (sic) Constitution Club. He was neither a holder (sic) nor did he want to hold any post. We start killing ourselves the day we think whatever we are doing is absolutely right. This was surely not the party which we dreamt of. Saddens me… (I) am writing this mail with a heavy heart!”

Harish Chander Arya from spilled the most beans while venting his frustration. He sent 2 consecutive mails. In the first, he wrote:आप लोग जंतर मंतर में स्वराज के लिए सत्याग्रह करने जा रहे है,मैरी शुभ कामनाए ।  आम आदमी पार्टी वास्तव में अपने मूलउद्देश्य से भटक गई है । भटकाव का मुख्य कारण यह है जब पार्टी के नेता अपनेही बनाए पार्टी संविधान को ही स्वयम स्वीकार नहीं कर पा रहे थे,तभी सेलगने लगा था भविष्य में क्या होगा । राजनीति में शॉट कट कुछ भी  कहकर माराजा सकता है। आम आदमी पार्टी के कर्ताधर्ताओ को शायद पिछले दिनों को यादकरने की जरूरत है। इस पार्टी से लोगो की उम्मीद इसलिए जुड़ी थी पार्टी केनेता जनता के हित की बाते सरल तरीके से करते थे और राजनीति  आम आदमी के लिएकरने की बात की थी ।आज वास्तव में पार्टी चंद लोगो के हाथ की कठपुतली बनगयी है,लोकतन्त्र की कल्पना की नहीं जा सकती है, विकेन्द्रीकरण सिर्फकार्यकर्ताओ का करना चाहते है खुद का नहीं,अगर कोई पार्टी वर्कर अपनी बातरखे भी तो कहाँ, मेल भेजी जाय तो उतर देना उचित नहीं समझते,फोन पर बात करनानहीं चाहते,जब बात सर से ऊपर निकाल जाये तो उसे अनुशासनहीनता बताते है । विनाश काले विपरीत बुद्धि

Arya’s second mail read: आम आदमी पार्टी अपने मूल सिद्धांतो से लगातार भटकती जा रही है। माननीय अरविंद केजरीवाल जी,कोकुछ महत्वाकांक्षी लोग कमजोर करने की कोशिश कर रहे है। ब्रष्टाचार विरोधीलोगो ने आंदोलन इस बात के लिए नहीं किया था की एक और राजनीति कर देश कीजनता को बेवकूफ बनाकर राजनीति करेंगे। बल्कि इसलिए आम आदमी पार्टी का गठनहुआ था की देश में एक साफ स्वच्छ राजनीति कर व्यवस्था परिवर्तन करेंगे,अमर शहीदो के स्वपन का भारत बनें और आम आदमी की राजनीति करने की राजनीति विकल्प हो।

पार्टी एक तरफ sms द्वारा पार्टी की सदस्यता की बात करती है, दूसरी तरफ पार्टी से जुड़ेने वाले लोगो को, कुछ चंद लोग, पार्टी संगठन में काम तक नहीं करने देना चाहते है। क्या परिवर्तनलोकतन्त्र की व्यवस्था में बिना जनमत के लाया जा सकता है। पार्टी द्वारालगातार पार्टी की बुनियाद से जुड़े लोगो की उपेक्षा इसलिए की जा रही ताकिकुछ लोग जो मन में आए करें।

लोकसभाचुनावो के समय पार्टी संगठन के लोगो की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गयी। बाहरके लोगो को लाकर चुनाव अभियान समिति का गठन कर चुनाव व्यवस्था उनके हाथोसौपी गई। जो लोग पार्टी सिद्दांतों से कभी जुड़े नहीं थे ऐसे लोगो कोप्रत्याशी गुपचुप रूप से बनाया गया और पार्टी फंड का इस्तेमाल मात्र कुछलोग अपने हितो के लिए कर रहे है। चुनाव परिणामो का ठिठरा पार्टी संगठन केलोगो के सर क्यो फोड़ा जा रहा है। आम आदमी पार्टी के केन्द्रीय स्तर के नेताखुद के बनाए पार्टी संविधान का पालन नहीं करते और जब मर्जी नया पार्टीकानून तय कर लेते है।

मिशनविस्तारके नाम पर पार्टी बुनियाद से जुड़े लोगो को किनारे लगाने का कामसिर्फ इसलिए किया जा रहा है पार्टी चुनावो में हार गई। जबकि हार कीज़िम्मेदारी मात्र केन्द्रीय नेताओ की है जो उल्टे सीधे निर्णय अपनी सुविधाओके लिए लेते है। आज पार्टी बुनियाद से जुड़े लोगो को बिना किसी कारण नहींहटाया जाना चाहिए। मिशन विस्तार इसलिए नहीं ताकि पार्टी में सिर्फ अपने अंधभक्तो की वो फौज खड़ी हो जाय। जो धरातल से जुड़े ही ना हो और जिनका स्तेमालअपनी राजनीति महत्वकांक्षा पूर्ति के लिए हो सकें और आम आदमी को बेवकूफबनाया जाय।

मिशनविस्तार होना चाहिए विस्तार मायने यह नहीं की विस्तार उत्तराखंड के जनपदोका हो और दिल्ली के लोग जो यहा के किसी भी कार्यकर्ता को जानते भी नहीं हैवह बिना जनपद समिति के विस्तार कैसे कर सकते है । जिन लोगो ने पार्टी कोअपने तन,मन,धन,से खड़ा किया आज वो लोग सब चुप रहकर क्यो बैठे, क्या यही स्वराज है।

विस्तारसमिति कहती है प्रत्येक जिले में पहले से चुनी समितियों को भंग कर लोकसभाप्रत्याशियों की सहमति से अस्थाई बनाई जाएगी और उनके द्वारा बूथ लेबल तकसमिति बनानी होगी,जबसभी बूथ तक समिति बनकर तयार हो जाएगी तब संगठन का चुनाव होगा । एक तरफचुनी हुई समितियों को जो पार्टी के मिशन बुनियाद से खुली बैठको मे चुनी गईउन्हे आप कोई अधिकार तक नहीं देते और मान्यता के नाम पर अस्थाई समिति भीउसे मानते है जो टिकट मिलने से पार्टी से जुड़े है उनकी सहमति पर बनेगी ।

अब नया संगठन का स्वरूप मात्र चुनाव लड़ने के लिए होगा संसदीय क्षेत्र,विधानसभा क्षेत्र,आदि।क्या देश में पार्टी से मात्र वही लोग जुड़ेंगे जो चुनाव ही लड़ेंगे। अगरपार्टी टिकट किसी और को देती है तो क्या सभी सहमत रहेगे। सबसे महत्वपूर्णबात यह है चुनाव ही लड़ने वाला संगठन पार्टी विचारधारा का संगठन हो सकता है।

जोलोग व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर अपना सब कुछ छोड़ पार्टी से जुड़े विगतवर्ष से एक ईमानदार राजनीति की कल्पना से लगे है उनका क्या महत्व होगा? क्या प्रत्याशी को संगठन के आधीन होना चाहिए या संगठन को प्रत्याशी आधीन?  पार्टी कहती थी हमारा प्रत्याशी पार्टी को लिख कर देगा में निस्वार्थसेवा करूंगा पार्टी विचारधारा से चलूँगा ये तब क्या संभव होगा जब संगठन हीप्रत्याशी का जेबी संगठन बनेगा ।

प्रत्याशियोंके आधारित संगठन बनाने के बाद भविष्य में किसी दूसरे अच्छे उम्मीदवार कोयह वर्तमान उम्मीदवार आधारित संगठन क्या स्वीकार लेगा । इससे तो ये लगता हैये भी कुछ लोगो की पार्टी हो जाएगी,फिर उस आम आदमी का क्या होगा इस पार्टी से जुडने का मतलब, जो लोग प्रत्याशियों को चुनने के बाद सेवक कहते थे क्या अब उन्हे सेवक कहाजाएगा । मुझे तो लगता है इस आधार पर हम सारी पावर प्रत्याशी के हाथो देनेजा रहे है।प्रत्याशी संगठन को अपनी राय दे सकता है लेकिन बाध्य नहीं करसकता है, अगर प्रत्याशी कार्यकर्ता भी है तब उसकी बात अपने में महत्वपूर्ण मानीजानी चाहिए।  हो सकता है टिकट देते वक्त कुछ विशेष शर्त टिकट फ़ाइनल करनेवाले नेताओ की रही होंगी लेकिन इसका खामियाना पार्टी संगठन से जुड़े लोगक्यो भूगते।

साथियो मेरा पद त्याग पार्टी संगठन से जुड़े महत्वपूर्ण सवालो को लेकर है ।मेरा यह भी सोचना है प्रत्याशियों को पार्टी कार्यकर्ताओ में से ही होनाचाहिए और जो लोग प्रत्याशी बनाना चाहते है उन्हे कम से कम छ महीने पार्टीमें कार्य करना अनुवार्य होना चाहिए । नए लोगो को पार्टी से जोड़ना जरूरी हैलेकिन जो व्यक्ति लोकल के कार्यकर्ताओ की सहमति से जुड़ना ही नहीं चाहता यापार्टी संगठन के साथ काम नहीं करना चाहता ऐसे लोगो को ऊपर के नेता थोपेनहीं और प्रत्येक स्थारीय संगठन को उसके अधिकार क्षेत्र में कार्य करने कीस्वत्र्न्ता होनी चाहिए।

Arya’s mail is clearly indicative of his anger with less-than-revolutionary but high-profile faction in the party that Yadav and the Bhushans personify.

All quotes in this report are unedited. Not even grammatical or orthographic corrections have been carried out.

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Surajit Dasgupta
Surajit Dasgupta
Co-founder and Editor-in-Chief of Sirf News Surajit Dasgupta has been a science correspondent in The Statesman, senior editor in The Pioneer, special correspondent in Money Life, the first national affairs editor of Swarajya, executive editor of Hindusthan Samachar and desk head of MyNation

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