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बचपन बचेगा तो देश बढ़ेगा

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[dropcap]ब[/dropcap]च्चे देश और समुदाय का भविष्य, परिवार और माता-पिता की उम्मीदों के चश्म-ओ-चिराग़ और परम्पराओं के दूत होते हैं। माँ-बाप अपनी योग्यता के अनुसार अपने बच्चों की सुरक्षा व लालन-पालन करते हैं। सुरक्षा व लालन-पालन का अनुभव तो जानवरों और पक्षियों में भी पाया जाता है, लेकिन वो अपने बच्चों पर उस समय तक काम का बोझ नहीं डालते जब तक वो काम करने के लायक़ ना हो जाएं। शिकार पर गुज़ारा करने वाले जानवर और पक्षी अपने बच्चों को शिकार का प्रशिक्षण देते हैं। सब्ज़ी खाने या दाने की ख़ुराक वाले बच्चों में इस की समझ पैदा करते हैं।

कई इन्सान कच्ची उम्र में अपने बच्चों को काम में लगा देते हैं। इस से उनका शरीर व मन का विकास पूरी तरह नहीं हो पाता और सेहत पर ख़राब असर पड़ता है। यह समस्या लंबे अर्से से सरकार और समाज के लिए चिंता का कारण रहा है। कैलाश सत्यार्थी को इसी विषय पर काम करने के लिए नोबल इनाम से नवाज़ा गया।

बच्चों को काम या मज़दूरी (ख़ास तौर पर जोख़िम भरे कामों) में लगाने से उनकी सेहत और ज़िंदगी को अनावश्यक होने वाले ख़तरों को सरकार और समाज ने महसूस किया। बचपन बचाओ जैसी कई स्वयंसेवक संस्थाओं ने बच्चों को इन परेशानीयों से मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाया। सरकार ने 1986 में क़ानून बना कर बच्चों के हक़ में एक बड़ा फ़ैसला लिया। लेकिन फिर भी जिन बच्चों को स्कूल जाना चाहिए वो होटलों, ज़रदोज़ी, कशीदाकारी, सिलाई-कढ़ाई, बेड़ी के कारख़ानों, मोटर मकैनिक, पंक्चर सॉटने की दुकानों और चांदी के वर्क़ बनाने के कारख़ानों में नज़र आ जाऐंगे। बड़ी फ़ैक्ट्री और कारख़ानों में बच्चों को काम पर रखने में क़ानून बनने के बाद कमी ज़रूर आई है। लेकिन इस पर पूरी तरह रोक नहीं लग सकी। बच्चा मज़दूरी को ख़त्म करने के लिए देश और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आवाज़ें उठती रही हैं।

केंद्र के श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय के मुताबिक़ बाल मज़दूरी (निषेध और नियम) संशोधन विधेयक 2012 को केन्द्रीय मंत्रिमंडल की मंज़ूरी मिल गई है। उसे संसद में रखा जाना है। यह बदलाव न सिर्फ़ 1986 के क़ानून की कमियां दूर करने से सम्बंधित है बल्कि इस में 14 से 18 बरस की आयु के बच्चों के काम को लेकर नए सिरे से स्पष्टीकरण भी दिए जा रहे हैं। इस से पहले 2006 में भी कुछ तबदीलीयां की गई थीं। प्रस्तावित संशोधन में पूरी कोशिश की गई है कि तमाम तरह के कारोबार में 14 बरस से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखने पर पाबंदी हो। देखा जाये तो उसे लाज़िमी तालीमी हक़ क़ानून 2009 की उम्र से भी जोड़ने का काम किया गया है। हालाँकि इस सब के बावजूद कुछ मुआमलों में, जैसे कि परंपरागत कारोबार, उस्ताद-शागिर्द रिश्ते के तहत काम करने वाले बच्चे क़ानून में शामिल नहीं होंगे। मगर उनका स्कूल जाना ज़रूरी होगा। सरकार ने 14 बरस से कम उम्र के बच्चों को लेकर पाबंद वाले क़ानून पर सैद्धांतिक रूप से रज़ामंदी तो दे दी है लेकिन इस को ठोस शक्ल देना अभी बाक़ी है। सामाजिक और आर्थिक बदलाव के इस दौर में काफ़ी कुछ बदल रहा है; इस के बावजूद कई मुआमले ज़मीनी सतह पर सुधार से वंचित हैं। इस में बाल मज़दूरी भी शामिल है। आलमी सतह पर बाल मज़दूरी की जो हालत है वो कहीं ज़्यादा चिंताजनक है।

भारत में आज़ादी के बाद से ही सरकार बाल मज़दूरी को लेकर चिंतित रही है। इस मसले के तमाम पहलुओं का जायज़ा लेने के लिए 1979 में गुरुपाद स्वामी कमेटी बनाई गई थी। उस की सिफ़ारिश पर बाल मज़दूरी (निषेध व नियम) ऐक्ट 1986 लागू किया गया। 1987 में बाल मज़दूरी पर एक राष्ट्रीय पालिसी को अमली शक्ल दी गई। इस के इलावा 1990 में नैशनल लेबर संस्थान जैसी इकाइयों को ठोस शक्ल दी गई; फिर भी बचपन मज़दूरी की गिरफ़्त से पूरी तरह नहीं निकल पाया।

बाल मज़दूरी का मतलब ऐसे काम से है जिसमें काम करने वाला शख़्स क़ानून के ज़रीए तय की गई उम्र के अंदर होता है। बाल मज़दूरी बच्चों को इन बुनियादी सुविधाओं से वंचित करती है जिन पर उनका पैदाइशी हक़ है। साथ ही इस से बच्चों की जिस्मानी, ज़हनी, समाजी और नैतिक विकास में भी रुकावट पैदा होती है। यह ऐसी समस्या है जिसका हल तलाश किए बग़ैर भविष्य का ख़्याल संभव नहीं है; यह अपने आप में देश और समाज के लिए कलंक तो है ही, इससे दूसरे मसलों को भी जन्म होता है। देखा जाए तो ये नौनिहालों के साथ ज़बरदस्ती होने वाला ऐसा अमल है जिससे देश और समाज का भविष्य ख़तरे में पड़ता है। यह ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जो सौ सालों से राष्ट्र चिंतन का केंद्रबिंदु बना हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1924 में उस वक़्त इसे लेकर पहल हुई थी जब जिनेवा समझौते में बच्चों के हुक़ूक़ को मंज़ूरी देते हुए पंच-सूत्रीय प्रोग्राम का ऐलान किया गया था। उसके चलते बाल मज़दूरी पर पाबंदी लगाई गई; साथ ही बच्चों के लिए कुछ ख़ास अधिकारों को मंज़ूरी दी गई।

भारत के आईन में बच्चों के हुक़ूक़ के हवाले मौजूद हैं। इस की कई दफ़आत बच्चों को इन्साफ़ दिलाती हैं। दफ़ा(A)24 तालीम का बुनियादी हक़ देती है, जबकि सैद्धांतिक तौर पर यह अनिवार्य किया गया है कि 6 से 14 बरस तक बच्चों को यह देश मुफ़्त और आवश्यक तालीम मुहय्या कराएगी। इतना ही नहीं, दफ़ा 51(A) के तहत बुनियादी कर्त्तव्य के तौर ये प्रस्ताव भी 2002 मैं लाया गया कि अभिभावक उन्हें ज़रूरी तौर पर प्रशिक्षण दिलाएंगे। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन चाइल्ड लेबर को बच्चे की सेहत और उस की तालीम में रुकावट डालने और उस के शोषण की शक्ल में देखता है। संगठन की रिपोर्ट बताती है कि 140 देशों में 71 देश ऐसे हैं जहां बच्चों से मज़दूरी कराई जाती है। इन देशों में भारत भी शामिल है। नन्हे हाथों में बेड़ी, पटाख़े, माचिस, ईंटें, स्टील का फ़र्नीचर, चमड़े से बने सामा, जूते वग़ैरह यही सब दिखाई देते हैं। क़ालीन बनवाए जाते हैं; कढ़ाई करवाई जाती है और रेशम के कपड़े बनवाए जाते हैं। “Findings on the Forms of Child Labour” रिपोर्ट बताती है कि रेशम के तार ख़राब न हो इस लिए बच्चों से ही ये काम कराया जाता है। फ़िलिपीन्स में बच्चों से केले, नारियल, तंबाकू की खतीए के कामों के साथ गहने और अश्लील फिल्मों में इस्तिमाल होने वाला सामान भी बनवाया जाता है जबकि हमारे पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में 14 औद्योगिक वस्तुओं का ज़िक्र किया गया है जिनसे कमसिन मज़दूर जुड़े हैं।

बाल मज़दूरी पर पाबंदी लगाने के लिए 1948 के कारख़ाना ऐक्ट के इलावा दर्जनों क़ानून मौजूद हैं। इसके बावजूद बाल मज़दूरों की तादाद में बराबर इज़ाफ़ा हो रहा है। कुल मज़दूर ताक़त में 5% हिस्सा चाइल्ड लेबर का है। सरकारी जनगणना के मुताबिक़ देश में क़रीब 43 लाख चाइल्ड लेबर हैं। बच्चों के हुक़ूक़ के लिए काम करने वाली संस्था बचपन बचाओ आंदोलन का कहना है कि ऐसे बच्चों की तादाद एक करोड़ 17 लाख है जिसमें काम करने और काम की तलाश करने वाले सभी तरह के बाल मज़दूर शामिल हैं। संसद में पेश किए जानेवाले चाइल्ड लेबर संशोधन विधेयक 2012 पर शक ज़ाहिर करते हुए संस्था की जानिब से जारी सर्वे में कहा गया है कि 2011 के सेन्सस के मुताबिक़ 6 से 14 बरस की उम्र के 3 करोड़ 39 लाख बच्चे स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ चुके हैं। ऐसे में उनका आसानी से बाल मज़दूर बनने का शक है।

सबसे ज़्यादा चाइल्ड लेबर कपड़ा और जूट के काम में हैं। उस के बाद फ़ुटवेयर और होटल उद्योग में हैं। ऐसे बच्चों को प्रस्तावित क़ानून से कोई राहत नहीं मिलने वाली। रिपोर्ट के मुताबिक़ चाइल्ड लेबर के 21% मुआमले घर ख़ानदान से जुड़े उद्योग में दिखाई देते हैं। इसमें 14 बरस से कम उम्र के 21% बच्चे अपने सरपरस्तों या रिश्तेदारों के काम में हाथ बटाते हैं जबकि 14 से 17 साल उम्र के 19 फ़ीसद बच्चे भी ऐसा ही कर रहे हैं। बिल में ऐसे बच्चों की हिफ़ाज़त का कोई सुझाव नहीं है। इस के इलावा बिल में ख़तरनाक उद्योग की तादाद 86 से घटा कर तीन कर दिए जाने की तजवीज़ भी चाइल्ड लेबर के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकती है।

मुल्क में आईन लागू हुए 65 साल हो गए, लेकिन बाल मज़दूरी की फ़िक्र से देश आज़ाद नहीं हुआ। यूनाइटेड नेशन बच्चों के अधिकार समझौते की दफ़ा 32 पर भारत ने अभी तक रज़ामंदी नहीं दी है जिसमें चाइल्ड लेबर को जड़ से ख़त्म करने की शर्त शामिल है। 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत ने कहा था कि अपनी आर्थिक अवस्था को देखते हुए इस दिशा में रुक-रुक कर क़दम उठाएँगे; उसे एकदम नहीं रोका जा सकता। 23 बरस बीतने के बाद भी देश बाल मज़दूरी से अटा पड़ा है। इतना ही नहीं, चाइल्ड लेबर क़ानून के संशोधन में भी नरमी देखने को मिल रही है। ताज़ा मुआमला ये है कि मनोरंजन उद्योग, खेल और ख़ानदानी कारोबार को इस श्रेणी से बाहर रखा गया है, इस लिए क़ानून में बदलाव के बावजूद बाल मज़दूरी की गुंजाइश बनी रहेगी। साथ ही क़ानून में ये जोड़ा गया है कि माँ-बाप बच्चों की पढ़ाई और सेहत का ध्यान रखेंगे कि वो मुतास्सिर ना हो। सज़ा के मुआमले में भी ये संशोधन काफ़ी हद तक ढीलापन लिए हुए है। इस से विशेषज्ञ और बच्चों के लिए काम करने वाली संस्थाएँ चिंतित हैं कि हालात बेहतर होने के बजाय और बद से बदतर हो सकते हैं।

बाल मज़दूरी के मुआमले के साथ शोषण और रोज़गार के कई पहलू जड़े हैं। गै़र-क़ानूनी कारोबार और जिस्मानी शोषण के शिकार भी ज़्यादातर बच्चे ही होते हैं और इस के पीछे ग़रीबी बड़ी वजह है। दो वक़्त की रोटी जुटाने की कोशिश से बाल मज़दूरी जन्म लेती है।चाइल्ड लेबर को पूरी तरह ख़त्म ना होने देने में पूंजीवादी सोच भी आड़े आरही है। जब तक कमज़ोर, ग़रीब लोगों की माली हालत को बेहतर बनाने और बच्चों को तालीम से जोड़ने की कोशिश नहीं की जाएगी तब तक क़ानून लूल्हे-लंगड़े ही साबित होंगे। चाइल्ड लेबर को ख़त्म करने वाले मिसाली ख़्याल बहुत उम्दा हो सकते हैं लेकिन ज़मीन पर बचपन पिसता रहेगा। ज़रूरत है कि सरकार के साथ समाज इस मसले के प्रति जागरूक हो। हर शख़्स को आगे आकर मुल्क से इस कलंक को मिटाने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी अदा करनी होगी क्योंकि बचपन बचेगा तभी देश तरक़्क़ी करेगा।

अनुवाद — सुरजीत दासगुप्ता


بچے ملک و قوم کا مستقبل ،خاندان و والدین کی ا میدوں کے چشم و چراغ اور روایتوں کے سفیر ہوتے ہیں ۔والدین اپنی استعداد کے مطابق اپنے بچو ں کی حفاظت و پرورش کرتے ہیں ۔ پرورش و حفاظت کا احساس تو جانوروں اور پرندوں میں بھی پایا جاتا ہے لیکن وہ اپنے بچوں پر اس وقت تک کام کا بوجھ نہیں ڈالتے جب تک وہ کام کرنے کے لائق نہ ہو جائیں ۔ شکار پر گزارا کرنے والے جانور و پرندے اپنے بچوں کو شکار کی تربیت دیتے ہیں ۔ سبزی خور یا دانے دنکے کی خوراک والے بچوں میں اس کی سمجھ پیدا کرتے ہیں ۔

کئی انسان کچی عمر میں اپنے بچوں کو کام میں لگا دیتے ہیں ۔ اس سے ان کی پوری طرح نشودنما نہیں ہو پاتی اور صحت پر خراب اثر پڑتا ہے ۔ یہ مسئلہ لمبے عرصے سے سرکار اور سماج کے لئے تشویش کا باعث رہا ہے ۔ کیلاش ستیارتھی کو اسی موضوع پر کام کرنے کے لئے نوبل انعام سے نوازا گیا ۔

بچوں کو کام یا مزدوری خاص طور پر جوکھم بھرے کاموں میں لگانے سے ان کی صحت اور زندگی کو لاحق ہونے والے خطرات کو سرکار اور سماج نے محسوس کیا ۔بچپن بچاؤ جیسی کئی رضاکار تنظیموں نے بچوں کو ان پریشانیوں سے نجات دلانے کا بیڑا اٹھایا ۔ سرکار نے 1986میں قانون بنا کر بچوں کے حق میں ایک بڑا فیصلہ لیا ۔ لیکن پھر بھی جن بچوں کو اسکول جانا چاہئے وہ ہوٹلوں ، زردوزی ، کارچوبی ، سلائی کڑھائی ، بیڑی کے کارخانوں ، موٹر مکینک، پنچر ساٹنے کی دکانوں اور چاندی کے ورق بنانے کے کارخانوں میں نظر آجائیں گے ۔ بڑی فیکٹری اور کارخانوں میں بچوں کو کام پر رکھنے میں قانون بننے کے بعد کمی ضرور آئی ہے ۔ لیکن اس پر پوری طرح روک نہیں لگ سکی ۔ بچہ مزدوری کو ختم کرنے کے لئے ملکی و بین الاقوامی سطح پر آوازیں اٹھتی رہی ہیں ۔ مرکزی وزارت برائے لیبر اور روزگار کے مطابق بچہ مزدوری (پابندی اور قوانین ) ترمیم بل 2012کو مرکزی کابینہ کی منظوری مل گئی ہے ۔اسے پارلیمنٹ میں رکھا جانا ہے ۔یہ بدلاؤ نہ صرف 1986کے قانون کی کمیاں دور کرنے سے متعلق ہے بلکہ اس میں چودہ سے اٹھارہ برس کے کمسنوں کے کام کو لیکر نئی تعریف یا وضاحت بھی کی جا رہی ہے ۔اس سے پہلے 2006میں بھی کچھ تبدیلیاں کی گئی تھیں ۔ مجوزہ ترمیم میں پوری کوشش کی گئی ہے کہ تما م طرح کے کاروبار میں چودہ برس سے کم عمر کے بچوں کو کام پر رکھنے پر پابندی ہو۔ دیکھا جائے تو اسے لازمی تعلیمی حق ایکٹ 2009کی عمر سے بھی جوڑنے کا کام کیا گیا ہے ۔ حالانکہ اس سب کے با وجود کچھ معاملے مثلا روایتی کاروبار استاد شاگرد رشتے کے تحت کام کرنے والے بچے قانون میں شامل نہیں ہوں گے ۔مگر ان کا اسکول جانا ضروری ہوگا ۔ سرکار نے چودہ برس سے کم عمر کے بچوں کو لے کر پابند والے قانون پر اصولی رضا مندی تو دیدی ہے لیکن اس کو ٹھوس شکل دینا ابھی باقی ہے ۔ سماجی و معاشی بدلاؤ کے اس دور میں کافی کچھ بدل رہا ہے اس کے با وجود کئی معاملے زمینی سطح پر سدھار سے محروم ہیں ۔ اس میں بچہ مزدوری بھی شامل ہے ۔عالمی سطح پر بچہ مزدوری کی جو حالت ہے وہ کہیں زیادہ تشویشناک ہے ۔

بھارت میں آزادی کے بعد سے ہی سرکار بچہ مزدوری کولیکر فکر مند رہی ہے ۔ اس مسئلہ کے تمام پہلوؤ ں کا جائزہ لینے کے لئے 1979میں گروپادسوامی کمیٹی بنائی گئی تھی ۔ اس کی سفارش پر بچہ مزدوری (ممانعت کے قواعد ) ایکٹ 1986لاگو کیا گیا ۔1987میں بچہ مزدوری پر ایک قومی پالیسی کو عملی شکل دی گئی ۔اس کے علاوہ 1990میں نیشنل لیبر سنستھان جیسی اکائیوں کو ٹھوس شکل دی گئی پھر بھی بچپن مزدوری کی گرفت سے پوری طرح نہیں نکل پایا ۔بچہ مزدوری کا مطلب ایسے کام سے ہے جس میں کام کرنے والا شخص قانون کے ذریعہ مقرر کی گئی عمر کے اندر ہوتا ہے ۔بچہ مزدوری بچوں کو ان بنیادی سہولیات سے محروم کرتی ہے جن پر ان کا پیدائشی حق ہے ۔ساتھ ہی اس سے بچوں کی جسمانی ، ذہنی سماجی اور اخلاقی نشودنما میں بھی رکاوٹ پیدا ہوتی ہے ۔ یہ ایسا مسئلہ ہے جس کا حل تلاش کئے بغیر مستقبل کا خیال ممکن نہیں ہے یہ خود میں ملک و سماج کے لئے کلنک تو ہے ہی دوسرے مسئلوں کو بھی جنم دیتا ہے ۔دیکھا جائے تو یہ نو نہالوں کے ساتھ جبرا ہونے والا ایسا عمل ہے جس سے ملک و سماج کا مستقبل خطرے میں پڑتا ہے ۔ یہ ایسا حساس مدہ ہے جو سو سالوں سے غور و فکر کے مرکز میں ہے ۔ بین الاقوامی سطح پر 1924میں اس وقت اسے لیکر پہل ہوئی تھی جب جینوا منشور میں بچوں کے حقوق کو منظوری دیتے ہوئے پانچ نکاتی پروگرام کا اعلان کیا گیا تھا ۔ اس کے چلتے بچہ مزدوری پر پابندی لگائی گئی ساتھ ہی بچوں کے لئے کچھ مخصوص حقوق کو منظوری دی گئی ۔

بھارت کے آئین میں بچوں کے حقوق کے حوالے موجود ہیں ۔ اس کی کئی دفعات بچوں کو انصاف فراہم کرتی ہیں ۔دفعہ(A)24 تعلیم کا بنیادی حق دیتی ہے ۔جبکہ رہنمائے اصول کے تحت یہ لازمی کیا گیا ہے کہ چھ سے چودھ برس تک بچوں کو ریاست مفت اور لازمی تعلیم مہیا کرائے گی ۔ اتنا ہی نہیں دفعہ 51(A) کے تحت بنیادی فرض کے طور یہ تجویز بھی 2002میں لائی گئی کہ سرپرست انہیں لازمی طور پر تعلیم دلائیں گے ۔ بین الاقوامی لیبر آرگنائزیشن چائلڈ لیبر کو بچے کی صحت اس کی تعلیم میں رکاوٹ ڈالنے اور اس کے استحصال کی شکل میں دیکھتا ہے ۔ آرگنائزیشن کی رپورٹ بتاتی ہے کہ 140ممالک میں 71دیش ایسے ہیں جہا ں بچوں سے مزدوری کرائی جاتی ہے ۔ان دیشوں میں بھارت بھی شامل ہے ۔ ننھے ہاتھوں میں بیڑی ، پٹاخے ، ماچس ، اینٹیں ، اسٹیل کا فرنیچر ، چمڑے سے بنے سامان، جوتے وغیرہ یہی سب دکھائی دیتے ہیں ۔قالین بنوائے جاتے ہیں ، کڑھائی کروائی جاتی ہے اور ریشم کے کپڑے بنوائے جاتے ہیں فائنڈنگ آن دا فارمس آف چائلڈ لیبر ، رپورٹ چونکانے والا خلاصہ کرتے ہوئے بتاتی ہے کہ ریشم کے تار خراب نہ ہوں اس لئے بچوں سے ہی یہ کام کرایا جاتا ہے ۔فلپائن میں بچوں سے کیلا ، ناریل ، تمباکو کی کھتیے کے کاموں کے ساتھ گہنے اور فحش فلموں میں استعمال ہونے والا سامان بھی بنوایا جاتا ہے جبکہ ہمارے پڑوسی ملک بنگلہ دیش میں چودہ مصنوعات کا ذکر کیا گیا ہے جن سے کمسن مزدور جڑے ہیں ۔

بچہ مزدوری پر پابندی لگانے کے لئے 1948کے کارخانہ ایکٹ کے علاوہ درجنوں قانون موجود ہیں ۔اس کے با وجود بچہ مزدوروں کی تعداد میں برابر اضافہ ہو رہا ہے ۔ کل مزدور طاقت میں پانچ فیصد حصہ چائلڈ لیبر کا ہے ۔ سرکاری اعداد و شمار کے مطابق دیش میں قریب 43لاکھ چائلڈ لیبر ہیں ۔ بچوں کے حقوق کے لئے کام کرنے والی تنظیم بچپن بچاؤ آندولن کا کہنا ہے کہ ایسے بچوں کی تعداد ایک کروڑ 17لاکھ ہے جس میں کام کرنے اور کام کی تلاش کرنے والے سبھی طرح کے بچہ مزدور شامل ہیں ۔پارلیمنٹ میں پیش کئے جانے والے چائلڈ لیبر ممانعت ترمیم بل 2012پر شک ظاہر کرتے ہوئے تنظیم کی جانب سے جاری سروے میں کہا گیا ہے کہ 2011کی مردم شماری کے مطابق 6سے 14برس کی عمر کے 3کروڑ 39لاکھ بچے اسکول کی پڑھائی بیچ میں ہی چھوڑچکے ہیں ۔ ایسے میں ان کا آسانی سے بچہ مزدور بننے کا شک ہے ۔ سب سے زیادہ چائلڈ لیبر کپڑا اور جوٹ کے کام میں ہیں ۔ اس کے بعد فٹوےئر اور ہوٹل ادیوگ میں ہیں ۔ ایسے بچوں کو مجوزہ قانون سے کوئی راحت نہیں ملنے والی ۔ رپورٹ کے مطابق چائلڈ لیبر کے 21فیصد معاملے گھر خاندان سے جڑے ادیوگ میں دکھائی دیتے ہیں۔ اس میں 14برس سے کم عمر کے 21فیصد بچے اپنے سرپرستوں یا رشتہ داروں کے کام میں ہاتھ بٹاتے ہیں جبکہ 14سے 17سال عمر کے 19فیصد بچے بھی ایسا ہی کررہے ہیں بل میں ایسے بچوں کی حفاظت کی کوئی تجویز نہیں ہے ۔ اس کے علاوہ بل میں خطرناک ادیوگ کی تعداد 86سے گھٹا کر تین کر دےئے جانے کی تجویز بھی چائلڈ لیبر کے لئے بے حد خطرناک ثابت ہو سکتی ہے ۔

ملک میں آئین لاگو ہوئے 65سال ہو گئے ۔لیکن بچہ مزدوری کی فکر سے دیش آزاد نہیں ہوا ۔ یونائیٹیڈ نیشن بچوں کے حقوق سمجھوتے کی دفعہ 32پر بھارت نے ابھی تک رضا مندی نہیں دی ہے ۔ جس میں چائلڈ لیبر کو جڑ سے ختم کرنے کی شرط شامل ہے ۔1992میں یوناٹیٹیڈ نیشن میں بھارت نے کہا تھا کہ اپنے معاشی انتظام کو دیکھتے ہوئے اس سمت میں رک رک قدم اٹھائیں گے اسے ایکدم نہیں روکا جا سکتا ۔23برس بیتنے کے بعد بھی دیش بچہ مزدوری سے اٹا پڑا ہے ۔اتنا ہی نہیں چائلڈ لیبر قانون کی ترمیم میں بھی نرمی دیکھنے کو مل رہی ہے ۔ تازہ معاملہ یہ ہے کہ تفریحی ادیوگ ، کھیل اور خاندانی کاروبار کو اس زمرے سے باہر رکھا گیا ہے اس لئے قانون میں بدلاؤ کے با وجد بچہ مزدوری کی گنجائش بنی رہے گی ۔ ساتھ ہی قانون میں یہ جوڑا گیا ہے کہ والدین بچوں کی پڑھائی اور صحت کا دھیان رکھیں گے کہ وہ متاثر نہ ہو۔سزا کے معاملہ میں بھی یہ ترمیم کافی حد تک ڈھیلا پن لئے ہوئے ہے۔ اس سے ماہرین اور بچوں کے لئے کام کرنے والی تنظیمیں فکر مند ہیں کہ حالات بہتر ہونے کے بجائے اور بد سے بدتر ہو سکتے ہیں ۔بچہ مزدوری کے معاملہ کے ساتھ استحصال اور روزگار کے کئی پہلو جڑے ہیں غیر قانونی کاروبار اور جسمانی استحصال کے شکار بھی زیادہ تر بچے ہی ہوتے ہیں اور اس کے پیچھے غریبی بڑی وجہ ہے۔ دو جون کی روٹی جٹانے کی کوشش میں بچہ مزدوری جنم لیتی ہے ۔چائلڈ لیبر کو پوری طرح ختم نہ ہونے دینے میں پونجی وادی سوچ بھی آڑے آرہی ہے ۔ جب تک کمزور ، غریب لوگوں کی مالی حالت کو بہتر بنانے اور بچو ں کو تعلیم سے جوڑنے کی کوشش نہیں کی جائے گی تب تک قانون لولے لنگڑے ہی ثابت ہوں گے ۔ چائلڈ لیبر کو ختم کرنے والے مثالی خیال بہت عمدہ ہو سکتے ہیں لیکن زمین پر بچپن پستا رہے گا ۔ ضرورت ہے کہ سرکار کے ساتھ سماج اس مسئلہ کے تئیں حساس ہو۔ ہر شخص کو آگے آکر ملک سے اس کلنک کو مٹانے کے لئے اپنی ذمہ داری ادا کرنی ہوگی کیونکہ بچپن بچے گا تبھی دیش ترقی کرے گا ۔

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Muzaffar Husain Ghazali
Lawyer by training, associate editor at Daily Urdu Net and editor at UNN India

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Muzaffar Husain Ghazali
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