दिल्ली के आर्कबिशप अनिल कूटो का पादरियों के नाम पत्र खासा हैरान करने वाला है। यह पूर्वाग्रह से प्रेरित और किसी गहरी राजनीतिक षडयंत्र का हिस्सा लगता है। अनिल कूटो लिखते हैं, ‘‘हमलोग अशांत राजनीतिक वातावरण का साक्षी बन रहे हैं। इसके कारण संविधान में वर्णित लोकतांत्रिक सिद्धांतों और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए संकट पैदा हो गया है। देश और राजनेताओं के लिए प्रार्थना करना हमारी पवित्र परम्परा है। आम चुनावों के समीप आने के कारण यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।’’इस पत्र में आर्कबिशप ने ईसाई समाज से हर शुक्रवार को उपवास करने कर भी अपील की है, ताकि देश में शांति, लोकतंत्र और भाईचारा कायम रहे। इस पत्र की भाषा से यह एक धर्मगुरु की नहीं, बल्कि एक राजनीतिक व्यक्ति की कूटनीतिक अपील ज्यादा लगती है। अब आर्कबिशप, उनका संगठन, उनके सहयोगी भले ही सफाई देते रहें कि इस पत्र का नरेंद्र मोदी और बीजेपी सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन, उनकी इस दलील के कोई खरीदार नहीं मिलेंगेमझदार लोगों को यह स्पष्ट हो जाता है कि वे ईसाई समाज से ईसाई सोनिया और उनके पुत्र के लिए अपील कर रहे हैं। पादरियों से उनकी अपील का एक-एक शब्द यह बताता है कि वह नहीं चाहते कि अगली सरकार किसी हालत में बीजेपी की हो। वह इसके लिए अपने समुदाय को प्रभावित करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। और निश्चित रूप से यह बात उनके जैसे एक आदरणीय पद पर बैठे व्यक्ति के लिए अनुचित ही नहीं, बल्कि शर्मनाक है। बताओ अपने पैमाने देश में अशांत राजनीतिक माहौल’ के उनके कौन-से पैमाने हैं, यह आर्कबिशप बेहतर जानते होंगे। लेकिन, यह सत्य है कि आज देश में एक ऐसी सरकार है, जो ‘सबका साथ सबका विकास’ के उद्देश्य से काम कर रही है। कोई भी सरकार कोई कल्याणकारी योजना लेकर आती है, आधारभूत ढांचे का विस्तार करती है, प्रशासन को चाक-चौबंद करती है, तो उसका फायदा सभी को मिलता है, न कि किसी खास जाति या समुदाय को। लेकिन पिछले चार सालों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है कि वर्तमान सरकार में भारत अल्पसंख्यकों के लिए रहने लायक जगह नहीं रह गया है। पिछले तीन-चार सालों में कुछ खास तरह के लोगों के बयानों पर अगर गौर करें तो एक भयानक तस्वीर आंखों के सामने आने लगती है। अगर आप जमीनी सच्चाई से नावाकिफ हों तो आप निश्चित रूप से डर से जाएंगे। आर्कबिशप अनिल कूटो का ‘अशांत राजनीतिक माहौल’ और ‘लोकतांत्रिक सिद्धांतों और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए संकट’ से संबंधित पत्र भी इसी घोर षड्यंत्र की एक कड़ी लगती है। पिछले चार सालों में हुई हर छोटी या बड़ी आपराधिक घटना को साम्प्रदायिक या जातिवादी रंग देने की लगातार कोशिशें की जा रही हैं। यह खेल देश के लिए खतरनाक है। सच्चाई तो यह है कि ऐसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं। बल्कि कांग्रेस के शासन कल में कहीं ज्यादा होती रही हैं। सभी चाहेंगे कि आपराधिक घटनाएं रुकनी चाहिए और उन्हें रोकना सरकार का प्राथमिक दायित्व है। मोदी सरकार पूरे प्राणपण से इसमें लगी हुई है। इन घटनाओं में कई घटनाएं ऐसी हैं, जिनके झूठ सामने भी आ चुके हैं। उदाहरण के तौर पर 2015 जनवरी में पश्चिमी दिल्ली के विकासपुरी में एक चर्च में तोड़फोड़ हुई। इस घटना को ईसाइयों के प्रति बढ़ती हिंदुओं की घृणा का जामा पहना कर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया। जांच में पता चला कि एक सिख युवक ने अपने दोस्त द्वारा चर्च को नुकसान पहुंचाने के चैलेंज को पूरा करने के लिए यह दुस्साहस किया था।

इस घटना के लिए तीन युवकों को गिरफ्तार किया गया। इस काम को अंजाम देते समय तीनों नशे की हालत में थे। उनका इरादा किसी की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने का नहीं था, और न ही वे किसी रातनीतिक या धार्मिक संगठन से जुड़े थे। तब आर्कबिशप अनिल कूटो ने ही पुलिस द्वारा की गई त्वरित कार्रवाई की सराहना की थी। इसी तरह 2015 फरवरी में दिल्ली के वसंत विहार के एक कॉन्वेंट स्कूल में प्रिंसीपल के ऑफिस की खिड़की तोड़ कर किसी ने 12,000 रुपये चुरा लिए। इस घटना को भी शुरू में तोड़-फोड़ और ईसाई समुदाय के प्रति असहिष्णुता से जोड़ दिया गया। बाद में जांच में पता चला कि यह न तो तोड़-फोड़ की कार्रवाई थी और न ही इसमें ईसाइयों के किसी भी धार्मिक प्रतीक को नुकसान पहुंचाया गया था। यह शुद्ध रूप से एक चोरी की एक घटना थी। तब हिन्दुस्तान, अब ‘लिंचिस्तान’ इसी तरह कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार के 10 वर्षों के कार्यकाल में एक वर्ष 2013 को लेते हैं। मोदी सरकार के सत्तासीन होने से ठीक पहले का वर्ष। इस साल लिंचिंग (लोगों को पीट-पीट कर मार डालना) की कम से कम 15 घटनाएं हुई थीं, जिसमें डेढ़ दर्जन लोग मारे गए थे। तब यह देश हिन्दुस्तान था, अब ‘लिंचिस्तान’ हो गया। सिर्फ एक-दो घटनाओं की वजह से। इस ‘सेलेक्टिव सोच’ पर क्या कहा जा सकता है! 2015 अप्रैल में एक 72 वर्षीय नन का गैंगरेप हुआ, यह आरोप भी ‘भगवा ब्रिगेड’ के माथे पर मढ़ दिया गया। फिर पश्चिम बंगाल पुलिस ने इस मामले में कई बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया, तब जाकर असली बात सामने आई। इन उदाहरणों से उपर्युक्त अपराधों की गंभीरता को कम करके आंकने या उनका औचित्य सही ठहराने की कोशिश नहीं की जा रही है। न ही ये आंकड़े इसलिए दिए गए हैं, ताकि इस बात को साबित किया जा सके कि फलां सरकार में ऐसी घटनाएं कम हुई हैं और फलां सरकार में ज्यादा हुई हैं। इनका उद्देश्य सिर्फ ये है कि ऐसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं, इसलिए उन्हें किसी खास चश्मे से देखने की बजाय उनके निराकरण का प्रयास करना ज्यादा उचित होगा। और बाह्य व आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों तथा अपराधों से निपटने को लेकर मोदी सरकार जितनी संवेदनशील है, उतनी शायद ही किसी सरकार ने पूर्व के काल में किया है। लिहाजा ऐसी घटनाओं को खास रंग देकर पेश करने का मतलब समझने के लिए किसी खुर्दबीन की आवश्यकता नहीं है। किसी पार्टी या सरकार का विरोध करते-करते कुछ लोग कब देश-विरोध में शामिल हो जा रहे हैं, शायद उन्हें भी इसका पता नहीं चल पा रहा है। अगर राजनीतिक स्वार्थों के वशीभूत जिम्मेदार लोग ‘’मेरी पत्नी देश छोड़ कर चली जाना चाहती थी’’और ‘‘देश में अशांत राजनीतिक माहौल है’’जैसी टिप्पणियां करेंगे तो देश की साख को नुकसान पहुंचना तय है। सरकारें आएंगी जाएंगी, राजनीतिक दल सत्ता में आते रहेंगे, जाते रहेंगे, लेकिन यह देश तो हमेशा रहेगा। इसे तोड़कर टुकड़े-टुकड़े करने वाले नारे लगाते-लगाते मर भले जाएं, यह देश कभी भी न बटेंगा, न ही किसी समुदाय के लिए असुरक्षित या असहिष्णु होगा । हालांकि कें‎द्रीय गृहमंत्री ने 2015 फरवरी में ईसाई समुदाय को आश्वस्त भी किया था।

वहीं 2015 मई में वित्त मंत्री ईसाई पादरियों के प्रतिनिधिमंडल से मिले थे और उनकी शिकायतें सुनी थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जून 2015 में मुस्लिम नेताओं के प्रतिनिधिमंडल से मिले थे और उन्हें आश्वस्त किया था कि उनके मसलों पर गौर करने के लिए वह रात के 12 बजे भी हाजिर रहेंगे। अपने चार सालों के कार्यकाल में मोदी सरकार ने अपने इस संकल्प को बार-बार दोहराया है कि यह सरकार देश के 125 करोड़ लोगों की सरकार है। सरकार बिना किसी भेदभाव के अपने इस संकल्प पर अमल भी कर रही है। अल्पसंख्यक समुदाय के लिए विशेष योजनाएं, किसानों व महिलाओं के सशक्तीकरण लिए विशेष योजनाएं, दलितों व पिछड़ों के लिए विशेष योजनाएं, 50 करोड़ से ज्यादा लोगों को कवर करने वाली स्वास्थ्य बीमा, आधारभूत ढांचा का तेजी से विस्तार जैसी विकास की निरंतर गतिविधियां सरकार की नीतियों और नीयत की तस्वीर बयां करती है। इन कल्याणकारी योजनाओं में मोदी सरकार ने कई अन्य सरकारों की तरह जाति, धर्म, समुदाय से कोई भेदभाव नहीं किया है। सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से लेकर उनके सशक्तीकरण की तमाम कोशिशों के बावजूद अगर आर्कबिशप को देश में ‘अशांत राजनीतिक माहौल’ और ‘लोकतांत्रिक सिद्धांतों और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर संकट’ दिखाई देता है तो इससे किसी और चीज की बू आती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनका कोई पूर्वनिर्धारित एजेंडा इस सरकार की वजह से बाधित हो रहा है, जिसे पूर्व की सरकारों के दौरान पूरा करने में कोई बाधा नहीं आती थी, बल्कि यूं कहें कि सहूलियतें मिल जाती थीं।