अक्षय तृतीया, परशुराम जयन्ती तथा बाँकेबिहारी वृन्दावन चरण दर्शन

भगवान् श्रीकृष्ण ने भविष्यपुराण में बुधवार और रोहिणी नक्षत्र युक्त वैशाख शुक्ल तृतीया की अतिविशेष प्रशंसा की है। यह संयोग वर्षों बाद मिलता है। पहले हमें वर्ष 2008 में मिला था और अब वर्ष 2025 में मिलेगा। परन्तु मत्स्यपुराण में भगवान् शंकर ने कृत्तिका नक्षत्र युक्त वैशाख शुक्ल तृतीया भी विशेषरूप से पूज्य बताई है।

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इस वर्ष अक्षयतृतीया बुधवार और कृत्तिका नक्षत्र युक्त है। भगवान् श्रीकृष्ण ने भविष्यपुराण में बुधवार और रोहिणी नक्षत्र युक्त वैशाख शुक्ल तृतीया की अतिविशेष प्रशंसा की है। यह संयोग वर्षों बाद मिलता है। पहले हमें वर्ष 2008 में मिला था और अब वर्ष 2025 में मिलेगा। परन्तु मत्स्यपुराण में भगवान् शंकर ने कृत्तिका नक्षत्र युक्त वैशाख शुक्ल तृतीया भी विशेषरूप से पूज्य बताई है।

वैशाखशुक्लपक्षे तु तृतीया यै रुपोषिता। अक्षयं फलमाप्नोति सर्वस्य सुकृतस्य च॥
सा तथा कृत्तिकोपेता विशेषेण सुपूजिता। तत्र दत्तं हुतं जप्तं सर्वमक्षयमुच्यते॥

वैशाख मास की कृत्तिका/रोहिणी युक्त शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया कहलाती है। ‘अक्षय’ शब्द का मतलब है जिसका क्षय या नाश न हो। इस दिन किया हुआ जप, तप, ज्ञान तथा दान अक्षय फल देने वाला होता है अतः इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहते हैं।

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वैशाखे मासि राजेन्द्र! शुक्लपक्षे तृतीयिका। अक्षया सा तिथिः प्रोक्ता कृत्तिकारोहिणीयुता। तस्यां दानादिकं सर्व्वमक्षयं समुदाहृतमिति

भविष्यपुराण, मत्स्यपुराण, पद्मपुराण, विष्णुधर्मोत्तर पुराण, स्कन्दपुराण में इस तिथि का विशेष उल्लेख है। इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं, उनका बड़ा ही श्रेष्ठ फल मिलता है। इस दिन सभी देवताओं व पित्तरों का पूजन किया जाता है। पित्तरों का श्राद्ध कर धर्मघट दान किए जाने का उल्लेख शास्त्रों में है। वैशाख मास भगवान विष्णु को अतिप्रिय है अतः विशेषतः विष्णु जी की पूजा करें।

एक वर्ष में अक्षय तृतीया ही एक मात्र ऐसा समय है जब सूर्य था चन्द्र दोनों अपनी उच्च राशि में होते हैं।

भविष्यपुराण, ब्राह्मपर्व, अध्याय 21 के अनुसार

वैशाखे मासि राजेन्द्र तृतीया चन्दनस्य च। वारिणा तुष्यते वेधा मोदकैर्भीम एव हि ॥
दानात्तु चन्दनस्येह कञ्जजो नात्र संशयः। यात्वेषा कुरुशार्दूल वैशाखे मासि वै तिथिः॥
तृतीया साऽक्षया लोके गीर्वाणैरभिनन्दिता। आगतेयं महाबाहो भूरि चन्द्रं वसुव्रता॥
कलधौतं तथान्नं च घृतं चापि विशेषतः। यद्यद्दत्तं त्वक्षयं स्यात्तेनेयमक्षया स्मृता॥
यत्किञ्चिद्दीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु। तत्सर्वमक्षयं स्याद्वै तेनेयमक्षया स्मृता॥
योऽस्यां ददाति करकन्वारिबीजसमन्वितान्। स याति पुरुषो वीर लोकं वै हेममालिनः॥
इत्येषा कथिता वीर तृतीया तिथिरुत्तमा। यामुपोष्य नरो राजन्नृद्धिं वृद्धिं श्रियं भजेत्॥

वैशाख मास की तृतीया को चन्दनमिश्रित जल तथा मोदक के दान से ब्रह्मा तथा सभी देवता प्रसन्न होते हैं । देवताओं ने वैशाख मास की तृतीया को अक्षय तृतीया कहा है । इस दिन अन्न-वस्त्र-भोजन-सुवर्ण और जल आदि का दान करनेसे अक्षय फल की प्राप्ति होती है । इसी तृतीया के दिन जो कुछ भी दान किया जाता है वह अक्षय हो जाता है और दान देनेवाले सूर्यलोक को प्राप्त करता है । इस तिथि को जो उपवास करता है वह ऋद्धि-वृद्धि और श्री से सम्पन्न हो जाता है ।

स्कन्दपुराण के अनुसार, जो मनुष्य अक्षय तृतीया को सूर्योदय काल में प्रातः स्नान करते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करके कथा सुनते हैं, वे मोक्ष के भागी होते हैं। जो उस दिन मधुसूदन की प्रसन्नता के लिए दान करते हैं, उनका वह पुण्यकर्म भगवान की आज्ञा से अक्षय फल देता है।

भविष्यपुराण के मध्यमपर्व में कहा गया है

वैशाखे शुक्लपक्षे तु तृतीयायां तथैव च।
गंगातोये नरः स्नात्वा मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥

वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया में गंगाजी में स्नान करनेवाला सब पापों से मुक्त हो जाता हैं । वैशाख मास की तृतीया स्वाती नक्षत्र और माघ की तृतीया रोहिणीयुक्त हो तथा आश्विन तृतीया वृषराशि से युक्त हो तो उसमें जो भी दान दिया जाता है, वह अक्षय होता है । विशेषरूप से इनमें हविष्यान्न एवं मोदक देनेसे अधिक लाभ होता है तथा गुड़ और कर्पुरसे युक्त जलदान करनेवाले की विद्वान् पुरुष अधिक प्रंशसा करते हैं, वह मनुष्य ब्रह्मलोक में पूजित होता हैं । यदि बुधवार और श्रवण से युक्त तृतीया हो तो उसमें स्नान और उपवास करनेसे अनंत फल प्राप्त होता हैं।

भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठरसे कहते हैं

अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिश्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यै:। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥

हे राजन इस तिथिपर किए गए दान व हवन का क्षय नहीं होता है, इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहा है । इस तिथि पर भगवान की कृपादृष्टि पाने एवं पितरों की गति के लिए की गई विधियां अक्षय-अविनाशी होती हैं।

परशुराम जन्म

वैशाखस्य सिते पक्षे तृतीयायां पुनर्वसौ । निशायाः प्रथमे यामे रामाख्यः समये हरिः॥
स्वोच्चगैः षड्ग्रहैर्युक्ते मिथुने राहुसंस्थिते । रेणुकायास्तु यो गर्भादवतीर्णों विभुः स्वयम्॥

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में रात्रि के प्रथम प्रहर मे उच्च के छः ग्रहो से युक्त मिथुन राशि पर राहू के स्थित रहते, भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि की पत्नी रेणुका के गर्भ से हुआ।

अक्षय तृतीया का महत्त्व

अक्षय तृतीया से ही त्रेतायुग का आरंभ हुआ था, जो भगवान श्रीराम की लीला के लिए स्मरण किया जाता है। यही कारण है कि यह ‘युगादि तृतीया’ भी कहलाती है।

भगवान विष्णु के दशा अवतार में से पंचम अवतरण श्री परशुराम का अवतरण भी आज ही हुआ था। यह परशुराम तिथि भी कहलाती है। इसी दिन भगवान विष्णु ह्यग्रीव रूप में अवतरित हुए। महर्षि वेदव्यास ने इस दिन महाभारत की रचना प्रारंभ की थी जिसे भगवान गणेश ने लिपिबद्ध किया था। पांडवों के वनवास के दौरान भगवान कृष्ण ने उन्हे अक्षयपात्र दिया था जिससे अन्न का कभी क्षय नहीं होता। श्री कृष्ण ने इस दिन अपने बाल सखा सुदामा की सहायता की थी और उन्हे दरिद्रता से मुक्त कराया था। कुबेर ने शिवपुरम में इस दिन भगवान शिव की पूजा करके अपनी समृद्धि वापस पायी थी। इसी शुभ घड़ी में भगवान विष्णु ने नर-नारायण अवतार लिया। आज ही श्री बद्रीनारायण & केदारनाथ धाम के पट खुलते हैं।

वृंदावन के श्री बाँके-बिहारीजी के मंदिर में केवल इसी दिन श्रीविग्रह के चरण-दर्शन होते हैं अन्यथा पूरे वर्ष वस्त्रों से ढँके रहते हैं।

अक्षय तृतीया के दिन क्या करें

‘निर्णय सिन्धु’ में वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया में गंगा स्नान का महत्त्व बताया है।

बैशाखे शुक्लपक्षे तु तृतीयायां तथैव च । गंगातोये नर: स्नात्वा मुच्यते सर्वकिल्विषै:॥

आज के दिन कोई भी काम शुरू करने का अबूझ मुहूर्त होता है। शुभ, पूजनीय नवीन कार्य जैसे मूर्ति स्थापना ग्रह प्रवेश कार्य इस दिन होते हैं, जिनसे प्राणियों (मनुष्यों) का जीवन धन्य हो जाता है। ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

जो मनुष्य वैशाख शुक्ल की तृतीया को चंदन से श्रीकृष्ण को भूषित करता और पूजन करता है,वह वैकुण्ठ को प्राप्त होता है। इस दिन वृन्दावन में बांके बिहारी के चरण दर्शन करना अत्यंत शुभ होता है। अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे कलश, पंखा, चावल, नमक, घी, चीनी, सब्जी, फल, इमली, खरबूज, तरबूज, चरणपादुकायें (खड़ाऊँ), जूता, छाता और वस्त्र का दान अच्छा माना जाता है।

इस दिन सत्तू खाना चाहिए। चावल और मूंग की दाल खानी चाहिए। जो मनुष्य इस दिन नदी, पवित्र सरोवर अथवा सागर स्नान करता है, उसे पापों से मुक्ति मिलती है।

श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि यह तिथि परम पुण्यमय है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम, स्वाध्याय, पितृ-तर्पण तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है। आज के दिन नवीन वस्त्र, शस्त्र, आभूषणादि बनवाना या धारण करना चाहिए।

आज से शुरू करके प्रत्येक बुधवार 108 कमलगटटे के बीज लेकर घी के साथ एक-एक करके अग्नि में 108 आहुतियां दें। ऐसा कम 1 वर्ष करें। घर से दरिद्रता हमेशा के लिए चली जायेगी।

अक्षय तृतीया के पर्व पर लक्ष्मी जी की आराधना से धन में स्थायित्व आता है & जीवन पर्यंत धन की कमी नहीं रहती, व्यापार वृद्धि, पर्याप्त धनार्जन के पश्चात् भी धन संचय न होना, आर्थिक उन्नति के लिए, ऋण, दरिद्रता दूर करने के लिए अक्षय तृतीया के दिन लक्ष्मी जी की मंत्र-जप से आराधना करें ताकि धन-धान्य से घर अक्षुण बना रहे।

अक्षय तृतीया के दिन आप कौन कौन सी शुभ चीजें घर ला सकते हैं।

पूजा के लिए रुद्राक्ष, श्वेतार्क गणपति, श्री यन्त्र, पारद शिवलिंग, मूर्ती, माला आदि। साधारण वस्तुएं, ताम्बे की थालियाँ, लोटा, सोने चाँदी के आभूषण व बर्तन, श्रृंगार अथवा सौंदर्य प्रसाधन, कोई भी ऐसा सामान जिसको आप लम्बे समय के लिए घर में रखना चाहते हैं।

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ज्योतिषशास्त्र, पुराण, धर्मशास्त्र अध्ययन और उनकी समीक्षा में विशेष रुचि, विज्ञान और तकनीकी से स्नातक, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत, ग़ाज़ियाबाद, उत्तरप्रदेश-निवासी