गांधी की पैरवी भाजपा का पाखण्ड

यह देश भर में घूमे हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक मोदी से बेहतर कौन जान सकता है कि गांधी के प्रति देशवासियों के मन में इतना आदर नहीं है जितना सरकार द्वारा उनपर थोपा जाता है?

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भारतीय जनता पार्टी की भोपाल लोकसभा सीट से प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर द्वारा मोहनदास करमचंद गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की प्रशंसा से मानो देश की राजनीति पर कल पहाड़ टूट पड़ा था। विपक्ष की आलोचना के उस ‘पहाड़’ के मलबे से निकलकर आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने प्रज्ञा ठाकुर के कथन की निंदा की, पार्टी के अन्य नेता अनंत हेगड़े व नलिन कटील की भर्त्सना की और अनिल सौमित्र को निलंबित भी कर दिया। हालांकि अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही प्रधानमंत्री मोदी गांधी के पैरोकार रहे हैं, यह देश भर में घूमे हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक मोदी से बेहतर कौन जान सकता है कि गांधी के प्रति देशवासियों के मन में इतना आदर नहीं है जितना सरकार द्वारा उनपर थोपा जाता है? हाँ, गुजराती होने के नाते राज्य से निकले ऐतिहासिक चरित्र गांधी के प्रति लगाव होना स्वाभाविक है। यह बात और है कि संघ ने आज से लगभग आठ साल पहले एक रणनीति बनाई जिसके तहत गांधी के हिंद स्वराज का नए सिरे से विमोचन किया गया और भाजपा के सत्ता में आने के बाद से प्रधानमंत्री मोदी को भी यह सूझा कि भाजपा के मूल समर्थकों से परे भी कुछ वोट-बैंक हैं जिन्हें हथियाना सत्ता में बने रहने के लिए आवश्यक है। ऐसे दो वोट बैंकों की पहचान की गई — गांधीवादी बुज़ुर्ग और ‘हमारे सारे काम सरकार कर दे’ ऐसी मानसिकता वाले अकर्मण्य समाजवादी। नतीजे में यह तो सुनिश्चित हो गया कि भाजपा पर लगा ब्राह्मण-बनिया पार्टी का ठप्पा हट गया, प्रमोद महाजन के ज़माने का लांछन कि भाजपा अम्बानी परिवार की हितैषी है भी दूर हो गया और एक के बाद एक राज्य में चुनाव के समय विपक्ष को समझ में नहीं आया कि इस मोदी का सामना कैसे करें जो वामपंथी भी उतने ही हैं जितने कि दक्षिणपंथी! पर दूसरी तरफ़ देश में राजनैतिक विकल्प नामक कोई चीज़ बची नहीं। कांग्रेस काल के आये दिन के भ्रष्टाचार के आरोप का मुद्दा हटा दें तो मोदी सरकार को अधिक से अधिक भगवा कांग्रेस सरकार कहा जा सकता है।

यह विडम्बना इसलिए भी है क्योंकि संघ की शाखाओं के शिक्षाक्रम में न सही, संघ के स्वयंसेवकों में गांधी के प्रति कोई विशेष प्रेम नहीं है। और मोदी उसी पाठशाला से निकले हुए हैं जो अभी अपने अतीत को झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे इतिहास के प्रति भी अन्याय हो रहा है। किसी भी देश में अतीत के किसी बहुचर्चित चरित्र का न तो महिमामंडन होना चाहिए और न ही उसका अतिरिक्त तिरस्कार होना चाहिए। इससे सकारात्मक पात्रों के कुछ विकार और नकारात्मक पात्रों के कुछ गुण मिथ्यावाद के अंधकार में खो जाते हैं। बोअर की लड़ाई में उपनिवेशी ताक़त का साथ देना, एडवर्ड को चिट्ठी में अपना स्वामी बताना, शरण में आई दो महिलाओं को अपने साथ नग्न अवस्था में सोने पर मजबूर करना, इत्यादि गांधी के कुछ ऐसे कुकृत्य हैं जिनकी निंदा होनी ही चाहिए। पाकिस्तान के प्रति नरमी का रुख़ एक अलग विषय है जिसमें गोडसे का प्रसंग आता है।

गोडसे का सन्दर्भ हो तो पहले भारत की विदेश नीति से चर्चा शुरू करना लाज़मी है। यदि गांधी का पाकिस्तान के प्रति नरमी का रवैया सही था तो मोदी सरकार ‘अमन की आशा’ गिरोह के विरुद्ध क्यों है? यदि गोडसे के अदालत में दिए तर्क निहायत ही बकवास थे तो बरसों तक उनके बयान को प्रकाशित होने से क्यों रोका गया? क्या देश की जनता इतनी बेवक़ूफ़ थी कि उसके पास उन तर्कों की कोई काट होना नामुमकिन था? जब कि भारत में हुए हर नरसंहार की तीव्र निंदा होती है, गोडसे के अपराध के बाद हुए ब्राह्मणों पर अत्याचार इतिहास के पन्नों से नदारद क्यों हैं? अंततोगत्वा इसपर विचार होना चाहिए कि यदि गोडसे 30 जनवरी 1948 का काण्ड नहीं करते तो गांधी जनमानस में कब तक निरंकुश देवता बने रहते? ये परेशान करने वाले सवाल हैं जिनका जवाब दे दिया जाए तो गांधी के नाम से जो धड़ल्ले से व्यापार चलाया जाता है वह ठप्प हो जाएगा। भारतीय मुद्रा पर मुद्रित उनकी छवि से लेकर महात्मा गांधी NREGA जैसी योजना, हज़ारों की संख्या में उनपर लिखी गई किताबों से लेकर उनके नाम पर बने विश्वविद्यालय, शोधगृह, कार्यशाला और एनजीओ तक प्रश्न के घेरे में आ जायेंगे। और यदि उन्हें वर्तमान और भविष्य में भी देवता बनाए रखना है तो हर आर्थिक, देशीय और विदेश नीति पर यह सवाल उठाना होगा कि वह गांधी के मापदंड पर कहाँ तक खरा उतरता है।

फ़िलहाल आलम यह है कि गांधी पर दोहरी नीति के कारण देश के वोटरों के पास कोई विकल्प नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा, पार्टी के 11 करोड़ से अधिक सदस्य और करोड़ों समर्थक इस बात पर भी चिंतन-मनन करें कि यदि यह सरकार वैचारिक रूप से कम-ओ-बेश कांग्रेसी नहीं होती और यदि अपनी अलग विचारधारा को स्पष्ट रूप देकर देश भर में उसे ग्रहण-योग्य बनाने की कोशिश होती तो 23 मई के लोकसभा चुनाव के परिणाम के बारे में किसी के मन में कोई शंका नहीं होती। हुआ तो यह है कि भाजपा को जिन्होंने वोट दिया है उन्होंने भी भाजपा के गुणों के क़ायल होकर नहीं बल्कि सोनिया-राहुल-ममता-मायावती-स्टॅलिन की सरकार बन जाने के दुःस्वप्न से बचने के लिए कमल के निशान पर बटन दबाया है। मोदी सरकार की मानसिकता पर गांधी के भूत सवार न होते तो ‘कांग्रेस और भाजपा अलग हैं’ इस निष्कर्ष पर पहुँचना आसान होता।

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