ज्येष्ठ की तिरस्कार से पुरस्कार की ओर प्रगति

अधिकमास ने नारायण से प्रार्थना की कि प्रत्येक मास का एक स्वामी होता है परन्तु मेरा कोई स्वामी नहीं है जिस कारण सभी मुझे मलमास, मलिम्लुच आदि नामों से पुकारते हैं और सभी प्रकार के मांगलिक कार्य, शुभ एवं पितृकार्य वर्जित किये हैं

0

सम्वत् 2075 में ज्येष्ठ मास अधिक मास है। जैसा की नाम से ही विदित है यह मास सामान्य 12 मास से अतिरिक्त है। इसको मलमास, पुरुषोत्तम मास नाम से भी जाना जाता है। परन्तु क्या प्रत्येक मलमास, अधिक मास है? मलमास कहते किसे हैं? मल नाम सुनते ही मानव मल की भावना आती है फिर अधिकमास को पुरुषोत्तम मास क्यों कहते हैं? ऐसे अनेक प्रश्नों का उत्तर ज्ञात करने करने के लिए हमको अपने धर्मग्रंथों का गहनता पूर्वक अध्ययन करना होगा। मैं आपके समक्ष कुछ तथ्य प्रस्तुत कर इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास कर रहा हूँ।

क्या होता है मलमास

मलं वदन्ति कालस्य मासं कालविदोऽधिकम्

Ad I

मलमास काल का मल है। “मल” और “मास” की संधि से मलमास बनता है। मास का सीधा अर्थ महीने से है जो काल मापन की एक इकाई है। नौ प्रकार के मास होते हैं परन्तु चतुर्भिव्यर्वहारोSत्र सूर्यसिद्धांत के वचन से चार मास चान्द्र, सौर, सावन और नाक्षत्र मास से ही व्यवहार होता है।

तत्रोक्तं मलम् अर्थात् विकारः

मल विकार है। प्रश्न है कैसा विकार? “मलमासोऽयं सौरचान्द्रमासयोः विकारः” अर्थात सौरमास और चंद्रमास से विकार स्वरुप मलमास की उत्पत्ति होती है। विकार के बारे में आगे समझेंगे। मलमास दो प्रकार का है

  1. अधिकमास
  2. क्षयमास

सिद्धांतशिरोमणि के अनुसार “यस्मिन्मासे न सङ्क्रान्ति सङ्क्रान्तिद्वयमेव वा। मलमासः स विज्ञेयः” अधिकमास और क्षयमास दोनों में विकार है। एक संक्रांति रहित है और दूसरा दो संक्रांति से युक्त। अधिकमास संक्रान्ति रहित है “संक्रान्तिरहितो मासोऽधिमासः” और क्षयमास दो संक्रान्ति से युक्त है “संक्रांतिद्वययुक्तो मासः क्षयमासः”। इस विकार के कारण इनका नामकरण मलमास किया गया है।

एक अन्य मत के अनुसार

शकुन्यादिचतुष्कं तु रवेर्मलमुदाहतम्। तदुर्ध्वं क्रमते भानोर्मासः स्यात्तु मलिम्लुचः।। [शकुनि, चतुष्पद, नाग व किंस्तुघ्न ये चार करण, सूर्य का मल कहा गया है, इसलिए इनके अनन्तर यदि सूर्य का संक्रमण हो तो अधिक मास होता है]

मलमास को असंक्रान्तमास, मलिम्लुच, संसर्प, अंहस्पति या अंहसस्पति के नाम से भी जाना जाता है। यह विकार उत्पन्न कैसे होता है?

सौर-वर्ष का मान ३६५ दिन, १५ घड़ी, २२ पल और ५७ विपल हैं। जबकि चांद्रवर्ष ३५४ दिन, २२ घड़ी, १ पल और २३ विपल का होता है। इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष १० दिन, ५३ घटी, २१ पल (अर्थात लगभग ११ दिन) का अन्तर पड़ता है। सौर वर्ष और चांद्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करना परम आवश्यक है। यह सामंजस्य स्थापित करने के लिए हर तीसरे वर्ष हिन्दू पंचांग में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। यही अधिक मास है। वस्तुतः यह स्थिति स्वयं ही उत्पन्न हो जाती है जब चंद्रमास संक्रांति रहित हो जाती है।

मलमास का द्वितीय प्रकार क्षयमास है जिसमें दो संक्रांति होती हैं। यह अभी हमारे लेख का विषय नहीं है।

अब अधिकमास और और चर्चा कर लेते हैं। अधिकमास में सभी मांगलिक कार्य, महोत्सव, प्रतिष्ठा, यज्ञ आदि वर्जित हैं। पुराणों में वर्णन आया है की अधिकमास की उत्पत्ति होने पर यह सभी से तिरस्कृत हुआ और दुःखी होकर विष्णुलोक गया। वहाँ अधिकमास ने नारायण से प्रार्थना की कि प्रत्येक मास का एक स्वामी होता है परन्तु मेरा कोई स्वामी नहीं है जिस कारण सभी मुझे मलमास, मलिम्लुच आदि नामों से पुकारते हैं और सभी प्रकार के मांगलिक कार्य, शुभ एवं पितृकार्य वर्जित किये हैं। तब भगवान् विष्णु ने अधिकमास को अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया और यह पुरुषोत्तम मास कहलाया।

श्रीनारायण कहते हैं

गुणैःकीर्त्याऽनुभावेन षड्भगैश्च पराक्रमैः ॥ भक्तानां वरदानेन गुणैरन्यैश्च मासकैः॥
अहमेतैर्यथालोके प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ तथाऽयमपि लोकेषु प्रथितः पुरुषोत्तमः॥

गुणों से, कीर्ति के अनुभाव से, षडैश्वयर्य से, पराक्रम से, भक्तों को वर देने से और भी जो मेरे गुण हैं, उनसे मैं पुरुषोत्तम जैसे लोक में प्रसिद्ध हूँ। वैसे ही यह मलमास भी लोकों में पुरुषोत्तम करके प्रसिद्ध होगा ॥

पुरुषोत्तम मास के स्वामी दयासागर पुरुषोत्तम ही हैं —

पुरुषोत्तमेति मासस्य नामाप्यस्ति सहेतुकम् ॥ तस्य स्वामी कृपासिन्धु पुरुषोत्तम उच्यते

श्रीभगवान कहते हैं

एतन्नाम्ना जगत्सर्वं पवित्रं च भविष्यसि ॥ मत्सादृश्यवमुपागम्य मासानामधिपो भवेत् ॥
जगत्पूज्यो जगद्वन्द्यो मासोऽयं तु भविष्यति ॥ पूजकानां च सर्वेषां दुःखदारिद्रयखण्डनः ॥
सर्वे मासाः सकामाश्च निष्कामोऽयं मया कृतः ॥ मोक्षदः सर्वलोकानां मत्तुल्योऽयं मया कृतः ॥
अकामः सर्वकामो वा योऽधिमासं प्रपूजयेत् ॥ कर्माणि भस्मसात्कृऽत्वा मामेवैष्यत्यसंशयम् ॥

इसके पुरुषोत्तम इस नाम से सब जगत् पवित्र होगा। मेरी समानता पाकर यह अधिमास सब मासों का राजा होगा। यह अधिमास जगत्पूज्य एवं जगत् से वन्दना करवाने के योग्य होगा। इसकी पूजा और व्रत जो करेंगे उनके दुःख और दारिद्रय का नाश होगा। चैत्रादि सब मास सकाम हैं इसको हमने निष्काम किया है। इसको हमने अपने समान समस्त प्राणियों को मोक्ष देने वाला बनाया है। जो प्राणी सकाम अथवा निष्काम होकर अधिमास का पूजन करेगा वह अपने सब कर्मों को भस्म कर निश्चय मुझको प्राप्त होगा।

श्रीभगवान यह भी कहते हैं हल से खेत में बोये हुए बीज जैसे करोड़ों गुणा बढ़ते हैं तैसे मेरे पुरुषोत्तम मास में किया हुआ पुण्य करोड़ों गुणा अधिक होता है।

सीतानिक्षिप्तबीजानिवर्धन्ते कोटिशो यथा ॥ तथा कोटिगुणं पुण्यं कृतं मे पुरुषोत्तमे ॥

आप सभी अधिकमास में अधिक से अधिक श्रीमद्भागवत, रामकथा, गीता आदि का श्रवण करें। अधिक से अधिक पुण्यकर्म करें। गंगास्नान करें। अधिकमास पर अगला लेख शीघ्र ही आपके समक्ष उपस्थित करेंगे।

Ad B
Previous articleAishwarya or Deepika may star in Shah Rukh Khan’s Salute
Next article‘India-Russia relations can’t be dictated by a third country’
ज्योतिषशास्त्र, पुराण, धर्मशास्त्र अध्ययन और उनकी समीक्षा में विशेष रुचि, विज्ञान और तकनीकी से स्नातक, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत, ग़ाज़ियाबाद, उत्तरप्रदेश-निवासी