भारत के पुराने सीमांत पर करीब पांच करोड़ पठान बसे हुए हैं। इनमें से लगभग साढ़े तीन करोड़ पाकिस्तान में हैं और डेढ़ करोड़ अफगानिस्तान में। पठानों को आमतौर पर खूंखार और अनियंत्रित कबीलाई लोग बताया जाता है। लेकिन सभी कबीलाई लोगों की तरह वे आंतरिक कबीलाई नियमों से चलने वाली एक नैतिक व्यवस्था में निष्ठा रखते हैं और किसी बाहरी शासन की जोर-जबरदस्ती बर्दाश्त नहीं करते। पुराने हिंदू राजाओं को इस क्षेत्र पर शासन करने में कभी समस्या नहीं हुई थी। लेकिन दसवीं शताब्दी के बाद वे इस्लाम के दबाव में आ गए और बाद में तुर्क और ईरानी इस क्षेत्र में कब्जा करके बैठ गए। जब भारत अंग्रेजों के नियंत्रण में चला गया तो अंग्रेजों को भी इन पठान क्षेत्रों पर शासन करने में बहुत मुश्किल हुई। आज जो उनकी छवि हो गई है, वह अंग्रेजों की ही उकेरी हुई है। महात्मा गांधी इन लोगों को समझते थे। इसलिए उन्होंने उन्हें अंग्रेजों की निगाह से नहीं देखा।

पठान भी महात्मा गांधी की धर्मानुशासित राजनीति से प्रभावित हुए और उनमें से एक विलक्षण नेता बादशाह खान निकल आया। स्वतंत्रता संग्राम का सबसे शौर्यपूर्ण सत्याग्रह इन्हीं पठानों का रहा था। जब पाकिस्तान बना, पठान उसमें शामिल होने के इच्छुक नहीं थे। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने भारत के साथ रहने का उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया। मुस्लिम लीग को सुदूर बंगाल में एक पूर्वी पाकिस्तान बनवाने में कोई हिचक नहीं हुई। लेकिन उस समय के कांग्रेसी नेताओं को बलूच और पठानों का भारत में बने रहने का प्रस्ताव व्यावहारिक नहीं लगा। पठानों की तरह बलूचों के कलात राज्य ने भी भारत में विलय का प्रस्ताव भेजा था। आज यह इलाके पाकिस्तान का सबसे अशांत क्षेत्र बने हुए हैं। पाकिस्तान बनने के बाद पठान बंट गए। अधिकांश पठान अनिच्छापूर्वक पाकिस्तान में बने रहे। वे जानते थे कि पाकिस्तान के शासकों के हाथों उन्हें न्याय नहीं मिलेगा और उनसे अच्छा व्यवहार नहीं होगा।

बादशाह खान ने पाकिस्तान बनते समय व्यथित होकर जवाहर लाल नेहरू से यह कहा भी था कि आप लोगों ने हमें भेड़ियों के सामने फेंक दिया है। मुख्यतः पंजाबी शासन में पठान असहज बने रहे और उनमें अफगानिस्तान के पठानों से मिलकर पठानों का एक अलग राज्य बनाने की सुगबुगाहट चलती रही। इसी बीच अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट सोवियत रूस की मदद से अपना प्रभाव बढ़ाने में सफल हुए। इसका लाभ उठाकर सोवियत रूस ने अफगानिस्तान पर आक्रमण करके अपनी समर्थक सरकार बनवा ली। लेकिन कोई दस वर्ष की खूनी लड़ाई के बाद उन्हें इसकी निरर्थकता समझ में आ गई और वे वापस लौट गए। अफगानिस्तान पर रूसी नियंत्रण को मुसलमानों में यूरोपीय उपनिवेशवाद के विस्तार के रूप में ही देखा गया था। उसका फायदा उठाकर सीमांत में मदरसों से पाकिस्तानी शासकों ने तालिबान पैदा करवाए और रूसी नियंत्रण के खिलाफ जेहाद छेड़ दिया था। इन जेहादियों को सऊदी अरब से पैसा मिला, अमेरिका से शस्त्र और पाकिस्तान से निर्देश। उनका अफगानिस्तान पर नियंत्रण हुआ, लेकिन इस्लामी कानून लागू करने और बर्बर दंड प्रणाली लागू करने के कारण उन्होंने आम लोगों का विश्वास खो दिया।

अमेरिकी सशस्त्र हस्तक्षेप से तालिबानी राज्य समाप्त अवश्य हो गया, लेकिन पाकिस्तानी सेना ने तालिबान का उपयोग करना नहीं छोड़ा। यह तालिबान आज तक अमेरिका और पाकिस्तान दोनों के लिए भारी समस्या बने हुए हैं। पाकिस्तानी सेना और शासन उनका इस्तेमाल अफगानिस्तान को अस्थिर बनाए रखने के लिए कर रहा है। इसके कारण अमेरिकी अफगानिस्तान में फंसे हुए हैं। अमेरिकियों ने पाकिस्तान को तालिबान से अलग करने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। काफी समय तक पाकिस्तानी अमेरिका को यह कहकर भरमाते रहे कि वे तालिबान को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने तालिबान के खुफिया ठिकानों पर तब हमले किए, जब तालिबानी आतंकवादी पाकिस्तानी सेना और नागरिकों पर हमले करने लगे। इसी का परिणाम पाकिस्तान की दक्षिण वजीरिस्तान के गुप्त तालिबानी ठिकानों पर की गई सैनिक कार्रवाई थी। इस कार्रवाई में बहुत से निरपराध लोग भी मारे गए। अब तक तालिबान पठानों से दोहरा व्यवहार करता रहा है। वह उन्हें नियंत्रित करने के लिए उन पर बर्बर अत्याचार भी करता है और अफगानिस्तान के विरुद्ध उनका इस्तेमाल करने के लिए उनके जेहादी तंत्र को पालता-पोसता भी रहता है।

अमेरिका ने पाकिस्तान की इस दोगली नीति से तंग आकर उसकी आर्थिक सहायता भी रोक दी है और उससे सामरिक सहयोग कम कर दिया है। लेकिन इस शून्य को भरने के लिए चीन और अब रूस आगे आ गए हैं। हालांकि उनके लिए भी पठान और बलूच मुश्किल बने हुए हैं। चीन के औद्योगिक गलियारे की सफलता इन्हीं विद्रोही कबीलों के कारण संदिग्ध बनी हुई है। रूस और चीन इस क्षेत्र को निरापद बनाने के लिए तालिबान से बातचीत की सलाह दे रहे हैं। लेकिन अमेरिका यह करके देख चुका है और उसकी निरर्थकता जानता है। असल में जब तक पाकिस्तान अफगानिस्तान को अपने प्रभाव में लेने का मोह नहीं छोड़ता, वह तालिबान का एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करता रहेगा। लेकिन आम पठानों का जीवन तो दूभर बना हुआ है। वे पाकिस्तानी सेना और तालिबान दोनों की बर्बर कार्रवाइयों में पिस रहे हैं। आम पठानों में तालिबान के प्रति भी गुस्सा है, लेकिन वे असल खलनायक पाकिस्तानी सेना और प्रशासन को मानते हैं। इस निरंतर उत्पीड़न का विरोध कैसे किया जाए, इसके बारे में 2014 में खैबर पख्तूनवा के गोमाल विश्वविद्यालय के छात्रों ने सोचना-समझना शुरू किया। उसमें से एक अहिंसक आंदोलन की रूपरेखा उभरकर आई। इस आंदोलन के अधिकांश नेता दक्षिण वजीरिस्तान के महसूद कबीले के छात्र थे। इस संघ प्रशासित कबीलाई क्षेत्र के लोग अपने-आपको पश्तीन कहते हैं। क्योंकि यह अहिंसक आंदोलन महसूद कबीले के छात्रों ने शुरू किया था, इसलिए उस समय उसे महसूद तहाफुज आंदोलन कहा गया। शुरू में यह आंदोलन सीमांत इलाकों तक सीमित था। उसमें उतार-चढ़ाव आते रहे, पाकिस्तान सेना उसे लेकर चिंतित रही। उसे लगता था कि आंदोलन हिंसक होता तो उसे दबाना आसान होता। लेकिन अहिंसक आंदोलन में बहुत लोग शामिल हो जाते हैं और उन्हें गिरफ्तार करना और आंदोलन को हमेशा के लिए दबा देना आसान नहीं होता। लेकिन कुछ समय पहले यह आंदोलन पाकिस्तान के अन्य इलाकों में भी फैल गया है। इस आंदोलन की चिनगारी बनने का काम एक छोटी सी घटना ने किया है।

तीन महीने पहले करांची में आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान-पाकिस्तान के एक ठिकाने पर पुलिस कार्रवाई के दौरान एक उभरती हुई मॉडल नकीबुल्ला महसूद की हत्या हो गई। इससे पाकिस्तान के शहरी क्षेत्रों और मध्य वर्ग में भी एक उबाल आ गया। इस घटना के बाद पठानों का यह आंदोलन पूरे पाकिस्तान में फैल गया है। अब वह केवल पठानों तक सीमित नहीं रहा, उसमें अन्य लोग भी शामिल हो रहे हैं। इस आंदोलन का नेता एक 26 वर्षीय युवा मंजूर पश्तीन है। अब इस आंदोलन को तहाफुज आंदोलन ही कहा जा रहा है। इस आंदोलन के नेता पूरे पाकिस्तान में जगह-जगह सभाएं कर रहे हैं और उन सभाओं में भारी संख्या में लोग उमड़ रहे हैं। यह आंदोलन सीधे-सीधे पाकिस्तानी सेना को अपना निशाना बना रहा है, जिसके बारे में कि अब तक कोई सोच भी नहीं सकता था। उसका नारा है- यह जो दशहतगर्दी है, इसके पीछे वर्दी है। पाकिस्तानी सेना ने उसका विरोध करने के लिए अनेक जगह पाकिस्तान जिंदाबाद सभाएं करवाई हैं। लेकिन इस आंदोलन का असर बढ़ता ही जा रहा है। उसकी सफलता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों आंदोलनकारियों ने इस्लामाबाद में दस दिन तक धरना दिया और अपनी ख्याति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करवा लीं। उनकी मांगें हैं-संघीय शासित क्षेत्र में सीमांत कानून समाप्त हो, लापता लोगों को रिहा किया जाए, गैरकानूनी हत्याएं बंद की जाएं, सुरक्षा नाकों पर लोगों को बेइज्जत करना बंद किया जाए और संघीय शासित क्षेत्र में बिछाई गई बारूदी खदानें समाप्त की जाएं। उन्होंने जनरल परवेज मुशर्रफ को भी गिरफ्तार किए जाने की मांग की है।

पाकिस्तानी सेना ने उनकी कुछ मांगें मानी भी है। लेकिन आंदोलन दबा नहीं है, फैलता ही जा रहा है। पाकिस्तान के एक अखबार ने लिखा है कि मंजूर पश्तीन बादशाह खान के बाद उभरा पठानों का एक नया हीरो है। मंजूर पश्तीन का कहना है कि पठान अब केवल पाकिस्तान सरकार की बातों पर विश्वास नहीं करेंगे। जो समझौता हो, उसकी अंतरराष्ट्रीय गारंटी हो। पाकिस्तान में जुलाई में आम चुनाव होने हैं। इस आंदोलन की सफलता से प्रेरित होकर नवाज शरीफ ने भी पाकिस्तानी सेना के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी है। दूसरी तरफ खैबर पख्तूनवा में इमरान खान की सरकार है। इमरान खान तालिबान और सेना दोनों के प्रति नरम रवैया रखते हुए एक राष्ट्रीय नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं। वे पठान हैं, लेकिन इस आंदोलन के बारे में उन्होंने अभी तक अपना रूख साफ नहीं किया। इस आंदोलन के लोग भी उनसे अपनी दूरी बनाए हुए हैं।

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