सिंगापुर में किम-जोंग-उन और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात ने पूरी दुनिया को राहत का अहसास कराया है। एक सनकी तानाशाह और एक मदमस्त राष्ट्राध्यक्ष की इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई थी। अहम बात यह है कि मुलाकात का परिणाम सकारात्मक रहा है और कुछ समय पहले तक दुनिया पर जिस तरह परमाणु युद्ध का खतरा मंडरा रहा था, वह फिलहाल टल गया प्रतीत हो रहा है। कुछ महीने पहले तक अमेरिका और उत्तर कोरिया दोनों ही एक दूसरे को तबाह करने की धमकी देते नजर आते थे। किम-जोंग-उन जहां अमेरिका को परमाणु हमले से नष्ट कर देने की बात कहते थे, वहीं डोनाल्ड ट्रंप भी उत्तर कोरिया का नाम दुनिया के नक्शे से मिटा देने का दावा करते थे। दरअसल, उत्तर कोरिया द्वारा एक के बाद एक मिसाइल और परमाणु परीक्षणों की वजह से न केवल कोरियाई प्रायद्वीप में काफी तनाव बढ़ गया था, बल्कि पूरी दुनिया पर तीसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडराने लगा था। तनाव की स्थिति में दोनों देश वार्ता की मेज पर आकर सौहार्दपूर्ण माहौल में बात करने के लिए तैयार हो गये, तो इसे ही एक बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। यह सही है कि दोनों देशों के बीच बातचीत होने की संभावना बनने के बाद से ही कई बार पेचीदा मोड़ भी आए। दोनों नेताओं के बीच रिश्ते भी कई बार बिगड़ते हुए दिखे। कई बार ऐसा भी लगा कि ये बातचीत नहीं हो सकेगी। अमेरिका ने एक बार बातचीत के प्रस्ताव को वापस भी ले लिया, लेकिन अंततः सिंगापुर में दोनों राष्ट्राध्यक्षों की मुलाकात हो ही गई।

सेंटोसा आइलैंड पर हुई इस मुलाकात के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने जहां 34 वर्षीय किम-जोंग-उन के कंधे पर हाथ रख कर अपनापन दिखाया, वहीं किम ने इस मुलाकात को विश्व शांति के लिए अहम मुलाकात की संज्ञा दी। किम-जोंग-उन का कहना था कि तमाम बाधाओं के बावजूद हमने पुरानी बातों को भूल कर एक नई शुरुआत की है और लगभग 70 सालों की इस कड़वाहट के खत्म होने के बाद दुनिया को एक बड़ा बदलाव नजर आयेगा। दोनों देशों के बीच जिस सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए हैं, उसमें प्रारंभिक सूचनाओं के मुताबिक पूरे कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु शस्त्र रहित बनाने की बात पर सहमति हुई है। हालांकि, अभी यह तय नहीं हो सका है कि कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु शस्त्र रहित बनाने के लक्ष्य को कितने चरणों में और कैसे हासिल किया जाएगा तथा इसका स्वरूप क्या होगा। लेकिन, अच्छी बात यह है कि इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच सहमति बन गई है। अमेरिका भी दक्षिण कोरिया से अपने सैनिकों को वापस बुलाने की बात के लिए तैयार हो गया है। वहीं उत्तर कोरिया ने अंतरराष्ट्रीय प्रेक्षकों के देखरेख में परमाणु निरस्त्रीकरण प्रक्रिया शुरू करने बात मान ली है। किम-जोंग-उन इस वार्ता के पहले ही बता चुके हैं कि उत्तर कोरिया के एक महत्वपूर्ण मिसाइल परीक्षण स्थल को नष्ट कर दिया गया है। सवाल ये है कि परमाणु शस्त्र निरस्त्रीकरण के मसले पर उत्तर कोरिया किस हद तक ईमानदार रहेगा। उत्तर कोरिया का दावा है कि परमाणु शक्ति हासिल करने के बाद उसने इसका उपयोग परमाणु बम बनाने में ज्यादा नहीं किया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि उत्तर कोरिया के पास कम से कम 60 से 70 परमाणु बम तैयार हैं। इन परमाणु बमों को कैसे नष्ट किया जाएगा, इस बारे में अभी कोई भी बात नहीं हो सकी है। अमेरिका ने इस विषय पर आगे भी बातचीत होने की आशा जतायी है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर कोरिया पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को अभी तत्काल समाप्त नहीं किया जाएगा।

ट्रंप दरअसल आने वाले दिनों में उत्तर कोरिया के रुख को परखना चाहते हैं और आरंभिक बातचीत के आधार पर ही अपने रवैये को पूरी तरह से नरम करने से बचना चाहते हैं। निश्चित रूप से दोनों देशों को आपसी शांतिपूर्ण संबंध कायम करने की दिशा में अभी एक लंबा सफर तय करना है। इसके बावजूद ट्रंप और किम की मुलाकात एक ऐसी शुरुआत कही जा सकती है, जिसे ट्रंप प्रशासन की एक बड़ी उपलब्धि माना जाएगा। उत्तर कोरिया सख्त अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से लंबे समय से आर्थिक संकट का सामना करता रहा है। किम-जोंग-उन का बातचीत की मेज तक आने की एक बड़ी वजह ये आर्थिक प्रतिबंध भी हैं। इसके साथ ही किम को बातचीत की मेज तक लाने में चीन और रूस जैसे देशों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हाल के दिनों में किम-जोंग-उन ने कई दौर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की और उन मुलाकातों के बाद से ही किम के रूप में बदलाव नजर आया। लेकिन, एक बड़ा सवाल ये भी है कि किम-जोंग-उन को शांति समझौते के लिए कब तक राजी रखा जा सकेगा। उनका इतिहास मनमाने फैसले करने का रहा है। पहले भी उत्तर कोरिया मनमाने फैसले लेता रहा है।

तानाशाही की वजह से उत्तर कोरिया जहां दुनिया में खौफ का पर्याय बना रहा है, वहीं उसका पड़ोसी दक्षिण कोरिया विकास के नए आयामों तक पहुंच चुका है। अमेरिका की पहल पर लगाये गये सख्त प्रतिबंधों के कारण उत्तर कोरिया को काफी कुछ झेलना पड़ा है। वहीं अमेरिका ने उत्तर कोरिया के कहर से दक्षिण कोरिया को बचाने के लिए लगभग 30 हजार अमेरिकी सैनिकों को दक्षिण कोरिया में तैनात कर रखा है। अमेरिका और दक्षिण कोरिया लंबे समय से संयुक्त सैन्य अभ्यास करते आ रहे हैं और यह बात उत्तर कोरिया को हमेशा ही खटकती रही है। सेंटोसा आइलैंड पर हुई मुलाकात के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ मिलकर किए जाने वाले सैन्य अभ्यास को रोकने का भी ऐलान किया।

हालांकि, उन्होंने साफ कर दिया कि दक्षिण कोरिया को दी जाने वाली सैन्य मदद अभी जारी रहेगी। हो सकता है कि आने वाले दिनों में बातचीत के अगले दौर में ट्रंप उत्तर कोरिया की बात मानकर दक्षिण कोरिया को सैन्य मदद देना बंद कर दे, लेकिन इसके पहले उत्तर कोरिया का रवैया परखा जाना जरूरी है। अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच 90 के दशक में भी परमाणु समझौता हो चुका है, लेकिन इस समझौते से उत्तर कोरिया ने 2002 में ही खुद को अलग कर लिया था। कई देशों की मध्यस्थता के बावजूद वह इस समझौते को जारी रखने के लिए राजी नहीं हुआ और 2009 में समझौते को पूरी तरह समाप्त मान लिया गया था। इसी दौरान उत्तर कोरिया ने परमाणु परीक्षण करके परमाणु क्षमता हासिल कर ली और उसके बाद से ही वह पूरी दुनिया को आंखे दिखाने लगा। ऐसे में सेंटोसा आइलैंड पर हुए इस समझौते पर उत्तर कोरिया कब तक टिका रहेगा, यह देखने वाली बात होगी। एक आशंका उत्तर कोरिया के रूस और चीन से संबंध को लेकर भी है। ये दोनों ही देश उत्तर कोरिया के करीबी मित्र माने जाते हैं। उत्तर कोरिया को बातचीत के तक लाने का श्रेय भी चीन और रूस को ही जाता है। लेकिन कहा जा रहा है कि इन दोनों देशों ने दुनिया में परमाणु युद्ध के खतरे को टालने के लिए ही किम को ट्र्ंप के साथ बातचीत करने के लिए राजी किया था। लेकिन इसके पहले आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहे उत्तर कोरिया को मदद करने रूस और चीन सबसे आगे रहे हैं।

प्रतिबंधों और अमेरिका की नाराजगी के बावजूद रूस उत्तर कोरिया को कच्चे तेल की आपूर्ति करता रहा है, जबकि चीन उत्तर कोरिया से खनिज व अन्य उत्पादों की खरीद करता रहा है। ऐसे भी विश्व राजनीति में रूस और चीन अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं। अब देखने की बात यह होगी कि क्या रूस और चीन किम-जोंग-उन को ट्रंप की गोद में बैठा हुआ देखना पसंद करेंगे। अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच हुए समझौते का भविष्य काफी हद तक चीन और रूस के रवैए पर भी निर्भर करेगा। बहरहाल, उत्तर कोरिया और अमेरिका ने जिस तरह से तनाव खत्म करने की दिशा में पहल शुरू की है, इसका स्वागत करना चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए कि यह विश्व शांति की दिशा में एक अहम पड़ाव साबित होगा।