आम किसान से बांध निर्माता बनने का सफर

किसानों की दशा सुधारने और जल संरक्षण के लिए उन्होंने जो काम किया था, उससे उनके क्षेत्र के हर किसान के जीवन में खुशहाली आई थी

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अमूमन हर राजनीतिज्ञ खुद को समाजसेवी बताता है। इनमें से भी ज्यादातर पूर्णकालिक राजनीति में आने के बाद टिकट और कुर्सी की जोड़तोड़ में लग जाते हैं और समाजसेवा सिर्फ उनके बायोडेटा का हिस्सा बनकर रह जाता है। लेकिन कई राजनीतिज्ञ ऐसे भी हैं, जिन्होंने समाजसेवा के लिए जीवन समर्पित कर दिया। हम बात कर रहे हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री और कर्नाटक में जमाखांडी के विधायक रह चुके सिद्दू न्यामागौड़ा की, जिनका 28 मई को ही एक सड़क हादसे में निधन हुआ है। राज्य में बैरेज सिद्दू के नाम से प्रसिद्ध सिद्दू न्यामागौड़ा ने अपना पूरा जीवन किसानों के उत्थान और जल संरक्षण के नाम कर दिया था। एक मामूली किसान के रूप में अपना जीवन शुरू करने वाले सिद्दू ने अपने दम पर कृष्णा नदी पर चिकपदसालगी बांध का निर्माण करवाया। उत्तर कर्नाटक के सूखा प्रभावित क्षेत्र में किसानों को राहत पहुंचाने के लिए आजादी के बाद से ही कृष्णा नदी पर बांध बनाने की मांग की जा रही थी। अस्सी के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े ने किसानों की मांग पर कहा था कि स्थानीय किसान यदि बांध की कुल लागत में 25 फीसदी का योगदान करें तो राज्य सरकार बांध बनवा देगी। सिद्दू ने अपने संगठन की मदद से तीस गांवों के किसानों को एकजुट कर लगभग एक करोड़ रुपये का इंतजाम भी कर लिया, लेकिन राजनीतिक वजहों से राज्य सरकार ने बांध बनाने का इरादा त्याग दिया। राज्य सरकार की ओर से निराशा मिलने के बाद सिद्दू खुद अपने किसान साथियों के साथ बांध बनाने के काम में जुट गये। स्थानीय युवा इंजीनियरों ने बिना फीस लिये ही बांध का डिजाइन तैयार किया और तकनीकी सलाह दी। वहीं किसानों ने मजदूरों की जगह खुद काम करना शुरू कर दिया। कई किसानों ने पैसे का इंतजाम करने के लिए घर में रखे गहनों तक को गिरवी रख दिया। कृष्णा नदी के दोनों ओर के गांवों के किसान रोज अपने घर से खाना लाते और खुद बांध बनाने के काम में जुट जाते। जो पैसे जुटाये गये थे, उनसे ईंट, सीमेंट, बालू, सरिया आदि की खरीद की जाती थी। सरकार की उपेक्षा के बावजूद निर्माण कार्य चलता रहा और एक साल में इस बांध का निर्माण हो गया। देश का यह पहला ऐसा बांध था, जिसका निर्माण बिना किसी सरकारी मदद के किया गया था। बांध बनाने के बाद सिद्दू देखते ही देखते पूरे देश में प्रसिद्ध हो गए, उनकी इसी प्रसिद्धि देखते हुए 1991 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एस बंगरप्पा ने कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने का न्योता दिया। बंगरप्पा में सिद्दू के लिए बागलकोट सीट का चयन किया था, जहां से जनता पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के नेता और कर्नाटक के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके रामकृष्ण हेगड़े चुनाव लड़ रहे थे।

माना जा रहा था कि राजनीति से पूरी तरह से अनजान व्यक्ति को टिकट देकर कांग्रेस ने रामकृष्ण हेगड़े को वाकओवर दे दिया है। लेकिन, सिद्दू ने रामकृष्ण हेगड़े को चुनावी मुकाबले में चित कर दिया। संभवतः इसी कारण कांग्रेस आलाकमान की नजर भी उन पर पड़ी और पीवी नरसिंह राव सरकार में कोयला मंत्रालय में उपमंत्री के तौर पर उनका चयन कर लिया। कहते हैं कि जब राष्ट्रपति भवन में शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था, तब पहली बार सांसद बने सिद्दू कर्नाटक भवन में बैठकर उत्सुकता के साथ टीवी पर इस कार्यक्रम को देख रहे थे। वे उस समय चौंके, जब उप मंत्री के रूप में शपथ लेने के लिए उनका नाम पुकारा गया। लेकिन उनके लिए तब शपथ ग्रहण समारोह में पहुंच पाना संभव नहीं था। लिहाजा सिद्दू को बाद में पद की शपथ दिलाई गई। उनकी राजनीतिक पारी आगे भी जारी रही और जमाखंडी विधानसभा सीट से वह लगातार दो बार विधायक चुने गये। इस बार मंत्रिमंडल विस्तार के पहले वे पार्टी आलाकमान के बुलावे पर दिल्ली गये थे और वहां से वापसी के वक्त ही कार एक्सीडेंट में उनका निधन हो गया। सिद्दू न्यामागौड़ा भले ही कांग्रेस से जुड़े थे, लेकिन उनका सम्मान हर राजनीतिक विचारधारा वाले लोग करते थे। किसानों की दशा सुधारने और जल संरक्षण के लिए उन्होंने जो काम किया था, उससे उनके क्षेत्र के हर किसान के जीवन में खुशहाली आई थी। आज सिद्दू इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा बनाया गया चिकपदसालगी बांध स्थानीय लोगों के मन में उनकी याद को जीवित रखेगा।

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