मई 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के दिन से ही कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला कर रहा है। बीते चार वर्षों से इनका एकमात्र उद्देश्य केंद्र से मोदी सरकार को हटाना रहा है। एक साल बाद होने वाले आम चुनाव में जनता नए लोकसभा का निर्वाचन करेगी। बीजेपी को सत्ता से हटाने का विपक्ष के लिए यह प्राकृतिक अवसर है। इस तरह विपक्ष मोदी को हटाने के अपने लक्ष्य को हासिल कर सकती है। लेकिन बीजेपी विरोध में विपक्ष अपने रास्ते से भटक गई है और गलत तरीके का इस्तेमाल कर रही है। अतीत में विपक्ष एंटी-इनकंबेंसी पर चुनाव जीतता रहा है। 1971 का आम चुनाव इसका एकमात्र अपवाद था जब इंदिरा गांधी ने असाधारण जीत हासिल की थी। इसके बाद विपक्ष सभी चुनाव एंटी- इनकंबेंसी के कारण जीता। इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार को 1977 में पहली बार हार का सामना करना पड़ा। इसका कारण इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में लगाया गया आपातकाल था। आपातकाल में विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से देश भर में इंदिरा गांधी और कांग्रेस के खिलाफ माहौल बना था।
इंदिरा गांधी सरकार के पतन में जयप्रकाश नारायण की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। जनता पार्टी में आंतरिक मतभेद और फूट की वजह से 1980 में फिर से इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर के कारण कांग्रेस लोकसभा में दो तिहाई बहुमत से वापस आई। लोकसभा में असाधारण बहुमत पाकर प्रधानमंत्री बनने वाले राजीव गांधी पर बोफोर्स तोप घोटाले में रिश्वत लेने का आरोप लगा। 1989 में कांग्रेस सत्ता से दूर हुई और विश्वनाथ प्रताप सिंह बीजेपी और वामदलों के समर्थन से प्रधानमंत्री बने। मोदी के खिलाफ विपक्षी जुनून जिस दिन से नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, विपक्ष का एकमात्र एजेंडा उन पर व्यक्तिगत हमला करना है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद विपक्ष ने आरोप लगाया कि 2002 के गुजरात दंगों के भूत ने सरकार पर कब्जा कर लिया है। बीजेपी के कुछ नेता, केंद्रीय मंत्री और बीजेपी शासित राज्यों के नेताओं ने मुस्लिम विरोधी बयान देकर विपक्ष को मोदी सरकार पर हमला करने का अवसर मुहैया कराते रहे। कुछ बीजेपी नेताओं ने मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाने को कहा। जबकि प्रधानमंत्री ‘सबका साथ-सबका विकास’ की बात कर रहे हैं। तथाकथित ‘गौ रक्षकों’ द्वारा मुस्लिमों की हत्या बीजेपी सरकार पर हमला करने का एक और मुद्दा था। लेकिन प्रधानमंत्री ने तथाकथित ”गौ रक्षकों” को अपराधी और समाज विरोधी तत्व कह कर विपक्षी हमले की धार को कुंद कर दिया। विभिन्न राज्यों में गाय के नाम पर लोगों की हत्या कर रहे लोगों पर मोदी ने कड़ाई से पेश आने को कहा।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने पहली बार 2015 में भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 में संशोधन करने के लिए मोदी सरकार का जबर्दस्त विरोध किया। सरकार उद्योगों और सरकारी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण कानून में कुछ सुविधा देने के लिए संशोधन करना चाहती थी। किसानों ने भी इसका भारी विरोध किया। किसानों के विरोध के चलते अंतत: सरकार ने संशेधन का विचार छोड़ दिया।
विमुद्रीकरण एक साल बाद, मोदी सरकार ने 8 नवंबर, 2016 को पांच सौ और एक हजार के नोटों के विमुद्रीकरण की घोषणा की। परिणामस्वरूप बड़े नोट चलन से बाहर हो गए। इससे लोगों को बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा। पुराने नोट को जमा करने और नए नोट लेने के लिए लोगों को लंबी-लंबी कतार में दिन भर खड़ा होना पड़ा। कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के नेता सरकार के खिलाफ तलवार भांजने लगे। विपक्ष ने इस निर्णय को गरीब और किसान विरोधी बताया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि कालेधन को खोजने की बजाए यह निर्णय अमीरों के धन को ठिकाने लगाने के लिए था। लेकिन विमुद्रीकरण के विरोध का चुनाव पर कोई असर नहीं हुआ। यह 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और पूर्वोत्तर राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के समय देखा गया।
जीएसटी को कहा गब्बर सिंह टैक्स इसके बाद विपक्ष ने मोदी सरकार पर हमले के लिए जीएसटी को चुना। जीएसटी 2017 में आया। वास्तव में जीएसटी कांग्रेस सरकार की योजना थी। कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) को गैर-बीजेपी शासित राज्यों के वित्त मंत्रियों के बीच लंबे विचार-विमर्श के बाद पारित किया गया था। यह कानून कांग्रेस पार्टी के सदस्यों के समर्थन से संसद के दोनों सदनों में पारित किया गया। लेकिन जब मोदी सरकार ने जीएसटी लागू किया तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस कानून को उद्योग और व्यापार के खिलाफ बताया। गुजरात विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने जीएसटी को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहा। लेकिन राहुल की आक्रामकता मतदाताओं को प्रभावित करने में असफल रहा। बीजेपी सत्ता में लौट आई। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार में भी जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स ही कह रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि व्यापार और उद्योग जगत में यह सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया जा रहा है कि जीएसटी कुछ समय बाद कॉर्पोरेट के लिए वरदान साबित होगा। अविश्वास प्रस्ताव मई, 2018 तक विपक्ष मोदी सरकार के किसी नीतिगत मामले को मुद्दा बनाने में असफल रहा। कोई ठोस मुद्दा न मिलने पर विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया। जबकि विपक्ष को यह पता था कि अविश्वास प्रस्ताव जीतने के लिए आवश्यक संख्या बल उसके पास नहीं है। फिर भी विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाने की जिद पर अड़ा रहा।
विपक्ष लोकसभा में हंगामा करता रहा। अविश्वास प्रस्ताव पर 50 सदस्यों के हस्ताक्षर तो थे लेकिन इसे पूरे विपक्ष का भी समर्थन नहीं था। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने सदन में हंगामे के कारण इस पर विचार ही नहीं किया। विचार न करने का कारण तकनीकी बताया गया। नतीजा यह हुआ कि ‘रिसेस’ के बाद पूरा बजट सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। चीफ जस्टिस पर महाभियोग कांग्रेस और कुछ विपक्षी दल मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र को हटाना चाहते हैं। कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट के एक खंडपीठ के फैसले से नाखुश थी, जिसने न्यायाधीश बीएम लोया के मौत की फिर से जांच कराने की याचिका पर फैसला सुनाया था। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने न्यायाधीश लोया के मौत की फिर से जांच करने की मांग को खारिज कर दिया। खंडपीठ ने जांच की मांग करने वाली सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि लोया की प्राकृतिक मौत हुई है। अब इस मामले में फिर से जांच की जरूरत नहीं है। कांग्रेस ने राज्यसभा के 60 से अधिक सांसदों से महाभियोग नोटिस पर हस्ताक्षर करा कर राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू को भेजा। वेंकैया नायडू ने नोटिस पर कानूनविदों और संविधान विशेषज्ञों से राय लेने के बाद इसे खारिज कर दिया।
कांग्रेस ने नोटिस खारिज करने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। कपिल सिब्बल ने दलील दी थी कि महाभियोग नोटिस पर अपेक्षित संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर करने के बाद राज्यसभा सभापति इसे स्वीकार करने के लिए बाध्य थे। विपक्ष फिर पुराने राह पर अब एक बार फिर विपक्ष मुद्दों की बजाए व्यक्तिगत हमले पर उतर आई है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी, सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मोदी पर व्यक्तिगत हमला किया। राहुल ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जनता का धन इसलिए लूट रहे हैं ताकि नीरव मोदी को दे सकें। राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी के वादे को हवा-हवाई बताया। मनमोहन सिंह ने कर्नाटक में कहा कि ”भारत का कोई भी प्रधानमंत्री इतना नीचे तक नहीं गिरा, जितना नरेंद्र मोदी गए।” सोनिया गांधी ने कर्नाटक में एक रैली में कहा कि ”मोदीजी एक बहुत अच्छे वक्ता हैं लेकिन भाषण से भूख और गरीबी खत्म नहीं होती है। आप भाषण खाकर पेट नहीं भर सकते, पेट भरने के लिए अनाज की जरूरत होती है।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर इस तरह के व्यक्तिगत हमले 2019 के आम चुनावों में भी चुनावी लाभ नहीं दिला सकते। नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अभी तक जमीन पर सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखाई दे रही है। कांग्रेस और विपक्ष मोदी सरकार पर हमला करने का कोई अवसर नहीं छोड़ रही है। लेकिन विपक्षी हमलों के बीच भी नरेंद्र मोदी का राजनीतिक प्रभाव कम नहीं हो रहा है। हर हमले के बाद वह और ताकतवर होकर उभर रहे हैं।