नरेन्द्र मोदी सरकार के चार वर्ष की तुलना पिछली सरकारों के कार्यों से करें तो अंतर साफ दिखाई देता है। दुनिया में मंदी के बावजूद अर्थव्यवस्था की हालत संतोषजनक है। विश्व की मान्य एजेंसियों का कहना है कि भारत अगले कई वर्षों तक दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होगी। कृषि के क्षेत्र में आमूल परिवर्तन भले नहीं हुआ हो, पर 2013 की तुलना में स्थिति बेहतर है। आंतरिक सुरक्षा और कूटनीति के क्षेत्र में चार वर्षों में मोदी सरकार ने बेहतर सफलताएं पाईं हैं। मई 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अकेले भाजपा तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को जैसा बहुमत मिला उसने अनेक विश्लेषकों को चौंका दिया। वास्तव में विखंडित राजनीति के दौर में ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों और नेताओं ने मान लिया था कि भारत में अब किसी एक दल के बहुमत का युग खत्म हो गया। स्वयं भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व में ऐसे लोग शामिल थे जो मानते थे कि नरेन्द्र मोदी के नाम पर वोट तो हमें मिलेगा लेकिन बहुमत नहीं आएगा और उस स्थिति में जिसे साथी दलों का समर्थन मिलेगा वही प्रधानमंत्री बन पाएगा। नरेन्द्र मोदी के जादू ने राजनीतिक विश्लेषकों की मान्यता को तो ध्वस्त किया ही, भाजपा के अंदर भी प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वस्वीकृत उम्मीदवार मानने वालों के सपनों को धूल-धूसरित कर दिया। हालांकि जो लोग जमीनी वास्तविकता पर दृष्टि लगाए हुए थे, उन्हें नरेन्द्र मोदी के नाम पर जारी लहर का पूरा आभास था। इसलिए उन्हें चुनाव परिणामों पर किसी प्रकार का आश्चर्य नहीं हुआ।

सच कहा जाए तो 2014 से भारतीय राजनीति मेंं पुन: एक दौर की शुरुआत हुई। मोदी सरकार के चार वर्ष पूरा होने के बाद फिर कुछ लोग वैसी ही धारणा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मोदी विरोधी पत्रकार-राजनीतिक विश्लेषक तथा पार्टियां अलग-अलग तरीकों से यह प्रचार कर रहीं हैं कि मोदी का जादू अब चूक रहा है….उनके नेतृत्व में भाजपा एवं राजग को बहुमत मिलना कठिन है…..इसलिए अभी से विपक्षी दलों को गठजोड़ बनाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि इस वातावरण का लाभ उठाकर बेहतर परिणाम लाया जाए। हम देख रहे हैं कि मोदी और भाजपा विरोधी गठबंधन बनाने की किस-किस तरह की कवायद चल रहीं हैं। कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि अगर भाजपा के विरुद्ध हर सीट पर सब मिलकर एक उम्मीदवार उतार दें तो ही मोदी को पद से हटाया जा सकता है। यह बात अलग है कि ऐसे एक गठबंधन की संभावना वर्तमान राजनीति में न के बराबर है। तो इसका अर्थ क्या है? भले कुछ लोग मोदी का जादू चूकने की दलील दें, किंतु विपक्षी दलों में इस तरह की सोच यह साबित करता है कि चार वर्ष तक शासन चलाने के बावजूद मोदी को सीधी चुनावी चुनौती देने की हैसियत किसी एक दल में नहीं है। इन दलों में यह आत्मविश्वास पैदा ही नहीं हो रहा कि मोदी को हम पराजित कर पाएंगे। इसलिए जरूरी है कि आपस का मतभेद भुलाकर एक जगह आ जाओ। यानी पहले मोदी को हराओ, बाद की बाद में देखेंगे।

हालांकि विरोधियों की तीखी आलोचनाओं को स्वीकारें तो मोदी एक विफल प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने चुनाव में जो वायदे किए उन सबको पूरा नहीं किया। हर वर्ग इस सरकार से परेशान है। इस कारण इसके खिलाफ नाराजगी है। अगर ऐसा ही है तो फिर भाजपा के खिलाफ हर जगह एक उम्मीदवार खड़ा करने की बात क्यों हो रही है? जाहिर है, मोदी सरकार के चार वर्ष के कार्यकाल का विपक्षी मूल्यांकन एकपक्षीय है और यह उनको भी पता है। वास्तव में यदि डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली पिछली सरकार के जाने एवं नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार के आने के चार वर्ष की तुलना करें तो अंतर साफ दिखाई देगा। दुनिया में मंदी के बावजूद अर्थव्यवस्था की हालत संतोषजनक है। विमुद्रीकरण एवं जीएसटी के बाद हिचकोलें खाने वाली अर्थव्यस्था अब राह पकड़ चुकी है। विश्व की मान्य एजेंसियों का कहना है कि भारत अगले कई वर्षों तक दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होगी। कृषि के क्षेत्र में आमूल परिवर्तन भले नहीं हुआ हो, पर 2013 की तुलना में स्थिति बेहतर है। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को यूपीए सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था।

मोदी सरकार ने अब किसानों की लागत का डेढ़ गुणा मूल्य देने की घोषणा कर दी है। प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना किसानों को बरबादी से बचाने का एक अमोघ अस्त्र बनकर आया है। उस समय की तुलना में महंगाई दर नियंत्रण में है। हालांकि पेट्रोलियम मूल्यों को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। खस्ताहाल बैंकों को बचाने के लिए सरकार ने ठोस कदम उठाए हैं। शेयर बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई पर है। सड़कों का निर्माण रिकॉर्ड तोड़ रहा है। हम यह नहीं कहते कि मोदी सरकार ने आर्थिक क्षेत्र मे चमत्कार कर दिया है, लेकिन 2013-14 के मुकाबले हर क्षेत्र में बेहतर स्थिति है, इससे कोई निष्पक्ष विश्लेषक नकार नहीं सकता। देश निराशा के दौर से बिल्कुल बाहर निकल चुका है। आंतरिक सुरक्षा आंतरिक सुरक्षा यानी आतंकवाद के क्षेत्र में चार वर्षों में मोदी सरकार ने बेहतर सफलताएं पाईं हैं।

पूर्वोत्तर से उग्रवाद का लगभग खात्मा हो चुका है। सेना ने जवानों पर उग्रवादियों के हमले का बदला लेने के लिए जब सीमा पार कर म्यांमार के जंगली क्षेत्रों में कार्रवाई की गई तो पूरे देश में रोमांच का अनुभव किया गया। नगा उग्रवादियों की कमर टूट गई। पिछले लंबे समय से पूर्वोत्तर के राज्यों में बड़े उग्रवादी हमले नहीं हुए हैं। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसी का परिणाम है कि पहले जिस अफस्पा या सैन्य बल विशेष अधिकार कानून को हटाने के लिए आंदोलन करने पड़ रहे थे, वह अपने-आप खत्म हो रहा है। सबसे पहले त्रिपुरा से इसे हटाया गया। असम एवं मणिपुर की राज्य सरकार को कह दिया गया कि आप जब चाहें इसे हटा दें, केन्द्र को कोई समस्या नहीं। मेघालय से इसे पूरी तरह हटा लिया गया एवं अरुणाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रह गया है।

मिजोरम में अभी अफस्पा है लेकिन यह निष्प्रभावी है। वहां सेना की कानून व्यवस्था में कोई भूमिका नहीं। आश्चर्य नहीं कि आने वाले समय में सरकार वहां से भी अफस्पा हटा दें। क्या कुछ वर्ष पूर्व तक यह कल्पना की जा सकती थी कि अफस्पा इस तरह आसानी से बिना शोर-शराबे के हटा दिया जाएगा? तो इसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर तो मानना ही होगा। माओवाद की भी कमर टूट चुकी है। जब मोदी सरकार आई थी तो देश के 150 से ज्यादा जिले इसकी चपेट में माने जाते थे। आज यह 50 जिलोंं से भी नीचे आ गया है एवं उसमें भी ऐसे कम क्षेत्र हैं, जहां इनका वाकई प्रभाव है। उम्मीद है कि इस वर्ष का अंत होते-होते माओवादियों के प्रभाव की सीमाएं काफी सिमट चुकी होंगी। एक समय था जब माओवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती कहा जाता था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल के आंतरिक सुरक्षा सम्मेलनों में कई बार यह वाक्य बोला था। कम से कम आज ऐसा कहने की आवश्यकता नहीं है। जम्मू-कश्मीर को छोड़ दें तो देश में जेहादी आतंकवाद का जो खतरा मंडरा रहा था, वह अब उस रूप में नहीं दिखता। पठानकोट, गुरुदासपुर जैसे कुछ हमलों को छोड़ देंं तो कोई बड़ा आतंकवादी हमला देश में इस बीच नहीं हुआ है। पहले जैसे इंडियन मुजाहिद्दीन से लेकर हरकत उल जेहाद उल इस्लामी आदि का नाम अब नहीं सुना जा रहा है। देश से विदेश तक रहने वाले अनेक कुख्यात आतंकवादी पकड़े गए हैं। यहां तक कि पाकिस्तान मेंं पनाह लेने वाले आतंकवादी भी भारत आकर स्वयं को कानून के हवाले किया। इन सबको तो उपलब्धियों की पोटली में डालना ही होगा। जम्मू और कश्मीर के मोर्चे पर हालांकि उस तरह की सफलता नहीं दिख रही है, जैसी उम्मीद की गई थी। किंतु पाकिस्तान पिछले कई सालों से जम्मू-कश्मीर को 1990 के दशक में ले जाने का जो षड्यंत्र कर रहा है, उसमें उसे सफलता नहीं मिली है। इस समय जम्मू-कश्मीर में सेना, पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के बीच जैसा तालमेल है, वैसा पहले नहीं देखा गया था। इन सबकी समन्वित कार्रवाइयों से आॅपरेशन आॅल आउट को काफी सफलताएं मिल रहीं हैं।

पिछले वर्ष 218 आतंकवादियों को सुरक्षा बलों ने मौत की नींद सुला दिया तो इस वर्ष अभी 62 को। 8 जुलाई, 2016 को बुरहान वानी के मारे जाने के बाद आतंकवाद, हिंसा और उग्र प्रदर्शनों का जैसा ज्वार उठा था, उससे कुछ समय के लिए लगा था कि घाटी एक बार फिर से हाथ से निकल रहा है। किंतु सरकार ने सुरक्षा बलों को कार्रवाई की खुली छूट दी। अब कैसी भी परिस्थिति आए वे आॅपरेशन पूरा किए बिना वापस नहीं आते। कागजी औपचारिकता को न के बराबर कर दिया गया। इस तरह सुरक्षा बलों का आत्मबल बुलंदियों पर है। वे निर्भीक होकर अपनी भूमिका को अंजाम दे रहे हैं। बुरहान वानी गैंग का खात्मा हो चुका है। लश्कर-ए-तैयबा एवं हिज्बुल मुजाहिद्दीन की कमर टूट चुकी है। पीडीपी के साथ सरकार चलाते हुए ऐसा कर पाना पहले असंभव लग रहा था। आखिर पीडीपी के नेताओं के अंदर आतंकवादियों एवं अलगाववादियों के प्रति नरम रुख रहा है।

अलगाववादियों पर पहली बार कड़ी कार्रवाई हो रही है। एनआईए टेरर फंडिंग यानी आतंकवाद के वित्त पोषण की जांच करते हुए हुर्रियत के नेताओं तक पहुंची। दस गिरफ्तार हैं एवं उन पर मुकदमा चल रहा है। और भी आगे गिरफ्तार हो सकते हैं। सीमा पार से हवाला के जरिए धन पहले भी आता था, उसका उपयोग आतंकवाद, हिंसा, पत्थरबाजी में किया जाता था लेकिन उनके खिलाफ इस तरह की कभी कार्रवाई नहीं हुई। कूटनीति वैदेशिक मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वक्तृत्व क्षमता तथा कुशल कूटनीति से व्यक्तिगत धाक तो जमाया ही है, देश का सम्मान भी बढ़ाया है। अमेरिका से लेकर यूरोप, पूर्वी एशिया, अफ्रिका सब जगह भारत को आज एक प्रभावी देश के रूप में देखा जा रहा है। एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत के नेतृत्व को स्वीकार करते हुए अमेरिका ने इसका नाम हिन्द प्रशांत क्षेत्र रख दिया और इसे दुनिया ने लगभग स्वीकार कर लिया है। यह सामान्य बात नहीं है। पहले इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। चीन ने भूटान के डोकलाम क्षेत्र में सड़क बनाकर कब्जा करने की कोशिश की तो भारत वहां अड़ गया। भूटान हमारा दोस्त है और उसके लिए भारत ने चीन से सीधी मोर्चाबंदी की। 72 दिनों तक भारत डटा रहा और चीन को अपने कदम वापस लेने पड़े। हालांकि चीन ने डोकलाम से लगे अपने चिन्हित इलाके में हैलीपैड से लेकर खंदक आदि बनाकर अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाई है, पर उसमें हम कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि वह उसका क्षेत्र है। भारत की ओर से चीन को पहली बार इतनी बड़ी चुनौती मिली। उसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव बना रहा। चीन ने भी शायद समझा है कि भारत जैसी शक्ति के साथ स्थायी तनाव व बैर भाव ठीक नहीं है। इसलिए उसने पहल की अपने विदेश मंत्री को यहां भेजा, दोनों तरफ के अधिकारियों एवं नेताओं का जान-आना हुआ। अंत में पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग ने आमंत्रित कर वुहान में दो दिनों की औपचारिक बातचीत की है। इसमें सीमा पर तनाव खत्म करने तथा आगे तनाव न हो, इसके लिए अनेक निर्णय किए।

इस तरह का शिखर सम्मेलन आगे जारी रखने का निर्णय हुआ है। देखते हैं आगे क्या होता है, लेकिन भारत ने चीन के संदर्भ में अपनी भूमिका अभी तक ठीक से निभाई है। ऐसे और भी क्षेत्र हैं जिनकी चर्चा की जा सकती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि पिछली कई सरकारों से तुलना करें तो नरेन्द्र मोदी सरकार का कार्यकाल किसी मोर्चे पर निराशाजनक नहीं है। यह बात ठीक है कि संघ परिवार के कार्यकताओं के एक बड़े वर्ग तथा मनमोहन सरकार की नीतियों से खिन्न भावनात्मक रूप से मोदी की ओर आए समर्थकों के बड़े वर्ग को लगता है कि उनकी अपेक्षाओं पर सरकार पूरी तरह खरी नहीं उतरी है। इस पर नरेन्द्र मोदी एवं सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों तथा भाजपा नेतृत्व को विचार करना चाहिए। सत्ता की कार्य-संस्कृति को बदलना एक चुनौती के रूप में अभी भी बना हुआ है। कार्यकर्ताओं और समर्थकों ही नहीं, आम जनता का जरूरी काम मंत्रालयों में आसानी से हो जाए, ऐसी व्यवस्था होनी अभी शेष है। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह, दोनों को मंत्रियों के साथ बैठकर स्पष्ट दिशा-निर्देश देना चाहिए। कोई व्यक्ति यदि किसी तरह का काम लेकर आता है, कोई आवेदन देता है और वह कानूनी तौर पर जायज है तो उस पर त्वरित कार्रवाई हो और उसकी सूचना उस व्यक्ति को समय-समय पर मिले ऐसी व्यवस्था जरूरी है। कई मामलों में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की पहल उल्लेखनीय है। इसी तरह की पहल अगर सरकार के अन्य मंत्री भी करें तो मोदी सरकार में लोगों का विश्वास और दृढ़ होगा।