मोदी सरकार के 4 साल — आर्थिक मोर्चे पर बल्ले-बल्ले

भारत में जारी आर्थिक सुधारों पर विश्व की कई संस्थाओं ने भी अपनी मुहर लगाई है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने पिछले 14 सालों में पहली बार भारत की रैंकिंग में परिवर्तन कर इसे बीएए-3 से बढ़ाकर बीएए-2 कर कर दिया

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नरेंद्र मोदी ने जब प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली, उस समय देश की जनता की सारी उम्मीदें उनपर टिकी हुई थी। लोगों को उम्मीद थी कि मोदी देश को निराशा के माहौल से निकालकर विकास के रास्ते पर ले जाएंगे। चार साल के शासन काल में नरेंद्र मोदी की सरकार जिस मुकाम तक पहुंची है, उसके आधार पर यही कहा जा सकता है कि देश की जनता की आशा काफी हद तक सही साबित हुई है। भारत विश्व की एक प्रमुख आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। यदि आर्थिक मोर्चे के संकेतकों को देखा जाए तो अधिकांश संकेतक सरकार की सफलता की कहानी कहते हुए ही नजर आते हैं। यह सही है कि इस सरकार के कार्यकाल में लोगों को समय-समय पर दलहन तथा शाक-सब्जियों के मोर्चे पर कई बार कठिनाई का भी सामना करना पड़ा, लेकिन इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि देश की माली हालत में काफी सुधार हुआ है।

भारत की आर्थिक स्थिति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि फिलहाल भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2.68 ट्रिलियन डॉलर का हो चुका है और अब भारत से आगे सिर्फ चीन और अमेरिका ही हैं। अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार आर्थिक विश्लेषकों की मानें तो अर्थव्यवस्था में वृद्धि के मोर्चे पर भारत की अर्थव्यवस्था चीन की अर्थव्यवस्था की तुलना में कहीं ज्यादा गति से बढ़ रही है। पिछले चार सालों के दौरान चीन की औसत विकास दर 6.9 फीसदी रही है, जबकि भारत की औसत विकास दर 7.2 रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने मौजूदा वित्त वर्ष में चीन की अर्थव्यवस्था के 6.4 फीसदी के दर से विकास करने की उम्मीद जतायी है, वहीं भारत के लिए 7.4 फीसदी के विकास दर का अनुमान लगाया गया है। इसी तरह यदि मोदी सरकार के गठने के बाद के काल को देखा जाये तो भारत की विकास दर औसतन सात फीसदी से ज्यादा बनी रही है, जबकि चीन की विकास दर औसतन सात फीसदी से नीचे ही रही है। इसी तरह अगर जीडीपी ग्रोथ की बात करें तो पूरी दुनिया के अधिकांश देशों में ग्रोथ रेट औसतन दो फीसदी के स्तर पर रहा है, वहीं नोटबंदी और जीएसटी जैसे अर्थव्यवस्था को झकझोर देने वाले कदमों के बावजूद भारत का ग्रोथ रेट सात फीसदी से ज्यादा रहा है।

हालांकि भारत के विकास दर में भी कमी आई और लगातार 5 तिमाहियों में विकास दर लगातार गिरता रहा, लेकिन नोटबंदी के प्रभावों से मुक्त होने के बाद इसमें फिर से तेजी आई, जिसके कारण एक बार फिर सात फीसदी से ज्यादा के ग्रोथ रेट का आकलन किया जा रहा है। आर्थिक संकेतकों में शेयर बाजार की स्थिति भी प्रमुख है। शेयर बाजार भी रिकॉर्ड ऊंचाई पर बना हुआ है। नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के पहले अप्रैल 2014 में मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक सेंसेक्स 22 हजार के आसपास ट्रेड कर रहा था, जबकि अभी सेंसेक्स 35 हजार के स्तर को पारकर ट्रेड कर रहा है। इसी तरह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक निफ्टी भी 11 हजार के स्तर के पास पहुंच कर ट्रेड कर रहा है। लबालब विदेशी मुद्रा भंडार विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति भी अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख संकेतक होता है। भुगतान संतुलन के लिहाज से देश में विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति काफी मजबूत हो चुकी है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार 420 अरब डॉलर हो चुका है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2014 में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 292 अरब डॉलर के स्तर पर था। यानी नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद विदेशी मुद्रा भंडार में 128 अरब डॉलर से भी अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इसी तरह देश का रिजर्व स्वर्ण भंडार भी 74.83 करोड़ डॉलर की उछाल के साथ 360 अरब डॉलर का हो गया है।

व्यापार संतुलन की बात करें तो 2013-14 में आकलित व्यापार घाटा 62448.16 मिलियन डॉलर का था, लेकिन पिछले चार सालों के दौरान इसमें 29.7 फीसदी की की कमी हुई है। देश के विनिर्माण क्षेत्र में भी नए कार्यादेश मिलने और उत्पादन बढ़ने की वजह से उछाल की स्थिति बनी है। निक्केई इंडिया मैन्युफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर इंडेक्स (पीएमआई) 54.2 पर पहुंच गया है, जबकि यूपीए वन और टू के शासनकाल के दौरान ये लगभग हमेशा ही 50.0 से कम रहा था। बेहतर हुआ कारोबारी माहौल विश्व बैंक ने अपनी ताजा रिपोर्ट में तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था की सूची में फिलहाल भारत को चौथे नंबर पर रखा है। विश्व बैंक ने इसकी वजह नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी परियोजनाओं की वजह से देश के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश होने को माना है। जानकारों का कहना है कि नरेंद्र मोदी ने केंद्र की सत्ता संभालने के बाद ही देश में बेहतर कारोबारी माहौल बनाने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया था। इसी कोशिश के तहत ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की नीति से देश में कारोबार को गति देने के लिए एक बड़ी पहल की गई। इस नीति के तहत बड़े, छोटे, मंझोले और सूक्ष्म उद्योगों में सुधार के तमाम उपाय किये गये। इस सरकार ने नीतियों में दृढ़ता लाने के साथ ही अर्थव्यवस्था में अधिक पैसे लाने के लिए कोयला ब्लॉक और दूरसंचार स्पेक्ट्रम की व्यवस्थित नीलामी कर काफी पैसे अर्जित किये।

कोयला खदान (विशेष प्रावधान) अधिनियम- 2015 के तहत 82 कोयला ब्लॉक की नीलामी से सरकार को 3.94 लाख करोड़ रुपए की आमदनी हुई। इसी तरह पिछले साल जुलाई में जीएसटी लागू करके सरकार ने राजस्व प्राप्ति की दिशा में उल्लेखनीय काम किया। शुरुआती परेशानियों के बाद अब जीएसटी रफ्तार पकड़ चुका है और अप्रैल 2018 में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का राजस्व इकट्ठा होने से स्पष्ट हो गया है कि कारोबारियों को यह पसंद आने लगा है। सबसे उल्लेखनीय बात नए करदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी होना भी है। नवंबर 2017 तक पूर्ववर्ती साल की तुलना में नये करदाताओं की संख्या में 31 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। सिर्फ नोटबंदी और जीएसटी की वजह से ही देश के टैक्स नेटवर्क से 18 लाख से अधिक नये करदाता जुड़े हैं। आम उपभोक्ताओं को राहत आम उपभोक्ताओं के लिहाज से देखा जाये तो महंगाई दर काफी नीचे आ गयी है। मोदी सरकार बनने के पहले महंगाई दर 11 फीसदी के स्तर पर थी, जबकि फिलहाल महंगाई दर लगभग 4 फीसदी आसपास है।

इसी तरह खुदरा महंगाई दर 18 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। जाहिर है कि पिछली और मौजूदा सरकार के आंकड़ों में जमीन-आसमान का अंतर है। इस सरकार ने एक बड़ी उपलब्धि आम लोगों को बैंक से जोड़कर भी हासिल की है। प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत 2017 के अंत तक 29.7 करोड़ जनधन खाते खोले जा चुके थे। इसमें लाभार्थियों के खाते की राशि एक लाख करोड़ रुपये से भी अधिक हो चुकी है। विनिवेश के मोर्चे पर भी नरेंद्र मोदी की सरकार काफी सफल रही है। वित्तवर्ष 2017-18 में 54 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम विनिवेश से प्राप्त हो चुकी थी। इसीलिए वित्त मंत्री ने आम बजट 2018-19 में विनिवेश का लक्ष्य बढ़ाकर 80 हजार करोड़ रुपये कर दिया है। सरकार की एक उपलब्धि विदेशी ऋण में कमी लाने की भी है। भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत का विदेशी ऋण में 2.7 फीसदी की कमी दर्ज की गयी है। इसके पीछे एक प्रमुख वजह प्रवासी भारतीय जमा और वाणिज्यिक कर्ज के उठान में गिरावट आना भी रहा है। रिपोर्ट के अनुसार जीडीपी और विदेशी ऋण का अनुपात घटकर 20.2 फीसदी रह गया है। इसके साथ ही लॉन्ग टर्म विदेशी कर्ज में भी 4.2 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। निवेशकों का बढ़ा रुझान अगर विदेशी निवेश की बात करें तो पिछले चार वर्षों के दौरान भारत विदेशी निवेशकों के लिए एक पसंदीदा जगह बना है। इस सरकार के कार्यकाल मे सितंबर 2017 की साढ़े तीन साल की अवधि में ही 1,94,538 मिलियन डॉलर का विदेशी निवेश हो चुका है। जबकि इसके पहले की यूपीए सरकार के 10 साल के कार्यकाल में कुल 3,04,046 मिलियन डॉलर का विदेशी निवेश हुआ था। जानकारों का मानना है कि यदि यही रफ्तार बनी रही तो मोदी सरकार पांच साल के कार्यकाल में ये आंकड़ा यूपीए सरकार के 10 साल के आंकड़ों को भी पार कर सकता है।

भारत में जारी आर्थिक सुधारों पर विश्व की कई संस्थाओं ने भी अपनी मुहर लगाई है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने पिछले 14 सालों में पहली बार भारत की रैंकिंग में परिवर्तन कर इसे बीएए-3 से बढ़ाकर बीएए-2 कर कर दिया। इसके अलावा ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के मामले में भी भारत छलांग लगाकर 100वें पायदान पर पहुंच गया है, जबकि 2014 में भारत 142वे पायदान पर था। मोदी सरकार के कार्यकाल का अभी एक साल और बचा है और अगर अर्थव्यवस्था की यही रफ्तार बनी रही तो देश जल्द ही नयी ऊंचाई पर नजर आयेगा।