होली के अद्भुत मुहूर्त

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होली का त्यौहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। फाल्गुन की पूर्णिमा मन्वादि है और इसी का नाम होलिका है। अतंर इतना है की मन्वादि के लिए पूर्वाह्नव्यापनी ग्रहण करनी और होलिका पर्व मनाने के लिए प्रदोषव्यापनी और भद्रा से रहित ग्रहण करनी।

फाल्गुनीपौर्णमासी मन्वादिः।। सा पौर्वाह्नकी इयमेव होलिका।। सा प्रदोष व्यापिनी भाद्रराहिता ग्राह्या।।

इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा तिथि का क्षय हो रहा है। 1 मार्च को सूर्योदय के समय चतुर्दशी तिथि है तथा प्रातः 8:18 के उपरान्त पूर्णिमा तिथि जो पूर्वाह्नव्यापनी और प्रदोषव्यापनी रहेगी। 8:58 से 19:37 तक भद्रा का वास पृथ्वीलोक में रहेगा तथा होलिका दहन का शुभ मुहूर्त भी 19:37 के उपरान्त ही उचित होगा। विशेषतः 19:37 से 20:46 के मध्य।

होलिका त्यौहार क्यों मनाया जाता है इसके लिए एक लोककथा अत्यंत प्रसिद्द है। लोककथा के अनुसार हिरण्यकशिपु की बहन होलिका ने प्रह्लाद के वध के लिए उसे अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश किया और स्वयं को एक ऐसे वस्त्र से ढंक लिया जिससे अग्नि उसे न जला पाए। लेकिन वायु ने उस वस्त्र को होलिका से हटा कर प्रह्लाद पर डाल दिया जिससे प्रह्लाद बच गया लेकिन होलिका जल गई।

इस लोककथा में चार जगह अपना ध्यान केंद्रित करें — प्रह्लाद, होलिका, अग्नि, वस्त्र।

‘ह्लाद’ संस्कृत भाषा का शब्द है। ह्लाद शब्द में आ तथा प्र उपसर्ग का प्रयोग करने पर शब्द बनते है: आह्लाद एवं प्रह्लाद जिनका अर्थ होता है आनंद, उल्लास, प्रेम आदि।

“होला” अर्थात् मुरझा कर सुखी हुई ज्वलनशील लकड़ी अतः होलिका जलन, इर्ष्या द्वेश का प्रतीक है।

वस्त्र और कुछ नहीं बल्कि राम नाम ही है।

रामनामजपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम्। पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोSपि सलिलायतेSधुना।।

अतः होलिका त्यौहार प्रेम, आनंद तथा उल्लास का त्यौहार है जिसमें ईर्ष्या, द्वेष तथा अन्य समस्त बुराइयों को अग्नि में दाह किया जाता है। यह सब बिना राम नाम के संभव नहीं है।

होली त्यौहार के बारे में पुराण क्या कहते हैं?

भविष्यपुराण उत्तरपर्व के अध्याय 132 में युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण ने फाल्गुन पूर्णिमोत्सव का पूर्ण विवरण किया है जिसमें उन्होंने सतयुग के रघु नाम के राजा और ढोंढा नामकी राक्षसी की कथा कही है। ढोंढा राक्षसी बालकों को कष्ट देती थी और उसको शांत करने का सिर्फ एक ही मंत्र था “अडाडा”। यह राक्षसी शोर मचाने, हो हुल्लड़ करने से जल्दी शांत होती है। इसके अतिरिक्त इस दिन ब्राह्मणो द्वारा सभी दुष्टों और सभी रोगोंको शान्त करनेवाला वसोर्धारा-होम इस दिन किया जाता है।

नारद पुराण पूर्वार्ध अध्याय 124 के अनुसार

फाल्गुने पूर्णिमायां तु होलिकापूजनं मतम्।।
संचयं सर्वकाष्ठानामुपलानां च कारयेत्। तत्राग्निं विधिवद्ध्रुत्वा रक्षोघ्नैर्मंत्रविस्तरैः।।
असृक्पाभयसंत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः। अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।।
इति मंत्रेण सन्दीप्य काष्ठादिक्षेपणैस्ततः। परिक्रम्योत्सवः कार्य्यो गीतवादित्रनिःस्वनैः।।
होलिका राक्षसी चेयं प्रह्लादभयदायिनी। ततस्तां प्रदहंत्येवं काष्ठाद्यैर्गीतमंगलैः।।
संवत्सरस्य दाहोऽयं कामदाहो मतांतरे। इति जानीहि विप्रेंद्र लोके स्थितिरनेकधा।।

अर्थात फाल्गुन पूर्णिमा को सब प्रकार के काष्ठों और उपलों का संग्रह करना चाहिए। वहाँ रक्षोघ्र-मन्त्रों द्वारा अग्नि में विधिपूर्वक होम करके होलिका पर काठ आदि फेंककर उसमें आग लगा दें। इस प्रकार दाह करके होलिका की परिक्रमा करते हुए उत्सव मनाएं। यह होलिका प्रह्लाद को भय देने वाली राक्षसी है। इसलिए गीत मंगलपूर्वक काष्ठ आदि के द्वारा लोग उसका दाह करते हैं। विपेंद्र! मतान्तर में यह ‘कामदेव का दाह’ है।

होलिका पूजन का मंत्र

असृक्पाभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:। अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।।

इसका अर्थ है कि रक्त पीने वाले राक्षसों के भय से त्रस्त होकर बालिशों द्वारा होलि की रचना की गई। अतः हे होलि, मैं तेरा पूजन करता हूं, तू मेरे लिए भूतिप्रद, समृद्धि दायक हो।

लिंगपुराण में फाल्गुन पूर्णिमा को फाल्गुनिका कहा जाता है। यह बाल-क्रीड़ाओं से परिपूर्ण है और लोगों को धन-धान्य से समृद्ध करने वाली है —

फाल्गुने पौर्णमासी च सदा बालविकासिनी। जेया फाल्गुनिका सा:च ज्ञेया लोकविभूतये।

अतः इस दिन बच्चों का आपस में खेलना भी परम आवश्यक है।

होली की रात्रि दारुणरात्रि कहलाती है और इस रात्रि विशेष साधनायें, कष्ट निवारण उपाय किये जाते हैं। कुछ विशेष और अद्भुत उपाय अगले लेख में प्रस्तुत करेंगे।

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ज्योतिषशास्त्र, पुराण, धर्मशास्त्र अध्ययन और उनकी समीक्षा में विशेष रुचि, विज्ञान और तकनीकी से स्नातक, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत, ग़ाज़ियाबाद, उत्तरप्रदेश-निवासी

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